Showing posts with label पाठको के ब्लॉग. Show all posts
Showing posts with label पाठको के ब्लॉग. Show all posts

Monday, 2 October 2017

नही रहे कवि पागल, कभी उनके नाम पर श्रोता उमड़ पड़ते थे- गणपत भंसाली

आज जब यह विदित हुआ कि काव्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर एंव आशु काव्य रचना के महारथी तथा हास्य व्यंग्य के बेताश बादशाह कवि व्यंकट बिहारी पागल (जयपुर) नही रहे तो अत्यंत ही दुःख पहुंचा, श्री पागल जी हमारे निमंत्रण पर जसोल, बालोतरा एंव सूरत में आयोजित विभिन्न कवि सम्मेलनों में लगभग एक दर्जन बार पधारे होंगे, उनकी हाजिर जवाबी का हर कोई श्रोता कायल था, वर्ष 1980 से 1990 के दशक में हमारे कस्बे जसोल व समीपवर्ती बालोतरा शहर में पागल जी के नाम का डंका बजता था, उनकी गजब की ब्रांड इमेज थी, श्रोताओं का अपार जन समूह उनके नाम पर ही खिंचे चले आता था, मुझे अच्छी तरह स्मृत हैं कि हमारे कार्यक्रम में अंतिम बार उनको सूरत में वर्ष 1998 के आस-पास आमंत्रित किया गया था, वे उस दौर में हमारी सूरत के रिंग रोड पर स्थित सिल्क सिटी मार्केट पर भी पधारे थे, हालांकि उनको मेरे कस्बे जसोल में तो पहली बार वर्ष 1980 के आस-पास आमंत्रित किया गया था, फिर तो अगिनित आयोजनों में उनकी उपस्थिति रही, मेरे पास 2 दिसम्बर 1989 को जसोल (जिला-बाड़मेर, राजस्थान) में आयोजित कवि सम्मेलन के कुछ फोटोग्राफ संजोये हुए हैं, यानी करीब 28 वर्ष पूर्व लायन्स क्लब ऑफ जसोल द्वारा बस स्टैंड के समीप एन एच वोहरा स्कूल प्रांगण में आयोजित कवि सम्मेलन में पधारे थे,
2 दिसम्बर 1989 के आयोजन में आमंत्रित कवि
◆ व्यंकट बिहारी पागल (जयपुर)
◆ सत्यनारायण सत्तन (इंदौर)
◆ विश्वेश्वर शर्मा (मुम्बई)
◆ प्रदीप चौबे (ग्वालियर)
◆ जगदीश सोलंकी (कोटा)
◆ अब्दुल गफ्फार (केकड़ी)
◆ रमेश गुप्ता चातक (रतलाम)
◆ शाकुन्तल पाण्डे (मुम्बई)
◆ पूर्णिमा पूनम (जबलपुर)
◆ एकता शबनम (कोटा)
(गणपत भंसाली)

Saturday, 23 September 2017

धर्म शास्त्रों ओर अन्तराय कर्म बंधन का पाठ सोशल मीडिया पर कर रहे है उन्हे अक्षय जैन की खरी बात

कथित समाज के  कर्णधारो .... दीक्षा विवाद पर अब अनर्गल बाते कर धर्म शास्त्रों ओर अन्तरायकर्म बंधन का पाठ सोशल मीडिया पर कर रहे है.... इस तरह का विलाप करना उनकी मजबूरी का हिस्सा है। सच्चाई उनको आज भी नजर नही आ रही हे ... जैन धर्म के ठेकेदार ओर आगम शास्त्र विशेषज्ञ बन रहे मगर बहुत छोटी सी बात है समग्र जैन समाज मे इस वक्त अनेको दीक्षा अनेक धर्माचार्य गच्छाधिपति सन्त समुदाय द्वारा दी जा रही हम कभी उन दीक्षा के विरोधी नही बने , हम इस दीक्षा में मात्र ढाई वर्ष की बालिका के वात्सल्य की महरूम किये जाने की बात कह रहे है... समाज के कथित ठेकेदारो की जिद्दी ओर भद्दी सोच से मानवीयता का धर्म कलंकित हो ... एक जघन्य अपराध एक मासूम जिसे ढाई वर्ष में माँ के ममत्व से वंचित करना किसी तरह का पाप के बजाय पूण्य लगने लगे इसे क्या कहे.... धर्म भीरुता ओर कट्टरवाद की पराकाष्ठा .... सच सुनना उन्हें पसंद नही था पहले समाज के भीतर ही इस बात का आंकलन किया जाना था... 36 गुणधारक आचार्य श्री को किस तरह की गफलत में रखा ... कानूनी पहलुओ की बात से क्यो नही अवगत करवाया ... समाज मे हजारो साधु साध्वी ज्ञान - ध्यान उत्कृष्ठ साधना से समाज मे धर्म गंगा प्रवाहित कर रहे है... इस घटना से बड़ा सवाल हो रहा है कि कुछ समय इस दीक्षा के रोकने से समाज मे सन्त साधुवियो की कमी नही हो रही ... लेकिन समाज के कथित कर्णधार इस दीक्षा की नाटकीय पटकथा ओर समाज बदनामी के जिम्मेदार है। हम समाज की अग्रिमपंक्ति
सूत्रधारों को आरम्भ से अबोध बालिका संरक्षण धर्म पालन करने का आग्रह कर रहे थे हमें बीच मे बताया गया कि आचार्य श्री ने 23 सितम्बर को केवल नीमच निवासी सुमित जी राठौड़ की दीक्षा आज्ञा दी ... हमने अपने ओर से इस का स्वागत किया लेकिन कल शाम साधुमार्गीय समुदाय के लोगो ने कहा कि।आचार्य श्री का अंतिम निर्णय श्री सुमित जी ओर अनामिका जी की दीक्षा होगी ... इस उदघोषणा के बाद कानूनी पहलुओ ओर प्रशासनिक दखल का रास्ता सामने आया ... समाज के कर्णधारो ओर शास्त्रो के ज्ञाताओं के बीच हम कोई नई बहस लेकर याचना नही करेंगे लेकिन एक ढाई वर्ष की बालिका के माँ वात्सल्य अधिकार को वह जैन धर्म से विमुख कर न देखे ... चूंकि जैन धर्म दया करुणा और मानवीय भाव पोषित धर्म है ... हमने जैन धर्म विरुद्ध कोई काम नही किया ... दीक्षा आये दिन हो रही है हमने कभी किसी दीक्षा का विरोध नही किया है .... हम सदैव दीक्षा धर्म संस्कार और आगम समत कार्य पर भरोसा करते है । इस प्रकरण में कुछ लोग केवल हमे जैन धर्म विरोधी बताकर अपनी बात सोशल मीडिया पर भेज रहे है .... वास्तविकता में अगर समाज के अग्रदूत एक ढाई वर्ष की बालिका के भविष्य और मातृत्व आँचल धर्म का दृष्टिबोध कर लेते तो यह विवाद जन्म नही लेता है ... एक विनती ओर अनामिका जी से वो अपनी संतान के बड़े होने का इंतजार कर ले उनको सार जग वन्दन करेगा ... आपकी उच्चकोटि संस्कार के बल पर आपका नाम संसार मे पूजनीय होगा । हम दीक्षा विरुद्ध न थे और न रहेंगे लेकिन मानवीय संवेदनाओं को दफन करना भी बड़ा पाप है...। चन्द धर्म भीरुओ को छोड़ समाज की अधिकांश प्रबुद्ध वर्ग ने आज राहत जाहिर की ओर कहा है कि ढाई वर्ष की बच्ची को माँ का वात्सल्य अधिकार पूर्वक मिले....। 
ह्रदय से मिच्छामि दुकड्डम ... जय जिनेन्द्र   लेखक---- अक्षय जैन ( इंदोर ) 
नोट ----- उपरोक्त विचार ब्लॉग लेखक के है सभी व संपादक  विचारो से  सहमत हो जरूरी नही 

