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Saturday, 23 September 2017

आचार्य श्री रामलाल जी मा सा द्वारा प्रदान श्री सुमित जी राठोड को दीक्षा व श्रीमति अनामिका की दीक्षा निरस्त

सूरत मे आचार्य श्री रामलाल जी मा सा द्वारा श्री सुमित जी राठोड को दीक्षा प्रदान की गयी  व श्रीमति अनामिका की दीक्षा निरस्त की गयी ! एक चिंतनीय न मननीय विषय है ! श्री सुमित जी राठोड  व श्रीमति अनामिका की दीक्षा की घोषणा के बाद से ही शोसल मीडिया व पूरे देश मे जैन अजैन जगह जगह इस दीक्षा के विरोध मे आवाज उठने लगी थी !   यह कोई पहली बार नही हुआ की कुछ इस तरह दीक्षा पर विरोधात्मक आवाज न उठी हो ! मगर चिंतनीय विषय यह है की सामान्य तोर पर जैन धर्म मे दीक्षा सभी सम्प्रदायो मे होती है मगर विरोध कभी कभार होता है ओर यह विरोध तब होता है जब मानवीय संवेदना  व सभी पहलुओ को दर किनार कर के आचार्य भगवंत दीक्षा प्रदान करते है ! आज जैन समाज स्मृध है साथ मे  जैन समाज के सभी घटक श्वेतांबर हो या दिगंबर सभी मे आचार्य , साधू संत , साध्वी वृंद विद्वान है उनकी तप व साधना अनुमोदनीय है ! जैन धर्म करुणा , दया , क्षमा के मार्ग पर चलने वाला धर्म है ! सूरत मे इस दीक्षा के  बारे मे जब मे सुना मेरे मन मे विचार उठे यह दीक्षा जंहा एक दो साल की बच्ची को अपने परिवार के भरोषे छोड़कर माँ व पिता साधना मार्ग की ओर अग्रसर हो रहे है कहा तक उपयुक्त मेने जैन धर्म के श्वेतांबर व दिगंबर घटक के  आचार्यो व साधू संतो से इस मसले पर चर्चा की मेरी जिज्ञासा का  समाधान चाहने की कोशिस की !  जैन समाज के अग्रणीयों से भी विचार मंथन किया उसमे ज़्यादातर साधू संतो व जैन समाज के अग्रणीयों ने मुझ से सहमत थे मगर फिर भी उनकी चुप्पी का कारण पूछा तो उन्होने एक ही बात कही हम सामाजिक तोर पर अपनी बात नही कहना चाहते क्यू की समाज के ही लोग हमे समाज द्रोही घोषित कर देंगे ! प्रश्न यह उठता है हम उस समाज से है जो हर तरीके से स्मृध है मगर उस समाज मे हम अपनी वेचारिक स्वतन्त्रता के तहत अपनी बात नही रख सकते या रखने की कोसिश नही करते क्यू की आम समाज के लोगो मे यह संदेश गलत जाएगा की हम समाज विरोधी ताकतों के साथ है बड़ी विडम्बना है ऐसा क्यू ? 
मे भी एक पत्रकार हु अपने विचारो व सामाजिक बुराई को ब्लॉग के माध्यम से रखता हु क्या मे समाज विरोधी हु ? क्या हम जिस धर्म से जुड़े है उस धर्म मे अपनी विचारधारा नही रख सकते ? बड़ा दर्द होता है यह सोचकर 
जब मेने देखा जगह जगह से   विरोध के स्वर उठने लगे है हमारे आदरणीय श्री नाकोड़ा जैन कोन्फ्रेंस के रास्ट्रीय अध्यक्ष इंदोर निवासी श्री अक्षय जी जैन से बात हुई उन्होने पूरी दृढ़ता से विरोध व्यक्त किया क्यू की उन्हे भी एक अबोल बच्ची के प्रति संवेदना थी ! उनके विचारो को सुनकर बड़ा अच्छा लगा ! एक सक्रिय कार्यकर्ता उज्जैन के श्री मुकेश जैन ने इस विषय पर सज्ञान  लिया ओर त्वरित कार्यवाही की मानवाधिकार आयोग व सरकारी अफसरो ने संज्ञान लिया ! पूरी अधिकृत सूचना तो प्राप्त नही हुई मगर अपुष्ट सूत्रो से ज्ञात हुआ की कुछ दबाव बना ओर एक दीक्षा श्रीमति अनामिका जी की फिलहाल स्थगित कर दी गयी ! मेरी समझ से परे है इतना विवाद होने के बाद भी जैन धर्म की किसी भी संस्था व साधू संतो ने इस दीक्षा पर अपना   विरोध दर्ज नही कराया ओर न ही आचार्य श्री रामलाल जी मासा को संदेश भेज कर इस दीक्षा पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया ! एक दिगंबर आचार्य श्री सूर्य सागर जी ने यू ट्यूब के माध्यम से एक विडियो प्रेषित किया जिसमे अनुमोदनीय रूप से आगम के विपरीत दीक्षा बताई ! खेर अब यह  दीक्षा   कब तक स्थगित हुई है बच्ची के बालिग होने तक या कुछ चंद दिनो के लिए यह तो समय बताएगा मगर जैन समाज मे इस तरह की दीक्षा से जुड़े  मुद्दो पर सभी साधू संतो को समाज के लोगो को साथ लेकर विचार मंथन करना जरूरी है ! आज एक बेटी को दीक्षा स्थगित होने से प्रेम व वात्सल्य की जीत हुई है ! संवेदना व्यक्त करने वालो की जीत हुई है मगर फिर भी मेरे मन मे दर्द है की आचार्य श्री जो कठिन तप व चर्या करते है उन्हे असाधना हुई ! मे क्षमा याचना करता हु आचार्य श्री सहित पूरे जैन धर्म संघ के साथ की मेरे व मेरे अग्रज व अनुज जिन मित्रो ने इस दीक्षा का विरोध किया उनकी तरफ से भी मे क्षमा याचना करता हु ! मेरी आस्था आज भी अटल है मेरे लिए जैन धर्म के सभी साधू संत आचार्य भगवंत वंदनीय है ! बस एक ही विनम्र अनुरोध की कुछ इस तरह दीक्षा पर आप विचार करे मंथन करे ! जिससे किसी तरह की  मानवीय संवेदना को चोट न पहुचे ! 
लेखक -- उत्तम जैन ( विद्रोही )
संपादक - विद्रोही आवाज़ 
      

Thursday, 4 May 2017

आचार्य श्री महाश्रमण जी के जन्मोत्सव व पटोत्सव पर खूब खूब अभिवंदना गुरुदेव के अवदान व सक्षिप्त जीवन परिचय

प्रभु स्वीकारो म्हारी
अभिनंदना आपके ५६
वे जन्म दिवस पर शत
शत वंदन .
जय जय ज्योति चरण
जय जय महाश्रमण
संघ पुरुष चिरायु हो
‘जिस देश में गंगा बहती है’ उस देश के वासी होने का हमारा गर्वबोध उस समय चकनाचूर हो जाता है, जब हमारा अपने आसपास के परिवेश में आए दिन वैमनस्य, हिंसा, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, सांप्रदायिक उन्माद आदि की घटनाओं से वास्ता पड़ता है। भ्रष्टाचार, घृणा और नशाखोरी के जख्मों से त्रस्त हमारे देश और समाज में अहिंसा, नैतिकता, सद्भावना, सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की अलख जगाने के लिए देश व विदेश मे अहिंसा यात्रा द्वारा अलख जगाने वाले आचार्य महाश्रमण के जन्मोत्सव व पटोत्सव पर खूब खूब अभिवंदना
भारत की गौरवशाली अध्यात्म परंपरा में श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ का अपना एक विशिष्ट स्थान है। इस धर्म संघ के वर्तमान अधिशास्ता आचार्य महाश्रमण अपने उपदेशों के आलोक से प्रतिदिन सैंकड़ों लोगों के जीवन के रूपांतरण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ के मार्गदर्शन से आलोकित आपके व्यक्तित्व की आभा से समाज अभिभूत है। आपके उपदेंशो की ऊष्मा से हजारों लोगों के जीवन की दशा और दिशा परिवर्तित हुई है। ऐसे ऊर्जावान संत महायोगी महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी मानवता के लिए समर्पित जैन तेरापंथ के उज्जवल भविष्य है। अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी की उन्होंने अनन्य सेवा की। तुलसी-महाप्रज्ञ जैसे सक्षम महापुरूषों द्वारा वे तरासे गये है।वे अल्पभाषी है।९ सितंबर १९८९ को महाश्रमण पद पर आरूढ़ एवं जन्ममात प्रतिभा के धनी आचार्य महाश्रमण अपने चिंतन को निर्णय व परिणाम तक पहुंचाने में बडे सिद्धहस्त हैं। महाश्रमण उम्र से युवा है, उनकी सोच गंभीर है युक्ति पैनी है, दृष्टि सूक्ष्म है, चिंतन प्रोढ़ है तथा वे कठोर परिश्रमी है। उनकी प्रवचन शैली दिल को छूने वाली है। आचार्य श्री की प्रज्ञा एवं प्रशासनिक सूझबूझ बेजोड़ है। गौर वर्ण, आकर्षक मुखमंडल, सहज मुस्कान से परिपूर्ण बाह्म व्यक्तित्व एवं आंतरिक पवित्रता, विनम्रता, दृढ़ता, शालीनता व सहज जैसे गुणों से ओतः प्रोत आचार्य महाश्रमण से न केवल तेरापंथ अपितु पूरा धार्मिक जगत्‌ आशा भरी नजरों से निहार रहा है और उनकी महानता को स्वीकार कर रहा है। तेरापंथ धर्म संघ के 11वे अधिशास्ता जिनका जीवन मानव मात्र के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गया।
जिनका विलक्षण व्यक्तित्व और ओजस्वी वाणी का प्रवाह निराशा मुक्ति का साधन बन गया। जिनका शांत आभामंडल दुःख और तमस के अंधियारो में उजाला बन गया।
उस महातपस्वी महामानव का संक्षिप्त जीवन परिचय:-
जन्म– राजस्थान के सरदारशहर में श्री झूमर मलजी और श्रीमती नेम देवी के यहाँ वेशाख शुक्ल 9 वि.स.2019 के दिन एक बालक का जन्म नाम रखा मोहन।
वैराग्य भाव:-तेरापंथ मनीषी मंत्री मुनि श्री सुमेरमल जी स्वामी का वि.स.2030 2031 का चातुर्मास सरदार शहर में बालक मोहन के लिए कठोती में गंगा सामान हुआ।
वि.स. 2030 भद्रव शुक्ल षष्ठी का दिन मुनि श्री सुमेरमल जी की प्रेरणा से नव दीप जला और आजीवन विवाह न करने का त्याग।