नीमच निवासी दीक्षा विवाद ..... गहरे जख्म देते सवाल


जैन धर्म दया करुणाप्रित मानवीय संवेदना से परिपूर्ण है 


हम ऐसे धर्म उपासक है .... दीक्षा साधुत्व ग्रहण के हम कभी विरोधी नही है... जिन मत हमारी खून की रगों और संस्कार में रचा बसा है.... । इसका प्रमाण पत्र किसी का नही बल्कि हमारे आचरण से है। नीमच निवासी श्री सुमित जी राठौड़ और उनकी धर्मपत्नी अनामिका जी की दीक्षा को लेकर उतपन्न विवाद बहस और सोशल मिडिया पर प्रतिक्रियाओ से गहरे जख्म जन्म लेते गए ....बहुत विनम्रता पूर्वक अपने आध्यात्मिक गुरु भगवन्त 36 गुणधारक महान आचार्य श्री और समस्त साधुमार्गीय जैन साधू साध्वियो और अनेक गच्छाधिपतियो से मिच्छामिदुक्द्म करता हूँ.... मेरा मकसद कभी धर्म गुरुओ और आस्था को विवादित करने का नही रहा .... मेरा दर्द इतना है कि देश भर में हम मानवीय संवेदनाओ के प्रहरी के तौर पर ख्यात धर्म अनुयायी प्रचारक है... जब इस दीक्षा में मूल प्रश्न संज्ञान में लाया कि ढाई वर्ष की अबोध मासूम बालिका जिसे माँ वात्सल्य -आँचल- ममत्व से वंचित करना अनुचित होगा ? लेकिन तथाकथित धर्म भीरु श्रावक अपनी कथित निष्ठा के बुते इस दीक्षा को अंजाम दिलाने की ग्यारंटी देते रहे .... गुमराह करने की तमाम कोशिशे की गई ... कथित धर्म भीरुओ के लोग बुद्धिजीवियो को समाज विरोधी बताने में जुट गए ... कल दिनांक 22 की शाम सवा 4 बजे साधुमार्गीय सम्प्रदाय आचार्य ने दोनों सुमित जी और अनामिका जी को दीक्षा देने की स्वीकृति दी ... तहलका मच गया ... मुझे सैकड़ो की तादाद में फोन आये ... लोगो को इस बालिका के अधिकार संरक्षण दिलाने की पहल होना चाहिए की बात कहि गई ... हमने और मेरी टीम के सदस्यों ने अपने स्तर पर मध्यप्रदेश और गुजरात के कुछ अधिकारियो सत्ताधीशो और मानव अधिकार एक्टिविस्ट समूह से सम्पर्क किया ... पहल मजूबत कड़ी दर कड़ी बढ़ गई ... समाज के कर्णधारो को अधिकारियो ने स्प्सष्ठ किया दीक्षा रोकी जायेगी ... मध्य प्रदेश में बेटी बचाओ आंदोलन करने वालो का साथ मिला ... बात भोपाल मुख्यमन्त्री जी तक भी पहुंची ... गुजरात के वरिष्ठ अधिकारियो के संज्ञान में लाया गया ... आखिरकार समाजिक मन्त्रणा में तय हुआ फिलहाल दीक्षा एक ही होगी ...इस प्रकारण से कुछ सवाल आम जन मानस के सर्वजनिक हो गए ....
1- क्या मानवीय संवेदनाओ वाला जैन धर्म एक ढाई वर्ष की बच्ची के मसले पर अपने मूल गुण धर्म भूल गया ?
2- इस दीक्षा को क्यों इतनी बड़ी प्रतिष्ठा बनाया - क्या जैन धर्म में साधु साध्वियो की कमी हो गई थी? या जैन धर्म संकट से घीर गया था जो इस दाम्पती दीक्षा ही बचा सकती ?
क्यों धर्म गुरु इस दीक्षा पर चुप्पी साधे रहे?
जैन धर्म में सांसारिक यानी गृहस्थी भी त्याग सयंम और आचारण पध्दति से सांसारिक कर्तव्यो के साथ पालन कर सकता हे तो क्या आवशयक्ता पड़ी की दीक्षा की जिद्द की जाए ... जब परिस्थिति एक अबोध बालिका की हो?
मै आप सभिनको कहना चाहता हूँ मेरा मकसद जैन धर्म दीक्षा विरोध नही ... मै उस ढाई वर्ष की बालिका के बढ़े होने समझदार उम्र पार करने की बाद दीक्षा ग्रहण की बात उठा रहा हूँ... मुझ पर नाना प्रकार के अवांछनीय आरोप कथित धर्मभिरुओ ने लगाये... मै बेपरवाह उस बच्ची के माँ वात्सल्य अधिकार का प्रहरी बन खड़ा रहा हूँ*। मैने सोशल मिडिया पर अपनी id से आन लाइन सोशल मिडिया वोटिंग करावाई ... मेरे तमाम साथियो ने जनमत एकत्रित किया अधिकारियो तक बात पहुंचाई कुछ राजनितिक सम्पर्क मित्रो ने इस मुहीम का बल दिया ... सभी धन्यवाद ... अभी यह मुहीम खत्म नही हुई ... न मुझे इसका श्रेय चाहिए ... हम आग्रह करते है अनामिका जी से की वह समझे अपनी ममतायुक्त मातृत्व साधिका से अभी ढाई वर्ष की बेटी को बढ़ा होने तक दीक्षा के बजाय ग्रहस्थता के साथ जैन धर्म निर्वहन करे ... आत्मीय ख़ुशी होगी बेटी को माँ का वात्सल्य और धर्म संस्कार मिलता रहेगा ... आप हमेशा पूज्नीय कहलाएगी....। मेरे इस व्यवहार से अनामिका जी को कहि दिल दुखा हो तो अंतर्मन से क्षमायाचना, लेकिन ढाई वर्ष की मासूम बेटी को आपके ममत्व की सदैव आवशयक्ता को अनदेखा न करे ।
अक्षय जैन---इंदोर 

उपरोक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार है सम्पादक सहमत हो जरूरी नही

Friday, 22 September 2017

सूरत मे दीक्षा ओर इतिहास के जानने योग्य पृष्ठ - साध्वी गुरु छाया ( देहली )

 
गुजरात के सूरत शहर मे दीक्षा लेने वाले भावी दीक्षार्थी नीमच निवासी श्री सुमित राठोर व श्रीमति अनामिका जी साधुमार्गी जैन आचार्य श्री रामलाल जी महाराज के सानीध्य मे दीक्षा लेने जा रहे है ! उनको विश्व धर्म परिवार ( सारा संसार ) की ओर से व विशेष रूप से भारत की 125 करोड़ जनता की सहर्ष अनुमति व साधू समाज परिवार मे उनका स्वागत है !
इतिहास के पृष्ठ इस तरह की दीक्षाओ से भरे पड़े है ! हर वर्ष महापर्व पर्युषणो मे सुनाया जाने अंतकृत दशांग शास्त्र अकेला ही इसका जीता जागता प्रमाण है ! जिसमे 90 महापुरुषों का वर्णन है ! मेघकुमार जेसे राजा के बेटे (बालमुनी ) गज सुकुमार जेसे युवा मुनि , राजा , रानिया , कृष्ण जी के बेटे , पोते , रानिया आदि सभी भगवान आरिष्टनेमि व भगवान महावीर के केवल एक ही बार उपदेश सुनते है ओर दूसरे दिन साधू परिवार मे सन्यास लेकर बिराजते है !
शोशल मीडिया एक पढे लिखे वर्ग का मंच है जिसके द्वारा हम सबने अपनी बात उन तक पहुंचा दी है ! उनका दोनों का निर्णय अभी भी अटल है तब हम सबको उन्हे सहर्ष शुभकामनाए भी देनी है !
दोनों दीक्षार्थी संयम पाठ पर आगे बढ़े पीछे मुड़कर नही देखे की वह क्या छोड़कर आए है ! नयी डगर पर निरंतर आगे बढ़े ! ओर इस क्षेत्र का सभी सकारात्मक ज्ञान प्राप्त करने की तरफ लगाए !
अंत मे एक बार फिर मे विद्रोही आवाज के संपादक श्री उत्तम जैन जी के माध्यम से आपसे अनुरोध करती हु भावावेश मे आकर भविष्य का निर्णय न करे पुनर्विचार करना हो तो अभी भी समय है दोनों दीक्षार्थी के पास
साध्वी --- गुरु छाया
देहली ---- 22/09/2017
व्हट्स अप द्वारा प्रेषित प्रकाशन हेतु