प्रतिक्रमण के आदेश के पश्चात आचार्य श्री तुलसी के निर्देशानुसार मुनि श्री सुमेरमल जी ने वैशाख शुक्ल 14वि.स.2031 को वैरागी मोहन और वैरागी हीरालाल की दीक्षा का आदेश।
दीक्षा-वैशाख शुक्ल 14 ( 5मई 1974) को सरदार शहर में गधेया जी के नोहरे में हजारो की उपस्थिति में मुनि श्री सुमेरमल जी ने दीक्षा प्रदान की। नाम रखा मुनि श्री मुदित कुमार।
गुरु दर्शन-सरदारशहर चातुर्मास की परिसम्पन्नता पर श्री डूंगरगढ़ में आचार्य श्री तुलसी के दीक्षा बाद प्रथम बार दर्शन ।
गुरु की सेवा का अवसर-वि.स. 2041 ज्येष्ठ शुक्ल 8 को लाडनू में गुरुदेव तुलसी ने पंचमी समिति की पात्री की जिम्मेदारी के साथ ही मुनि मुदित की गुरुदेव की व्यक्तिगत सेवा में नियुक्ति। लगभग 12वर्षो तक पात्री का ये सौभाग्य मुनि मुदित को मिला।
अन्तरंग सहयोगी:-वि.स.2041 माघ शुक्ल7 मर्यादा महोत्सव का सुअवसर उदयपुर के विशाल जन भेद्नी के समक्ष मुनि मुदित को युवाचार्य श्री महाप्रज्ञजी का अन्तरंग सहयोगी बनाया गया।
साझपति– वि.स.2043वैशाख शुक्ल 4 ब्यावर का तेरापंथ भवन में गुरुदेव तुलसी ने मुनि मुदित को साझपति बनाया।
महाश्रमण-वि.स.2046 भाद्रपद शुक्ल 9 योगक्षेम वर्ष का आयोजन लाडनू जैन विश्व भारती सुधर्मा सभा में आचार्य श्री तुलसी ने मुनि मुदित कुमारजी को महाश्रमण अलंकरण प्रदान किया।
अनोखा उपहार-वि.स.2047 मार्गशीष माह में सिवांची मालानी की यात्रा के बाद आचार्य श्री तुलसी ने अनोखा उपहार दिया जो महाश्रमण के समर्पण और तुलसी के विश्वास का रूप बना। गुरुदेव् ने फ़रमाया की “यदि कोई कह दे की मुनि मुदित सुविधावादी बन गए या मेरे ध्यान में कोई सुविधावादी प्रवर्ति आती हे तो मुनि मुदित को 3 घंटे खड़े खड़े स्वाध्याय करना होगा।” पर एसा कभी नहीं हुआ।
पुनः महाश्रमण पद-वि.स.2051 माघ शुक्ल 6 को देल्ही में आयोजित आचार्य श्री महाप्रज्ञ पदाभिषेक समारोह में आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के अन्तरंग सहयोगी के रूप में पुनः महाश्रमण बनाया गया।
युवाचार्य पद-वि.स.2054 भद्रव शुक्ल 12 को चोपड़ा हाई स्कूल गंगाशहर के विशाल प्रागंण में अपार जनता के मध्य आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने मुनि श्री महाश्रमण को युवाचार्य पद पर शोभित किया।
महाश्रमिक महातपस्वी-10अगस्त2007 उदयपुर में युवाचार्य श्री की श्रम साधना और अनात्रंग तप का मूल्या्कन करते हुए आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने आपश्री को महाश्रमिक और महातपस्वी का संबोधन प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने कहा “आज से लोग इन्हें युवा मनीषी कहे न कहे महातपस्वी महाश्रमण अवश्य कहे।”
आचार्य पद-9 मई 2010 सरदार शहर की पवित्र भूमि पर दोहपर को लगभग 2 बज का 10-12मिनिट पर तेरापंथ का दशम सूर्य अस्त हो गया। आचार्य श्री महाप्रज्ञजी की आत्मा इस लोक को छोड़ दुसरे लोक की यात्रा पर गतिमान हो गई।
भिक्षु शासन की मर्यादा के अनुसार एक आचार्य के दिवंगत होते ही स्वतः युवाचार्य आचार्य बन जाते है।
पदाभिषेक पर्व-23 मई2010 गाँधी विद्या मंदिर सरदारशहर के विशाल प्रांगन में चतुर्विध धर्म संघ ने अपने एकादश अधिशास्ता के पदाभिषेक पर्व वर्धापन समारोह आयोजित किया। जन्म दीक्षा और आचार्य पद एक ही भूमि पर सम्पादित हुए सरदारशहर की पावन भूमि।
आचार्य श्री महाश्रमण जी को पट्टासीन होने का अनुरोध करते हुए साध्वी प्रमुखाश्रीजी ने कहा
“आहिस्ते से उठो आर्यवर! पट्टासीन बनो मंगल पल,
सविनय बद्धांजलि शुभसंशा,महाप्रज्ञ आसन हो अविचल।।”
पट्टासीन होने के पश्चात् वयोवृद्ध संत मुनि श्री सुमेरमल जी “सुदर्शन” ने दायित्व की प्रतिक पञ्च सवस्तिमय अमल धवल पचेवडी ओढ़ा कर आचार्य पदाभिषेक की महत्वपूर्ण विधि सम्पादित की ।
ज्ञान दर्शन चरित्र और तप-मोक्ष मार्ग के चरुंग धर्म की साधना में संलिग्न आचार्य श्री महाश्रमण जी के कुशल नेतृत्व में पवित्रता तेजस्विता गंभीरता निरंतर उचाईयो को और बढे यही मंगलकामना ।
उनका आशीर्वाद हमारे जीवन में सदा बना रहे स्वयं के प्रति भी यही मंगलकामना
लेखक – उत्तम जैन (विद्रोही )
संपादक – विद्रोही आवाज़

Friday, 28 April 2017

श्री जैन श्वेताम्बर नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ ओर श्री नाकोड़ा जैन कोन्फ्रेंस

श्री नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ राजस्थान के उन प्राचीन जैन तीर्थो में से एक है आज मेवानगर की ऐतिहासिक सम्रद्ध, संस्कृतिक धरोहर का श्रेष्ठ प्रतीक है संवत १९५९ - ६० में साध्वी प्रवर्तिनी श्री सुन्दरश्रीजी म.सा. ने इस तीर्थ के पुनउद्धार का काम प्रारंभ कराया और गुरु भ्राता आचार्य श्री हिमाचलसूरीजी भी उनके साथ जुड़ गये । इनके अथक प्रयासों से आज ये तीर्थ विकास के पथ पर निरंतर आगे बढता विश्व भर में ख्याति प्राप्त कर चूका है । वह भूमि कभी बहुत सोभाग्यशाली हो उठती है, जो तीर्थ स्थल बन जाती है । जहा जाने पर एक पवित्र भाव आने वाले के ह्रदय में सहज पैदा हो जाता है श्रधा और आस्था से मन भर जाता हो ! मुझे याद कुछ समय पूर्व नाकोड़ा तीर्थ भूमि पर पहली बार इंदौरवासियो ने भव्य नाकोड़ा भैरव का 1008 चालीसा अनुष्ठान- सिद्ध महापूजन किया था ओर एक इतिहास बनाया था ! उसी क्रम मे सदेव फेसबूक पर मे एक नाकोड़ा भक्त से प्रभावित हुआ उनकी भक्ति व नाकोड़ा भेरव चालीसा के प्रति सजगता व श्रदा देख मे खुद सोचने को विवश हो गया ! सदेव दादा की भक्ति मे झुमते हुए जब मे देखता मुझे लगा इन महानुभाव के बारे मे मुझे कुछ समझना चाहिए ! मेने एक पत्रकार होने के नाते जब उन महानुभाव से बात की वो थे श्री अक्षय जैन जो वर्तमान मे श्री नाकोड़ा जैन कोन्फ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष है जब ओपचारिक बात के बाद मुझे अक्षय जी ने बताया मे आज अपने व्यवसाय से कुछ हद तक निवृत हो गया हु ओर अब मेरा एक ही लक्ष्य है घर घर मे नाकोड़ा चालीसा पाठ हो इस हेतु मेने निस्वार्थ भाव से श्री नाकोड़ा जैन कोन्फ्रेंस का गठन किया है ! जब मुझे अक्षय जी ने बताया श्री नाकोड़ा जैन कांफ्रेस भैरव भक्तो का समुदाय ग्रुप है। यह नाकोड़ा जैन कांफ्रेस किसी भी तरह से कोई शुल्क आर्थिक लेनदेन इत्यादि नही लेता है, न ही कोई गुप्त एजेंडा और राजनितिक महत्वाकांक्षा जैसा कोई मकसद को जगह नही है। कांफ्रेस भैरव की उपासना भक्ति साधना का एक फोरम है। इसमें राजनितिक विवाद और मनभेद को कतई स्थान नही है। कांफ्रेस के संरक्षक श्री प्रकाश जी सुराणा का अद्वितिय सहयोग मिलता है। कांफ्रेस परिवार विस्तार के लिए राजस्थान ,महाराष्ट्र अध्यक्ष श्री मोहन लाल जी जैन, गुजरात कार्यकारी अध्यक्ष राकेश जी कोठारी, कांफ्रेस के उपाध्यक्ष श्री गुलाब जी भंडारी (पाली)श्री प्रवीण जी जोशी(रायपुर) सौ.पलीता जी कर्णावट राष्ट्रीय महामन्त्री श्री सिद्धार्थ जी कोठारी महिला अध्यक्ष सीमा जी भंडारी महामन्त्री स्मिता सांखला श्री नाकोड़ा जैन कांफ्रेस की राष्ट्रीय और राज्यवार इकाइयां भैरव भक्ति उपासना साधना और समाजिक समरसता के पथ पर अग्रसर है। तमिलनाडू से आर.