साधुमार्गीय जैन धर्म ( समता वँशज) ... एक अबोध बालिका के माँ वात्सल्य पाप के दाग की और अग्रसर

साधुमार्गीय जैन धर्म ( समता वँशज) ... एक अबोध बालिका के माँ वात्सल्य पाप के दाग की और अग्रसर - साधुमार्गीय समाज जिम्मेदार 
 मानवीय संवेदना की कल हत्या होगी .... ढाई वर्ष की अबोध बालिका को माँ के आँचल से महरूम कर सुमित जी और अनामिका जी की दीक्षा हो जायेगी ।  सोशल मिडिया पर उतपन्न विरोध के बावजूद अब दीक्षा समारोह सुबह 7 .30 बजे कर दिया और बिना किसी समारोह गुपचुप( चन्द समर्थको को साक्षी बनाकर ) दीक्षा की जायेगी.... बहरहाल दीक्षा  की जो पटकथा और नाटकीय  ब्यानो को प्रसारण विरोध दबाने की तमाम हथकण्डे के बाद मानवीय संवेदना की हत्या के कथित आरोप के दाग को  भावना प्रधान धर्म इतिहास को झेलना पड़ेगा .... मै कभी दीक्षा धर्म संस्कार के खिलाफ नही हूँ न था मै अपने धर्म गुरुजी का आत्मीय आदर करता हूँ लेकिन इस दीक्षा की जिद्द और अबोध बालिका के माँ वात्सल्य आँचल से महरूम किये जाने का पाप गुरुभगवन्त को अवश्य लगेगा ... समाज के धर्म भीरुओ की जमात को अवश्य मेरे इस वक्तव्य से आपत्ति होगी लेकिन इस दीक्षा के विवाद में गुरुभगवन्त और साधुमार्गीय जैन श्वेताम्बर समाज के तथाकथित नेताओ की भूमिका भी तमाम उपरोक्त पाप की भागीदार बन जायेगी ...। इस अक्षम्य पाप से बचाने के लिए  मैने अपने स्तर पर काफी प्रयास किये सोशल मिडिया पर विरोध हुआ ..साधुमार्गीय जैन  समाज ने भृम पैदा करवाया अखबार में और हम तक यह समाचार कहलवाया कि आचार्य श्री ने दीक्षा की अनुमति केवल नीमच निवासी सुमित जी राठौड़ को दी हे अनामिका को दीक्षा नही दी जायेगी ... तमाम भृम फैला कर समाज के मुखियाओं और धर्म भिरुओ ने आचार्य भगवन्त की साख के साथ ही छलावा किया है.... ! समाज के चाटुकार धर्म भीरुओ को आज नही भविष्य में यही छोटी अबोध बालिका अपने माँ वात्सल्य अधिकार वंचित रखने को लेकर नंगा करेगी ...।
लेखक - अक्षय जैन (इंदोर )

साधुमार्गीय जैन धर्म ( समता वँशज) ... एक अबोध बालिका के माँ वात्सल्य पाप के दाग की और अग्रसर

साधुमार्गीय जैन धर्म ( समता वँशज) ... एक अबोध बालिका के माँ वात्सल्य पाप के दाग की और अग्रसर - साधुमार्गीय समाज जिम्मेदार 

मानवीय संवेदना की कल हत्या होगी .... ढाई वर्ष की अबोध बालिका को माँ के आँचल से महरूम कर सुमित जी और अनामिका जी की दीक्षा हो जायेगी ।  सोशल मिडिया पर उतपन्न विरोध के बावजूद अब दीक्षा समारोह सुबह 7 .30 बजे कर दिया और बिना किसी समारोह गुपचुप( चन्द समर्थको को साक्षी बनाकर ) दीक्षा की जायेगी.... बहरहाल दीक्षा  की जो पटकथा और नाटकीय  ब्यानो को प्रसारण विरोध दबाने की तमाम हथकण्डे के बाद मानवीय संवेदना की हत्या के कथित आरोप के दाग को  भावना प्रधान धर्म इतिहास को झेलना पड़ेगा .... मै कभी दीक्षा धर्म संस्कार के खिलाफ नही हूँ न था मै अपने धर्म गुरुजी का आत्मीय आदर करता हूँ लेकिन इस दीक्षा की जिद्द और अबोध बालिका के माँ वात्सल्य आँचल से महरूम किये जाने का पाप गुरुभगवन्त को अवश्य लगेगा ... समाज के धर्म भीरुओ की जमात को अवश्य मेरे इस वक्तव्य से आपत्ति होगी लेकिन इस दीक्षा के विवाद में गुरुभगवन्त और साधुमार्गीय जैन श्वेताम्बर समाज के तथाकथित नेताओ की भूमिका भी तमाम उपरोक्त पाप की भागीदार बन जायेगी ...। इस अक्षम्य पाप से बचाने के लिए  मैने अपने स्तर पर काफी प्रयास किये सोशल मिडिया पर विरोध हुआ ..साधुमार्गीय जैन  समाज ने भृम पैदा करवाया अखबार में और हम तक यह समाचार कहलवाया कि आचार्य श्री ने दीक्षा की अनुमति केवल नीमच निवासी सुमित जी राठौड़ को दी हे अनामिका को दीक्षा नही दी जायेगी ... तमाम भृम फैला कर समाज के मुखियाओं और धर्म भिरुओ ने आचार्य भगवन्त की साख के साथ ही छलावा किया है.... ! समाज के चाटुकार धर्म भीरुओ को आज नही भविष्य में यही छोटी अबोध बालिका अपने माँ वात्सल्य अधिकार वंचित रखने को लेकर नंगा करेगी ...
लेखक - अक्षय जैन ( इंदोर ) 