चन्द्रशेखर जी पगारिया पंजाब से अध्यक्ष गोरव जी जैन कर्नाटक इकाई अध्यक्ष पुखराज जी बेताला भी सक्रियता से जुड़ अभियान को आगे बढ़ रहे है। राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य श्री सुशील जी जैन बंगलोर, श्री विक्रम जी शाह , अशोक जी बावेल,सुशील जैन नालछा वाले, ज्योत्स्ना सांकला , निर्मल जी सखलेचा तेजमल जी सराफ ,सभी पधाधिकारी की मेहनत और भैरव भक्ति उपासना भैरव भक्तो के एकीकरण को नई ऊर्जा दे रही है। । श्री नाकोड़ा जैन कांफ्रेस एक डायरेक्ट्री प्रकाशित करने जा रहा है जिसमे भैरव भक्ति , पूनम मण्डल नाकोड़ा पैदल संघ , अनवतरनाकोड़ा यात्रा करने वाले भक्तो का परिचय और देश के प्रमुख शहरों में स्थित नाकोड़ा भैरव मन्दिरो का उल्लेख प्रकाशित किया जा रहा है। यह डायरेक्ट्री निशुल्क होगी। नाकोड़ा जैन कांफ्रेस की डायरेक्ट्री का कुशल सम्पादन श्री पार्थ जी जैन सम्पादन यश बोथरा ऋषभ मेहता की टीम मिलकर कर रहे है। इस में अब तक 19500 से अधिक नाकोड़ा भैरव भक्तो का डाटा एकत्रित हो गया है। साथ मे नाकोड़ा ट्रस्ट के रणवीर जी भी अपनी अनूठी भक्ति से सेवा दे रहे है मुझे लगा एक भेरव भक्त श्री अक्षय जी जैन को नाकोड़ा भेरव का आशीर्वाद ही प्राप्त है की आज तन मन धन से नाकोड़ा चालीसा पाठ घर घर मे हो मिशन के साथ आगे बढ़ रहे है !सबसे बड़ी बात उनकी अस्वस्थता के बाद भी नित्यक्रम मे 51 चालीसा का पाठ करना शामिल है यह आगाढ आस्था का मे कायल हो गया ! मे अगर कहु कबीर दास का एक दोहा है गुरु गोविंद दोहु खड़े कांके लागू पाये , बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए ! यही हुआ मेरे साथ जब से मेरा अक्षय जी से संपर्क हुआ मेरा नित्य क्रम चालीसा पाठ का हो गया यही नही मेरे पुत्र भी नाकोड़ा चालीसा पाठ नित्य करने लगे है ! मुझे दादा के दरबार तक पहुचाने मे मेरे गुरु की भूमिका निभाने वाले श्री अक्षय जी जैन है ! मुझे महसूस होता है दादा का आशीर्वाद है पुत्रो मे अच्छे संस्कारो का जन्म हुआ है ! एक ओर परिचय हुआ जैन संगीतकार मीनाक्षी नागोरी का जब भी मेने देखा है कोन्फ्रेंस से हर भक्तो को जोड़ना ओर नाकोड़ा चालीसा पाठ करने का संदेश देना जेसे एक जुनून चढ़ा है ! दादा नाकोड़ा जैन कोन्फ्रेंस के मिशन को सदेव आगे बढ़े ऐसी शक्ति राष्ट्रीय कमेटी व सभी राज्य स्तरीय कमेटी को दे की जन जन अपने दिनचर्या की शुरुआत नाकोड़ा चालीसा से करे ! मे उन भेरव भक्तो से अनुरोध करना चाहूँगा जो कोन्फ्रेंस की गतिविधियो पर आक्षेप लगते है एक बार श्री नाकोड़ा जैन कोन्फ्रेंस से बिना पद लोलुपता से जुड़े ओर फिर देखे भक्ति मे शक्ति ....... जय श्री नाकोड़ा भेरव की
एक भेरव भक्त --- उत्तम जैन ( विद्रोही )        

Tuesday, 25 April 2017

पुस्तकों से पाठको की बढ़ती दूरी एक चिंताजंक समस्या

आज सूचना तकनीक ने भले ज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी है, पर पुस्तकें आज भी विचारों के आदान-प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम हैं। आम आदमी के विकास के लिए जरूरी शिक्षा और साक्षरता का एकमात्र साधन किताबें हैं। यह सच है कि सूचनाओं के प्रसार में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मुद्रण माध्यमों पर भारी पड़ रहा है। पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी कोने में कंप्यूटर या टीवी स्क्रीन पर सूचनाओं को पहुंचाया जा सकता है। मगर इस बात को भी स्वीकार करना होगा कि किताबें सर्वाधिक संयमित माध्यम हैं। वे पाठक को उनकी क्षमता के अनुरूप ज्ञान का आकलन करने और जानकारियों का गहराई से विश्लेषण और समालोचना का मौका प्रदान करती हैं। संचार माध्यम बदलते हुए विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्र बनते जा रहे हैं। पिछले दो दशक में सूचना तंत्र अत्यधिक सशक्त हुआ है, उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं, लेकिन पुस्तक का महत्त्व इस विस्तार के बावजूद अक्षुण्ण है। यही नहीं, कई स्थानों पर तो पुस्तक व्यवसाय में काफी प्रगति हुई है। भले क्षणिक सूचना या शैक्षिक उद्देश्य से इंटरनेट का सहारा लेने वाले लोग बढ़े हों, लेकिन विभिन्न व्यापारिक वेबसाइटों से पुस्तकें खरीदने वालों की संख्या भी बढ़ी है। मगर इसका यह अर्थ नहीं कि पुस्तक मेलों या प्रदर्शनियों की संख्या कम हुई या वहां भीड़ कम हुई है।
विकासमान समाज पर आधुनिक तकनीक का गहरा असर हो रहा है। इनसे जहां भौतिक जीवन आसान हुआ है, वहीं पर निर्भरता भी बढ़ी है। इससे हमारे जीवन का मौलिक सौंदर्य प्रभावित हो रहा है। रचनात्मकता पिछड़ और असहिष्णुता उपज रही है। ऐसे में पुस्तकें आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन बिठाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
भारत में महंगाई, प्रतिकूल सांस्कृतिक-सामाजिक-बौद्धिक परिस्थितियों के बावजूद पुस्तक प्रकाशन एक क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है। छपाई की गुणवत्ता में परिवर्तन के साथ-साथ विषय में विविधता आई है। विश्व में भारत ही शायद एकमात्र ऐसा देश है, जहां चौबीस भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित होती हैं।
इसके बावजूद आज भी आम घरों में किताबें घर या बच्चों के लिए ‘आवश्यक’ की सूची में नहीं आ पाई हैं। इसके दो पहलू हैं- एक तो पुस्तक साबुन-तेल की तरह उपभोक्ता वस्तु नहीं है और न ही उसका इस तरह प्रचार होता है। दूसरा, आम पाठक के लिए पुस्तक महज उसकी जरूरत पर याद आने वाली वस्तु है। इसका एक विपरीत असर भी हुआ है- खासकर हिंदी और कई भारतीय भाषाओं में पुस्तकों की विशाल संख्या में ‘स्वांत: सुखाय’ वाला हिस्सा ज्यादा बड़ा हो गया है। कई वरिष्ठ और नवोदित लेखक अपना पैसा लगा कर एक हजार किताबें छपवाते हैं। फिर यार-दोस्तों की चिरौरी कर अखबार-पत्रिकाओं में उनकी समीक्षा प्रकाशित कराते हैं। जुगत से कुछ सरकारी खरीद कराने या फिर सरकार पोषित पुरस्कार जुटाने तक सिमट कर रह गई है पुस्तकों की दुनिया। फिर सब यही रोना रोते रहते हैं कि पुस्तकें बिकती नहीं हैं। कई लोगों के लिए तो पुस्तकें आयकर बचाने और काला धन सफेद करने का औजार हैं। यह भी एक चिंता की बात है कि देश के बड़े हिस्से में बच्चों के लिए किताब का अर्थ पाठ्यपुस्तक से अधिक नहीं है। वहां न तो पुस्तकालय हैं और न पाठ्येतर पुस्तकों की दुकानें। यदा-कदा जब वहां तक कुछ पठनीय पहुंचता है, तो खरीदा भी जाता है और पढ़ा भी।
यह देश के आम मध्यवर्ग की मानसिकता है। बच्चों के मानसिक विकास की समस्याओं को आज भी गंभीरता से नहीं आंका जा रहा है। मध्यवर्ग अपने बच्चों की शिक्षा और मानसिक विकास के लिए अँग्रेजी स्कूल में पढ़ाई और अच्छा खाने-खिलाने से आगे नहीं सोच रहा है। यही कारण है कि ‘अपने प्रिय को उपहार में पुस्तकें दें’ नारा व्यावहारिक नहीं बन पाया है।