Friday, 17 February 2017

लोकतान्त्रिक सामंतशाही व्यवस्था

एक थे राम। किसी कथाकार का कल्पनातीत चरित्र थे,अथवा वाकयी ऐतिहासिक किरदार,इसमें कुछ लोगों की सोच में मतांतर हो सकता है,किन्तु उनकी कथा का कथानक इतना वस्तुपरक था कि त्रेता से शुरू होकर वाया द्वापर कलयुग तक जस का तस दोहराया जाता रहा है। एक दिन पूर्व राम के राजतिलक की अवध में जोरों शोरों से तैयारियाँ चल रही थी,कि दासी मंथरा की कोऊ नृप होय,हमवू का हानि वाली कुटिल सलाह से वसीभूत सौतेली माँ केकयी ने राम के राज्याभिषेक की भांजी मार दी,और अगले ही दिन राम को चौदह बरस वनवास को निकलना पङा। कुछ कुछ ऐसा ही तमिलनाडु की चेन्नयी में कलयुग में हुआ। कहां पन्नीर सेल्वम को अपने रास्ते से हटाकर विधायक दल को आलीशन रिसोर्ट की ऐय्याशगाह में तफरीह करवाने के बीच अम्मा के छौङे राज सिंहासन की बागडौर थामने की लगभग पूरी तैयारी कर ली थी,चेनम्मा शशिकला नटराजन ने,कि बीच ही में माननीय उच्चतम न्यायालय ने सारा गुङ गोबर कर डाला,और चेन्नयी का राजपाट बंगलुरू की जेल तक सिफ्ट कर दिया गया। जेसा कि इतिहास अपने आपको दोहराता आया है। तब सौतेले भाई भरत में अग्रज भ्राता की स्वामी भक्ति के वसीभूत चौदह बरस भाई की खङाऊ को सिंहासन पर रख अवध की राज्य व्यवस्था का संचालन किया,और बखूबी किया कि इतिहास में इसके उदाहरण ही बन गये।अब पनीरसामी भी चार साल वेसा ही कुछ करने वाले है। जब चौदह साल तक व्यवस्था व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसके नाम पर चलाई जा सकती है,तो फिर चार साल भी चलाई जा ही सकेगी। कालांतर में लालू जी के कृष्ण जन्म स्थानान्तरण के वक्त भी ऐसा ही कुछ पाटलीपुत्र गणतंत्र में उनकी जीवन संगिनी राबङी देवी द्वारा किया ही जा चुका है। इतिहास,काल,परिपेक्ष्य, परिस्थिति के अनुरूप भारतीय नारियों ने समय समय पर समझ बूझ कर कदम उठाये है। तब सीता राम के साथ वन को गमन कर गयी थी। इस वार राबङी जी ने भरत की भूमिका के मध्यनजर पाटलीपुत्र में ही रहना उचित समझा,क्योंकि इस बार छौटे भाई लालू के कोई थे ही नहीं, और राबङी के भाईयों पर लालू जी को जरा भी विश्वास नहीं था।कुल जमा राज्य व्यवस्था राजशाही,सामंतशाही या लोकशाही जेसी भी रही हो,परस्पर विश्वास और षडयंत्रो की गुंजाईश हर वक्त बरकरार रहती आई है,और आईन्दा भी बनी रहेगी,ऐसा मैरा मानना है। आप चाहें तो मुझसे सहमत हो भी सकते हैं,और नहीं भी..अस्तु।
विनोद दाधीच - सूरत 

Tuesday, 10 January 2017

वाह रे डाक व तार विभाग 15 घण्टो की दुरी से प्रेषित पत्र पहुंचाने में 40-40 दिन !! सरकार बदल गई लेकिन विभाग की छवि नही बदली,

इस जेट व नेट के युग में भी भारतीय डाक व तार विभाग आज भी 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' की कहावत को चरितार्थ करते हुए अभी भी बेलगाडी की रफ़्तार से ही अपनी कार्य प्रणाली अपना रहा हैं, मुझे इसका प्रत्यक्ष अहसास आज हुआ, घटना क्रम इस प्रकार हैं कि मेरे परम स्नेही एंव बेतुल के DSP रेंज के पुलिस अधिकारी तथा देश के मशहूर ओजस्वी कवि श्री मदनमोहन समर के सपुत्र चिरंजीव हर्ष के 1 दिसम्बर 2016 को भोपाल में आयोजित शुभ विवाह की आमन्त्रण पत्रिका मुझे आज 10 जनवरी 2017 को प्राप्त हुई, यानि डाक विभाग की लेट लतीफी से यह पत्रिका मेरे हाथों में लगभग एक माह 10 दिन पश्चात पहुंच पाई, (जिसमें तो मेने वे दिन गिने तक नही जो समर जी ने सम्भवत 8-10 पहले इस पत्रिका को पोस्ट किया होगा) हालाँकि आदरणीय समर जी द्वारा प्रेषित यह आमन्त्रण मुझे पहले भी सोश्यल मीडिया के मार्फत से मिल ही चूका था, डाक विभाग की लापरवाही का यह तो रहा एक उदाहरण, अब आप एक और लापरवाही की और गौर फरमाइए, मुझे महावीर इंटरनेशनल द्वारा 25 नवम्बर को जयपुर से प्रेषित पुष्कर राजस्थान में 7 व 8 जनवरी को आयोजित 27 वें अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन सम्बन्धी सूचना युक्त पोस्ट आज 10 जनवरी को मिली, हालाँकि इस अधिवेशन में भाग लेकर लौटे हुए भी मुझे 2 दिन होने आए हैं, यह भी अजीब इतफ़ाक हे कि डाक तार विभाग के आलसीपन व निक्कमे पन की दास्तान इस पोस्ट में बयां कर ही रहा था
कि उसी समय एक और लिफाफा मुझे इस विभाग के जरिये प्राप्त हुआ जो सूरत से 8 घण्टा लगभग की दुरी पर स्थित गांधीधाम ( गुजरात) से मेरे परम् स्नेही श्री नरसिंह अग्रवाल ने 15 दिसम्बर के दिन मेरे जन्म दिवस पर पोस्ट किया था, यानि 15 दिसम्बर के दिन मेरे जन्म दिवस के उपलक्ष में प्रेषित यह बधाई पत्र मुझे 26 दिन पश्चात मिल पाया और वो भी इतने निकटवर्ती शहर से, गांधीधाम से व्यक्ति अगर पैदल भी चल कर आ जाए तो डाक विभाग के जरिए प्रेषित पोस्ट से तो पहले ही पहुंचेगा, वाह रे डाक तार विभाग !! सरकार तो बदल गई लेकिन इस विभाग ने अपनी छवि नही बदली, क्या कहा जाए इस लेट लतीफी पर ? और आलसी व लापरवाह किस्म के कर्मचारियों पर ? आखिर मोदीजी कहां-कहां पर नजर रखेगें ?

Monday, 26 December 2016

सेवा के पर्याय है श्री प्रवीण बेताला

सेवा के पर्याय हैं श्री प्रवीण बेताला.जन्म दिवस पर ढ़ेरों बधाईयां एंव अनन्त शुभकामनायें
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कुछ लोगों के पास सपने होते हैं. पर साकार करने का सामर्थ्य उनमें नही होता, लेकिन सूरत के युवा श्री प्रवीण बेताला के पास सपने भी हैं और उन्हें साकार करने का सामर्थ्य भी. इनके हौसले भी गजब के बुलन्द हे और उसी जज्बे के कारण वे ऊँची उड़ान  भरने में भी कामयाब होते जाते हैं, यह उल्लेखनीय हैं कि महज 4 साल पहले आपके कुशल नेतृत्व में सूरत जैन युथ क्लब (SJYC) की स्थापना हुई थी. और इस अल्प समय में ही आपने अपनी सूझबूझ व बेजोड़ कार्य प्रणाली के बल पर इस संगठन को इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया हैं, कि आज SJYC बड़े बड़े संगठनो व क्लबों के लिए भी उत्कृष्ट सेवा भावना की मिसाल बन कर उभरी हैं, चातुर्मास काल के लगातार 4 माह तक गरीबों असहायों व जरूरतमंदों की सेवा इस संगठन के बेनर तले अनवरत रूप से की जाती हैं. तथा युवाओं में खेलों के क्षेत्र में दिलचस्पी बढ़े इसी उद्देश्य से SJYC के बेनर तले विशाल स्तर पर क्रिकेट प्रतियोगिता पिछले तीन सालों से होती आ रही हैं, 'में अकेला ही चला था जानिबे मन्ज़िल लोग आते गए और कारंवा जुड़ता गया'" की तर्ज पर SJYC में सेवा भावी युवाओं का जुड़ाव होता रहा, इस क्लब के विस्तार के तहत SJYC की महिला शाखा भी स्थापित कर दी गईं. सचमूच में ये सब श्री प्रवीण बेताला के कुशल नेतृर्त्व में ही सम्भव हो पाया हैं, विभिन्न क्षेत्रों में मेडिकल केम्प. स्कूली बच्चों को पाठन-पठन की सामग्री व स्कूली कमरों में पंखे ट्यूबलाइटों की व्यवस्था करना, गरीबों को भोजन कराना तथा उनकी दैनिक जरूरत की वस्तुएं उपलब्ध कराना जैसी सेवा SJYC की दिनचर्या का हिस्सा हैं. इन्ही सभी खूबियों के कारण ही आपको अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारणी में सम्मिलित किया गया हैं तथा अ भा ते यु प द्वारा गत दिनों अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित पर्यावरण सुरक्षा अभियान के तहत राष्ट्रीय स्तर पर आपको संयोजकीय दायित्व भी सौंपा गया था, जिसे आपने बखूबी निभाया था, जागरूक व्यक्तित्व के धनी श्री प्रवीण बेताला के जन्म दिवस पर हम सभी शुभ कामनाएं प्रेषित करते हैं कि आप स्वस्थ मस्त एंव तंदुरस्त रहते हुए जरूरतमन्द लोगों की सेवा इसी जज्बे से अनवरत करते रहे व संगठन का उत्तरोत्तर विकास भी आपके बेजोड़ नेतृत्व में होता रहे, यही मंगल कामना
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
गणपत भंसाली