इन दिनों दुनिया का व्यापारिक जगत भारत में अपना बाजार तलाशने में लगा हुआ है। दैनिक उपभोग की एक चीज बिकते देख दर्जनों कंपनियां वही उत्पाद बनाने-बेचने लग जाती हैं। होड़ इतनी कि ग्राहकों को रिझाने के लिए छूट, ईनाम, फ्री सर्विस की झड़ी लग जाती है। आम आदमी की खरीद क्षमता बढ़ रही है। पैसे के बहाव के इस दौर में भी किताबें दीन-हीन-सी हैं। इतनी निरीह कि हिंदी प्रकाशक को अपनी पहचान का संकट सता रहा है। किताबों की लोकप्रियता में कई बातें आड़े आ रही हैं- प्रकाशकों में अच्छी पुस्तकें छापने और उन्हें बेचने की इच्छाशक्ति का अभाव, पढ़े-लिखे समाज का किताबों की अनिवार्यता को न समझना और बाजार की अनुपस्थिति। यह कड़वा सच है कि प्रकाशक किताबों के लिए डीलर, विक्रेता तलाशने के बजाय एक जगह कमीशन देकर ‘सरस्वती’ का सौदा करना अधिक सहूलियत समझते हैं। आखिर यह क्यों नहीं सोचा जाता कि लोकप्रिय कहे जाने वाले साहित्य की लाखों में बिक्री का एकमात्र कारण यह है कि वह हर गांव-कस्बे के छोटे-बड़े स्टॉलों पर बिकता है। तथाकथित दोयम दर्जे का साहित्य प्रकाशित करने वाला प्रकाशक जब इतनी दूर तक अपना नेटवर्क फैला लेता है, तो सात्विक साहित्य क्यों नहीं? हमारे देश की तीन-चौथाई आबादी गांवों में रहती है और दैनिक उपभोग का सामान बनाने वाली कंपनियां अपने उत्पाद का नया बाजार वहां खंगाल रही हैं। दुर्भाग्य है कि किताबों को वहां तक पहुंचाने की किसी ठोस कार्य-योजना का दूर-दूर तक अता-पता नहीं है। गांव की जनता भले कम पढ़ी-लिखी है, मगर वह सुसंस्कृत है। वह सदियों से दुख-सुख झेलती आ रही है। इसके बावजूद वह तीस-चालीस रुपए की रामायण वीपीपी से मंगवा कर सुख महसूस करती है। आजादी के इतने साल बाद भी गांव वालों की रुचि परिष्कृत कर सकने वाली किताबें प्रकाशित नहीं हो सकीं। कुल मिला कर पुस्तकों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए लेखक, प्रकाशक और वितरकों की सक्रियता जरूरी है।
लेखक - उत्तम जैन
संपादक - विद्रोही आवाज़


Thursday, 13 April 2017

हमारा कुलभूषण जाधव दूसरा सरबजीत न बने

जब भारत की आम जनता , राजनेता और मीडिया ईवीएम की गडबडी, और अलवर में स्थित  गौरक्षकों द्वारा पहलू खां की हत्या के मामले को लेकर लीन थे उस समय एक व्यथित खबर थी पड़ोसी देश पाकिस्तान में एक निर्दोष भारतीय कुलभूषण जाधव को एजेंट बताकर फांसी की सजा सुनाई जा रही थी. जाधव पर पाकिस्तान में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के लिए काम करने का आरोप लगा है. हालाँकि भारत सरकार द्वारा इन आरोपों का लगातार खंडन करने के बावजूद भी पाकिस्तान ने कुलभूषण को मौत की सजा सुना दी है. भारतीय नौसेना के पूर्व कमांडर, कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी सेना ने कोर्ट मार्शल की कारवाई में जासूसी करने, तोड़फोड़ की कारवाई और ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट के तहत सजा सुनाई है. यह सजा पाकिस्तान की उस सेना ने सुनाई जिस पर बलूचिस्तान से 18 हजार लोगों को गायब करने के आरोप है. करीब 5 हजार लोग जेलों में बंद है जिनमें सिर्फ दो सौ लोगों को ही क़ानूनी मदद मांगने की अपील दायर करने का मौका दिया गया.दरअसल कुलभूषण अपनी कार्गो कंपनी चलाता था और उसी सिलसिले में ईरान व्यापार के लिए गया था जहां से अगवा कर लिया गया. बलूचिस्तान से गिरफ्तारी दिखाए जाने के बाद से भारत कुलभूषण से मिलने की उसे वियना समझोते के तहत क़ानूनी मदद देने की इजाजत मांग रहा है लेकिन इजाजत देने की बजाए एकतरफा सजा सुना दी गई. वैसे इस खबर का टीवी चैनलों प्रिन्ट मीडिया के माध्यम से भरपूर विश्लेषण हो चूका है. कुलभूषण अभी जिन्दा है या नहीं इस पर भी उपापोह की स्थिति बरकरार मानी जा रही है. संसद में राजनेता एक स्वर में पाक के इस नापाक फैसले की निंदा भी कर रहे है. पर सवाल यह कि संसद की निंदा और मीडिया के शोर से क्या पाकिस्तान जाधव को छोड़ देगा?