Sunday, 25 December 2016

जब कविता पढ़ रहे अटल बिहारी वाजपेयी को लड़कियों ने किया हूट

    पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर कुछ रोचक मगर कम चर्चित किस्से

1. 1953 की बात है। मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर जैसे ही देहरादून एक्सप्रेस से युवा अटल उतरे, एक गोरे चिट्ठे आदमी ने पंजाबी लहजे में पूछा, ‘त्वाडा नाम अटल बिहारी है?’ अटल ने हाथ जोड़कर कहा, ‘जी! दिल्ली से मुझे जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल जी ने भेजा है।’ शाम को विले पार्ले में भाषण था और मुंबई में जनसंघ के सर्वेसर्वा पंजाब के बख्शी जी थोड़ा परेशान थे कि ये लड़का आखिर क्या बोल पाएगा। उन्होंने अटल बिहारी को तैयार होने के लिए कहा।अटलजी ने देखते ही देखते अपने झोले से एक धोती कुर्ता निकाल लिया। वो कुर्ता आस्तीन के पास फटा हुआ था। बख्शी बोले, ‘जनसंघ के मंच पर फटे कुर्ते से भाषण दोगे?’ तब अटल ने दूसरा कुर्ता निकाला जो गले के पास से फटा था और कहा, ‘मैं इस पर जैकेट पहन लूंगा!’
2. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी वाजपेयी की हिंदी से प्रभावित थे। वह उनके सवालों का जवाब संसद में हिंदी में ही देते थे। विदेश नीति हमेशा उनका प्रिय विषय रहा। एक बार नेहरू ने जनसंघ की आलोचना की तो अटल ने कहा, ‘मैं जानता हूं पंडित जी रोजाना शीर्षासन करते हैं। वह शीर्षासन करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मेरी पार्टी की तस्वीर उलटी ना देखें।’ इतना सुनना था कि नेहरू जी भी ठहाका मारकर हंस पड़े।
3. बात उन दिनों की है जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और वाई. बी. चव्हाण गृहमंत्री। इंदिरा गांधी उन्हें गृहमंत्री के पद से हटाना चाहती थीं। चव्हाण को वित्तमंत्री बना दिया गया। उस वक्त हालात बहुत खराब थे और महंगाई सर चढ़कर बोल रही थी।संसद में महंगाई पर वित्तमंत्री के तौर पर चव्हाण जवाब दे रहे थे, लेकिन वह बार बार कह रहे थे, ‘वी विल अरेस्ट द प्राइसेज।’ चव्हाण ने जब तीन चार बार यही बात दुहराई तो वाजपेयी खड़े हुए और कहा, ‘महाराज! अरेस्ट तो आप गृहमंत्री के तौर पर करते थे, अब तो आप महंगाई को रोकने का इंतजाम कीजिए!’
4. अप्पा घटाटे वाजपेयी के करीबियों में से रहे हैं। वो एक किस्सा सुनाते हैं। अस्सी के दशक में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, अटल बिहारी उत्तर प्रदेश में हरिजनों पर अत्याचार की घटना को लेकर पदयात्रा कर रहे थे।अप्पा ने वाजपेयी से पूछा, ‘वाजपेयी ये पदयात्रा कब तक चलेगी?’ जवाब मिला, ‘जब तक पद नहीं मिलता, यात्रा चलती रहेगी!’ 1971 के लोकसभा चुनावों में जनसंघ के सांसदों की तादाद 35 से घटकर 22 रह गई। अप्पा घटाटे ने पूछा, ‘इंदिरा जी की क्या प्रतिक्रिया है?’ वाजपेयी हंसकर बोले, ‘अभी तो हमारी तरफ बहुत प्यार से देखती हैं!
5. 1991 में लखनऊ में चुनाव प्रचार चल रहा था। कलराज मिश्र बीजेपी यूपी के अध्यक्ष थे, वह वाजपेयी से मिलने आए लेकिन वाजपेयी प्रचार पर गए हुए थे। जब लौटे तो देखा कि कलराज मिश्र सोफे पर एसी में सो रहे हैं। वाजपेयी ने अपने खास लहजे में कहा, ‘लो, हिंदू राष्ट्र तो सो रहा है। कैसे काम चलेगा।’
6. एक बार आगरा कॉलेज में प्रतियोगिता थी। वाजपेयी तब वहां बी. ए. की पढ़ाई कर रहे थे। कॉलेज में लड़कियों का एक हॉस्टल था, डेविस हॉस्टल। इन लड़कियों ने तय कर रखा था कि ग्वालियर के कवियों को हूट करना है। प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही वे आगे आकर बैठ गयीं। कवि वीरेंद्र मिश्र के गीत को जब पहले हूट किया गया तो उनके साथी कवि तो समारोह स्थल से ही गायब हो गए। जब वाजपेयी ने अपनी वीर रस की कविता सुनाईः
नौ अगस्त सन् बयालिस का स्वर्णिम रक्त प्रभात,
जली आंसुओं की कारा में काली काली रात !

जब ये कविता उन्होंने सुनानी शुरू की तो लड़कियों ने ‘प्रभात, प्रभात’ कह कर उनकी हूटिंग शुरू कर दी। वाजपेयी आधे उखड़े, आधे जमे हुए से बने रहे। और फिर ऐसे जमे कि कवि सम्मेलन का माहौल ही बदल गया।

जब गुस्सा होने के बजाए सहयोगी से बोले अटल, मुझे भी फिल्म दिखा देते

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोगी शिवकुमार पारिक बताते हैं कि अटल जी जैसा सहज स्वभाव का व्यक्ति विरले ही देखने को मिलते हैं। वह कहते हैं कि एक बार की बात है अटल जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे। तब अटलजी का निवास फिरोजशाह रोड पर हुआ करता था। वे किसी काम से बैंगलोर गए हुए थे। उस दिन उनकी वापसी थी और मुझे उन्हें लेने एयरपोर्ट जाना था। मेरे साथ जनसंघ के ही एक और बड़े नेता स्व. जगदीश माथुर भी थे। उन्होंने कहा कि चलिए फिल्म देखने चलते हैं। उस समय हमारी उम्र महज 28-30 साल थी। मैने मना किया लेकिन उनके दबाव में मुझे भी जाना पड़ा। फिल्म देर से छूटी। हमलोग जल्दी से एयरपोर्ट भागे लेकिन तब तक प्लेन आ चुका था और अटल जी प्राइवेट टैक्सी लेकर आवास आ गए थे।चाबी हमारे ही पास थी, लिहाजा अटल जी चुपचाप बरामदे में टहल रहे थे। हमलोग काफी देर बाद पहुंचे तो मैं जल्दी से दरवाजा खोला। लेकिन उन्होंने कुछ बोला नहीं। पूछा, कहां चले गए थे।हमलोगों ने बताया फिल्म देखने गए थे तो हंसते हुए बोले, मुझे भी लेते चलते। चलिए, मैं जल्दी से तैयार हो जाऊं। राजमाता के साथ मेरी मीटिंग है।

अनाथों-असहायों-दिव्यांग बच्चों के सच्चे तारणहार मोखुन्दा-सूरत के श्री सुरेश पोखरणा की परोपकारी वृति को सौ सौ सलाम

महक मानवता की

अनाथों-असहायों-दिव्यांग बच्चों के सच्चे तारणहार मोखुन्दा-सूरत के श्री सुरेश पोखरणा की परोपकारी वृति को  सौ सौ सलाम
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
'हर दीन, दुःखी, दरिद्र में नारायण होता है, उसकी सेवा कर लो,तो समझो भगवान की पूजा हो गयी' किसी विद्वान् द्वारा व्यक्त इन विचारों को सचमूच में राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोखुन्दा निवासी एंव सूरत प्रवासी समाजसेवी श्री सुरेश जैन पोखरणा ने हृदयंगम ही कर दिया है. 1 जनवरी 1963 को मोखुन्दा में जन्में श्री सुरेश पोखरणा सादा जीवन उच्च विचार के धनी हैं, सरलता. विनम्रता, सादगी, परोपकारिता जैसे मानवीय गुणों के धनी श्री सुरेश पोखरणा ने अपना जीवन अनाथों, असहायों, गरीबों, जरूरतमंदों व अभावग्रस्त लोगों के कल्याणार्थ ही समर्पित कर दिया हैं, सूरत में स्वस्तिक ज्वेलरी के नाम से ज्वेलरी व्यवसाय से जुड़े श्री पोखरणा पिछले 36 सालों से सूरत में निवासरत हैं, काका के नाम से मशहूर श्री पोखरणा को दीन-दुखियों की सेवा करने की प्रेरणा गुजराती भाषा के प्रमुख दैनिक गुजरात समाचार में प्रकाशित प्रबुद्ध लेखक एंव चिन्तक डॉ शरद ठाकर ( वीर नर्मद यूनिवर्सिटी सूरत के वाइस चांसलर डॉ श्री दक्षेश ठाकर के भ्राता) के आलेख 'डॉक्टर की डायरी' से मिली, उक्त लेख में अहमदाबाद के सटे कलोल शहर के निकट हाजीपुर के एक विकलांग (दिव्यांग) स्कुल के बच्चों की पीड़ा पर प्रकाश डाला गया था. इस लेख को पढ़ कर श्री पोखरणा हाजीपुर की उक्त स्कुल में पहुंच गए. वहां उस दौर में 35 दिव्यांग लड़कियां अध्ययन रत थी.(इन दिनों 350 दिव्यांग छात्राएं हैं) स्कुल आर्थिक अभाव के दौर से गुजर रहा था. अतः वहां की लड़कियों की परवरिश ढंग सर नही हो रही थी, यानि स्थिति दयनीय थी. उन दिव्यांग लड़कियों की पीड़ा को देख पोखरणा का ह्रदय पसीज गया और आँखों में अश्रुधारा बह उठी. पोखरणा ने ह्रदय को विचलित करने वाले इस दृश्य को देख यह संकल्प कर दिया कि अब वे अपना जीवन इन दिव्यांगों अनाथों व असहायों के कल्याणार्थ समर्पित कर देंगे, तथा जीवन भर मिठाई का स्वाद तक नहीं चखेंगे, लड़कियों के प्रति अपार वात्सल्य भाव रखने वाले सुरेश पोखरणा के दीपक, मुकेश व राजू तीनों पुत्र ही हैं, श्री पोखरणा व उनकी धर्म पत्नि श्रीमती सुशीला बेन के मन में घर आँगन में लड़की न होने का सदैव मलाल रहा, तथा यह कमी सताती रही, जब पोखरणा दम्पति को दो पुत्रों के पश्चात तीसरा भी पुत्र हुआ तो पोखरणा की मातु श्री ने अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा कि अगर तीसरी सन्तान पुत्री के रूप में होती तो आँगन कुंआरा नही रहता, तो पोखरणा ने अपनी माँ से कहा कि माँ अगर आप कहे तो में अनाथ आश्रम से लड़की को गौद लें लूँ, बस घर में लक्ष्मी रूपा लड़की की इस कमी ने पोखरणा को अनाथ व असहाय लड़कियों की सेवा में समर्पित कर दिया, हालाँकि वे सेवा के मसले में लड़कों व लड़कियों में भेद नही रखते, उनकी एक ही प्राथमिकता है, और वो हे गरीब, असहाय, अनाथ, मूक-बधिर, विकलांग व अभावों अभियोगों की पीड़ा भोगते हर लड़के लड़की की तन-मन व धन के साथ समर्पित भाव से सेवा करना, हालाँकि इस तरह की विरली सेवा की प्रेरणा प्रबुद्ध लेखक डॉ श्री शरद ठाकर के एक आलेख से तो मिली ही थी, लेकिन इस सेवा भावना की प्रेरणा में कुछ और भी पहलु जुड़े हैं, जिसमें परिवार में लड़की का न होना भी एक कारण हैं, परन्तु इसमें  जैन सन्त श्री रत्न सुंदर विजय जी की प्रेरणा भी एक बड़ा कारण हैं. बहरहाल प्रेरणा के इन तमाम स्त्रोतो ने श्री पोखरणा में सेवा भावना का अद्वितीय जज्बा पैदा कर दिया, श्री पोखरणा ने अनेकों अनाथ लड़कियों की अपने खर्चे से शादियां करवा कर कन्यादान का पूण्य कमाया हैं, आगामी 12 जनवरी को भी एक अनाथ कन्या की शादी श्री पोखरणा कराने वाले हैं, इन अनाथ कन्याओं का अपने काका से इतना वात्सल्य हैं कि विदाई के समय सगी बेटी की तरह अपने काका से अश्रुधारा बहाते हुए गले मिलती हैं, और काका भी फूट-फुट कर रोने लग जाते हैं, वो करुण दृश्य देख कर हर प्रत्यक्ष दर्शी की आँखें नम हुए बिना नही रहती, पोखरणा के व्यक्तित्व की ये बड़ी खूबी हैं कि वे होली, दीपावली, दशहरा, नवरात्री, भाई दूज, रक्षा बन्धन, गणेश चतुर्थी,मकर सक्रांति, अनन्त चतुर्थी, गुड़ी पड़वा जैसे अगिनित त्यौहार सिर्फ और सिर्फ अनाथो-असहायों व दिव्यांगों के साथ ही मनाते हैं, वे ऐसे अवसरों पर मिठाइयाँ, चोकलेटें, वड़ा पांव, सेन्डविच, नमकीन, कचोरी, समोचे, खिचड़ी, भोजन आदि इन बच्चों के अपने हाथों से परोसते ही नही बल्कि  कुदरत की मार से पीड़ित इन बच्चों के हाथों से खुद भी ग्रहण करते हैं, (जबकि सम्भ्रांत कहे जाने वाले कुछ लोग इन दुखियारों की ऐसी दशा देख नाक भोह सिकोड़ने लग जाते हैं) सिर्फ भोजन ही नही, इन बच्चों के लिए खिलोने,कपड़े, चप्पल, बूंट तथा जरूरत की हर वस्तु ये मुहैया करवाते हैं, पोखरणा के सहयोग से 150 अनाथ लड़कियों नर्सिंग कोर्स कर अपने भविष्य को उज्ज्वल बना रही हैं, पोखरणा की एक सेवा तो बड़ी निराली हे वे हर त्यौहार या अपने परिवार के सदस्यों के जन्म दिवस, मैरिज एनीवर्सरी आदि प्रसङ्गों पर अनाथ, दिव्यांग व गरीब बच्चों के साथ-साथ आवासीय सोसायटियों, कॉम्पलेक्सों, व्यवसाहिक परिसरों में सेवारत वॉचमेनो को मिठाई-चॉकलेटों द्वारा मुंह मीठा कराना नही भूलते, पोखरणा का कहना हैं कि वॉचमेन दिन-रात सोसायटियों-एपार्टमेंटों आदि में मुस्तैदी के साथ दिन-रात सेवा में रहते, लेकिन अपना घर-बार तथा बुजुर्ग माता-पिता व परिवार जनों को अपने गाँवो-कस्बों में छोड़ कर आए इन वॉचमेनो की सुध लेने वाला कोई नही दिखता, उल्टा सेवा में थोड़ी सी कमी रह जाने या तनिक त्रुटि हो जाने से इन्हें हर कोई डांटने-फटकारने लग जाता हैं तो ऐसे हालातों में मेने इन वॉचमेनो को विभिन्न त्योहारों पर मिठाइयाँ आदि व्यंजन अपने हाथों से खिलाने का निश्चय किया,पोखरणा  के जीवन का एक ही मूलमन्त्र हे और वह हे हर उदास व पीड़ित चेहरे पर रौनक पैदा करो और उन्हें भी खुशियां प्रदान करने में सहायक बनो, पोखरणा के जीवन में वैसे तो परोपकार व सेवा की भावना वर्षों पहले से हैं. वे जब कुंवारे थे तब सिनेमा हॉलों में पिक्चर देखने की बजाय उन पैसों का सदुपयोग गरीब बच्चों के कल्याणार्थ करते थे, श्री सुरेश पोखरणा की पारिवारिक पृष्ठ भूमि भी काफी सुदृढ़ हैं, वे सूरत की टॉप 10 व्यवसाहिक प्रतिष्ठानों में से एक शहर के प्रतिष्ठित ओद्योगिक समूह 'राजहंस ग्रुप' (देसाई-जैन ग्रुप) के साझेदार श्री शिवलाल जी पोखरणा के सगे भाई हैं, ये उल्लेखनीय हैं कि राजहंस ग्रुप शहर में जाना-माना बिल्डर समूह हे तथा डूमस रोड व अडाजन आदि विस्तारों में उनके मल्टीप्लेक्स हॉल भी हैं, यह भी उल्लेखनीय हैं कि `स्मिटन' नाम से विश्व स्तर की चॉकलेट कम्पनी जो केडबरी जैसे प्रॉडक्ट को टक्कर देने का सामर्थ्य रखती है,भी इसी 'राजहंस समूह' की हैं, श्री सुरेश पोखरणा के अनुसार बाबा रामदेव के पतंजलि प्रॉडक्ट के तहत एनर्जी बॉर जैसा उत्पाद भी इसी राजहंस समूह की स्मिटन चॉकलेट कम्पनी में निर्मित होता हैं। श्री पोखरणा जैन आचार्य एंव प्रबुद्ध वक्ता श्री विमलसागर जी के श्रद्धावान श्रावक हे, यह भी उल्लेखनीय हैं कि प्रसिद्धि से सदैव दुरी रखने वाले पोखरणा फेसबुक पर कुछ माह पूर्व ही जुड़े हैं और वो भी समाजसेवी श्री दिनेश जी बोल्या की प्रेरणा से, Suresh Pokhrna के नाम से फेसबुक पर सर्च करते ही उनकी वॉल पर सेवा कार्यों के बोलते सेकड़ों चित्र नजर आएंगे, पोखरणा के सेवा कार्यों की 32 रिकॉर्डेड वीडियो क्लिपिंग उपलब्ध है, ऐसे सेवा भावी व्यक्तित्व के धनी श्री सुरेश जी पोखरणा की परोपकारी वृति को ह्रदय की अंतरंगता से नमन....
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
गणपत भंसाली
Jasolwala@gmail.com
9426119871

Saturday, 24 December 2016

55 वर्ष पूर्व के पोह दशमी के मेले के अनमोल लम्हे

55 वर्ष पूर्व के पोह दशमी के मेले के वे अनमोल लम्हें व् पल जो आज भी आनन्दित कर देते हैं जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जब जब जन्म कल्याणक दिवस आता है तो नाकोड़ा जी तीर्थ पर आयोजित पोह दशमी के विशाल मेले के परिदृश्य जीवन्त हो उठते हैं, हालाँकि यह मेला वर्षो-वर्षों से नाकोड़ा के रूप में प्रसिद्ध मेवानगर तीर्थ पर आयोजित होता आ रहा हैं, मुझे करीब 55 वर्ष पूर्व के वे दृश्य स्मृत हे जब इस मेले में सम्मिलित होने हेतु नाकोड़ा के निकटवृति जसोल, बालोतरा, पचपदरा, असाडा टापरा, कानाना, पारलू, समदड़ी, सिवाना, मोकलसर आदि कस्बो से श्रद्धालु वोहणो (बैलगाड़ियों) पर सवार होकर तथा जोधपुर, बाड़मेर,जालोर आदि दुरी के शहरों से बसों आदि से भोर के अँधेरे में सपरिवार मेवानगर (नाकोड़ा जी) तीर्थ पर पहुंचते थे, इन बैलगाड़ियों पर बिस्तर बिछा दिए जाते थे और परिवार के क्या बच्चे और क्या बड़े, हर कोई नए या साफ सुथरे कपड़े पहन कर सवार होते थे. कभी- कभी यह संख्या छोटे-बड़े मिलाकर आठ-दस तक पहुंच जाती थी, परिवार की महिलाएं घर के सदस्यों के बीच भी हाथ भर घूंघट निकाले हुए व हाथी दांत का असली चूड़ा पहने हुए सयुक्त स्वर में अत्यंत ही सुरीले कण्ठ से एक प्रचलित गीत गाती थी. जिसके बोल बड़े ही सुहाने थे, जब-जब यह मेला आयोजित होता है तो परिवार की महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले... `सक सोंई रे उड़न्ते पंखेरू ने पूछ्यो, शंखेश्वर क़तरिक दूर....' गीत की पंक्तियां कानो में रस घोलने लग जाती थी, सही मायनो में प्रभात वेला में महिलाओं द्वारा पवित्र भाव से गाए जाने वाला गीत प्रभु की किसी प्रार्थना-आराधना से कम नही होता था, यकीन मानिए कि हिचखोले खाती बेलगाडी की वो यात्रा इतनी सुखद व आनन्द दायक होती थी कि वर्तमान के इस आधुनिक व चकाचोंध भरे इस दौर में मसर्डिज या बी एम डब्ल्यू जैसी महंगी विलासिता पूर्ण कारों में भी वो आनन्द सम्भव नही हैं. बेलगाडी की यह यात्रा सिर्फ एक यात्रा ही नही होती थी, बल्कि परिवार के सामन्जस्य का अदभुत उदाहरण भी होती थी, जिस पथ से ये बेलगाडी गुजरती थी तो उसके दोनों और 'थोभ' ग्वारपाठा (एलोवेरा) के बड़े-बड़े पौधो की और बेल गाड़ी में बैठे बड़े बुजुर्ग छोटे लड़कों व युवाओं का ध्यान आकर्षित कराते हुए ये सीख देते कि अगर जीवन में कभी भी किसी लड़के ने अपनी बहिन को पीटा या उस पर हाथ उठाया तो उसके हाथ उस थोभ ( कंटीले ग्वारपाठे) की भांति उन पौधों के बीच उग जाएंगे, आज की भांति बच्चे तर्क नही करते थे और बड़े बुजुर्गों की वो सीख सदैव स्मृत रख कर हृदयंगम कर देते थे. बेलगाडी पर सवार बच्चों को जब-जब कुछ खाने की इच्छा होती तो मीठे में गुड़ की डली या मिश्री या फिर बताशा तथा भोजन में रोटी सब्जी. ज्यादा से ज्यादा गुड़ का चूरमा या मैदे का सीरा परोस दिया जाता जो आज की महंगी से महंगी देशी विदेशी चॉकलेट से तो कहीं अधिक स्वादिष्ट ही होता, पीने को पानी की केटली या फिर कपड़े की दिवड़ी में पानी समाया रहता, जहां तक इत्र सेन्ट जैसी खुशबु का प्रश्न है तो आज की तरह महंगे सेंट या परफ्यूम से कपड़ों को महकाया नही जाता, अमूमन सरसों या तिल्ली का तेल ही उपयोग में लिया जाता या फिर घर पर बनाया ब्राह्मी आंवला या फिर चमेली का तेल जो बालों व चेहरे पर (चोपड़) मल कर अपने आस-पास के वातावरण को सुगन्धित कर देता था, जैसे ही नाकोड़ा तीर्थ नजदीक आता दिखता तो खुशियों का कोई ठिकाना नही रहता` क्योंकि मेले में हाथ से घुमाने वाले झूलों, बांसुरियों. पीपाड़ी (गुबारे के साथ लगी छोटी बांसुरी) माटी के खिलोने. खट्टी-मीठी टॉफियां, तथा रंग बिरंगी कुल्फियां व फ्रुट में केले आदि लेने हेतु जी मचलता था. साथ ही तीर्थ मण्डल की और से प्रत्येक श्रद्धालु की दी जाने वाली भाती (मीठी बूंदी तथा नमकीन सेव) को लेने हेतु मन में उतावलापन बना रहता, लेकिन ये सब मन्दिर में भगवान पार्श्व प्रभु व भेरू बाबा के दर्शन किए बिना मुमकिन नही था. अतः जल्दी जल्दी दर्शन करने का प्रयास बना रहता, दर्शन करने के पश्चात तीर्थ स्थल पर बोली के तहत हासिल की गई नोकारसी रूपी सामूहिक भोज ग्रहण किया जाता, जिसमें मिठाई आदि व्यंजनों से जी खुश हो जाता था. हालाँकि आज भी भाती व नोकारसी की परम्परा तीर्थ मण्डल की और से बदस्तूर जारी हैं. लेकिन इस भौतिकता भरी फ़ास्ट फूडी संस्कृति में उसका विशेष कोई महत्व नही. मन्दिर में दर्शन तथा भोजन स्थल पर भोजन आदि को सम्पन्न करने के बाद हम झूमते- नाचते अभिभावकों की अंगुली पकड़े मेले प्रांगण में पहुंचते. हम सभी बच्चों को मेले में प्रदर्शित मनभावन खिलोने टॉफियां कुल्फियां दिलाई जाती तथा झूलों का आनन्द उठाया जाता, सचमूच में इन पलों की ख़ुशी व उमंग का कोई वर्णन नही हो सकता यह अलौकिक आनन्द की घड़ियां थी,ऐसे हसीन पलों व लम्हों का साल-साल भर से इंतजार रहता था, मेरा मानना हैं कि यह ख़ुशी व ये आनन्द वर्तमान की इस चकाचौंध भरी दुनिया में कत्तई व किसी कीमत पर नही मिल सकता, आज भले ही हमारे समक्ष महंगे से महंगे ब्रांड की जींस, गोग्लस, मोबाइल्स, वीडियो गेम्स, या कोई और आकर्षण क्यों ना मौजूद हो, उस दौर की अनूठी अनुभूति को प्रदान नही कर सकते, जब तीर्थ स्थल से बेलगाडी घर की और रुख करती तो मन वैसे ही उदास हो जाता जैसे हम किसी परिजनों से लम्बे अंतराल के लिए बिछुड़ रहे हों. हमारा उत्सुकता के साथ अगली पोह दशम के मेले का इंतजार बना रहता, यह तो सिर्फ शाब्दिक वर्णन हैं. लेकिन साहब उन अद्वितीय लम्हों को स्मृत कर पुनः अभावों व सिमित संसाधनो की दुनियां में लौटने का मन होता हैं... काश कोई लौटा दे मेरे बचपन के उन अनमोल पलों को,तथा बेशकीमती लम्हों को... ÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷===÷=÷=÷=÷= गणपत भंसाली 09426119871 Jasolwala@gmail.com

भारत के बोधिधर्म कैसे बन गए चीन में ‘ज़ेन’

चीन में वू नाम का एक राजा था, जो बौद्ध धर्म अनुयायी था। वह चाहता था कि भारत से कोई बौद्ध शिक्षक चीन आए और बौद्ध धर्म के संदेशों का प्रचार-प्रसार करे। राजा इंतजार करता रहा, लेकिन कोई भी बौद्ध गुरु नहीं आया।
जब राजा 6 साल का हो गया। फिर एक दिन यह संदेश आया कि दो महान, प्रबुद्ध गुरु हिमालय पार करके चीन आएंगे और बौद्ध धर्म के संदेशों का प्रचार करेंगे। राजा वू खुश हो गया।
कुछ समय बाद ची में दो भारतीय बौद्ध आए। वह थे बोधिधर्म और उनका एक शिष्य।
रेवती और बलराम की अनकही प्रेम कहानी- आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं कि, बोधिधर्म का जन्म दक्षिण भारत के पल्लव राज्य के राज परिवार में हुआ था। वह कम आयु में ही बौद्ध धर्म के प्रचारक बन गए थे। राजा ने जब बोधिधर्म की आयु के बारे में जाना तो उन्हें बहुत दुख हुआ। दूसरी तरफ, पर्वतों में महीनों की लंबी यात्रा से थके हुए बोधिधर्म भी राजा पर अपना कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए।
राजा निराश था लेकिन दोनों भिक्षुकों उसने स्वागत किया। उसने उन्हें शिविर में बुलाया और भोजन की व्यवस्था की। इसी बीच, राजा वू ने पूछा, ‘इस सृष्टि का स्रोत क्या है?’
बोधिधर्म राजा की ओर देखकर हंसते हुए बोले, ‘यह तो बड़ा बेवकूफी भरा प्रश्न है! कोई और प्रश्न पूछिए।’
राजा वू भीतर ही भीतर खुद को बहुत अपमानित और क्रोधित महसूस करते हुए भी, उसने अपने को संभाला और कहा, ‘मैं आपसे दूसरा प्रश्न पूछता हूं। मेरे अस्तित्व का स्रोत क्या है?’
यह सुनकर बोधिधर्म और भी जोर से हंसे और बोले, ‘यह तो और भी मूर्खतापूर्ण प्रश्न है! कुछ और पूछिए।’
राजा ने पूछा, बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए मैंने कई ध्यान कक्ष बनवाए हजारों अनुवादकों को प्रशिक्षित किया। मैंने इतने सारे प्रबंध किए हैं। क्या मुझे मुक्ति मिलेगी?
यह सुनकर बोधिधर्म गंभीर हो गए। वह खड़े हुए और अपनी बड़ी-बड़ी आंखें राजा की आंखों में डालकर बोले, ‘ क्या! तुम और मुक्ति? तुम तो सातवें नरक में झुलसोगे।’
उनके कहने का मतलब था कि बौद्ध धर्म के मुताबिक, मस्तिष्क के सात स्तर होते हैं। अगर कोई इंसान वह काम न करे जो उस वक्त जरूरी है, और उसकी बजाय कुछ और काम करता है, और यही नहीं, वह उन सभी कामों का लेखा-जोखा भी रखता है, तो इसका मतलब है कि ऐसे इंसान का मस्तिष्क सबसे नीच किस्म का है।
आलम ये था कि राजा वू को इनमें से कोई भी बात समझ नहीं आई। वह गुस्से से भर गया और बोधिधर्म को अपने राज्य से बाहर निकाल दिया। बोधिधर्म को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन राजा वू ने अपने जीवन को सुन्दर बनाने का एक मात्र आध्यात्मिक अवसर खो दिया।
दरअसल, ज़ेन को चीन ले जाने का काम बोधिधर्म का ही था। गौतम बुद्ध ने ध्यान सिखाया था। सैकड़ों सालों के बाद बोधिधर्म ने जब ध्यान को चीन पहुंचाया, तो वहां स्थानीय प्रभाव के कारण यह चान के रूप में जाना गया। यही चान जब आगे इंडोनेशिया, जापान और दूसरे पूर्वी एशियाई देशों तक पहुंचा, तो इसका नाम फिर बदला और वहां जाकर यह आखिर ज़ेन बन गया।

जीवन के मकान में रहे अच्छाइयों का प्रवास : आचार्य महाश्रमण

कडूर और बिरूर में अहिंसा यात्रा का भव्य स्वागत  कडूर, कर्नाटक-  सद्भावना नैतिकता और नशामुक्ति इन तीनों आयामों से जन-जीवन का कल्याण कर...