दरअसल पाक सरकार से लेकर वहां के बुद्धिजीवी वर्ग तक को पता है कि कुलभूषण जाधव निर्दोष है किन्तु पाकिस्तानी सेना और हुक्मरान बलूचिस्तान में अपने पाप छिपाने के लिए जाधव की बलि दे रहे है ताकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वह यह बता सके कि देखिये साहब बलूचिस्तान में कोई परिंदा भी आजादी नहीं मांग रहा बस यहाँ तो सब कुछ भारत अपने गुप्तचर भेजकर करा रहा है. जबकि पाकिस्तान, सिवाय एक संदिग्ध टेप के, कुलभूषण जाघव के खिलाफ कोई भी सबूत विश्व को नही दे सका. यदि ऐसा होता तो वह अब तक अंतराष्ट्रीय जगत में भारत को शर्मसार कर चुका होता. इस बात से भी पाक सेना और सरकार अलग-अलग स्टेंड लेकर हासियें पर खड़ी नजर आ रही है.
लगभग पूरा मामला बिलकुल उसी तरह दिख रहा है जिस तरह सरबजीत के केस में देखने को मिला था. बस अंतर इतना है कि दोनों ओर की सरकार बदली है बयान और कारनामे पूर्व की भांति ही नजर आ रहे है.जो लोग आज पाकिस्तान से वियना समझोते के तहत कारवाही करने का सपना पाले है उन्हें समझना चाहिए कि जो पाकिस्तान शिमला, लाहौर और ताशकंद जैसे समझोतों की धज्जियां उड़ा चूका है उससे वियना समझोते का सपना पालना बेमानी होगा और साथ में इस कटु सत्य को भी स्वीकार करना होगा कि पाकिस्तान आज चीनी अधिकृत राज्य की भांति कार्य रहा है बस वहां की इमारतों पर सरकारी स्तर पर चीन का ध्वज लहराया जाना बाकी शेष बचा है. ऐसे में यहाँ एक नहीं बहुतेरे सवाल पाकिस्तान के बुर्के में बंद कानून से बेपर्दा हो रहे है. कुलभूषण जाधव पर कोई हत्या या हिंसा से जुडा आरोप नहीं है उसे सिर्फ शक के आधार पर फांसी की सजा दी जा रही है वो भी उस पाकिस्तान में जहाँ कई हजार लोगों का हत्यारा तालिबान का जनक बिन लादेन, अल जवाहिरी और मुल्ला उमर जैसे मानवता के हत्यारों को महिमामंडित किया गया हो.
सवालों का सिलसिला सिर्फ पाकिस्तान में ही बंद नहीं होता यदि सवाल भी सीमापार कर भारत का रुख करें तो भारत में मानवाधिकारों को लेकर हो हल्ला मचाने वाले याकूब मेनन की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट में रतजगा करने वाले भी कुलभूषण के मामले में मौन दिखाई पड़ रहे है. कौन नहीं जानता कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता शत्रुघ्न सिन्हा, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, स्वामी अग्निवेश समेत 40 जानी-मानी हस्तियों ने 1993 के मुंबई बम धमाकों के आरोप में मौत की सजा पाए याकूब मेमन की फांसी पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पास लेटर भेजा था उस याकूब को बचाने के लिए जिसके ऊपर करीब आठ सौ से ज्यादा मासूम लोगों की हत्या हजारों बेगुनाहों को घायल करने का आरोप था.
ऐसा नहीं है कि आज यह लोग जिन्दा नहीं है या अपने पदों पर आसीन न हो! इनमें वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी, कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर. सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, वरिष्ठ पत्रकार एन. राम, आनंद पटवर्धन और महेश भट्ट के नाम शामिल थे जो अक्सर आज भी टीवी स्टूडियों में बैठकर मानवता और मानवाधिकारों पर आम जनता को ज्ञान पेलते नजर आते रहते है. इस कारण यह सवाल भी राजनैतिक और मानवीय स्तर पर अपनी बारी का इंतजार कर रहे है. बेशक आज कुलभूषण की फांसी का विरोध देशभर में देखने को मिल रहा हो लेकिन क्या हम भूल गये कि सरबजीत को पहले फांसी फिर भारत सरकार के विरोध और भारतीय जनभावना के नाम पर उसकी सजा आजीवन कारावास में बदलकर इसी पाकिस्तान ने उसे जेल में पीट-पीटकर मार डाला था. इस खबर के आने बाद आज फिर भारत मे वही प्रतिक्रिया दोराही जा रही है. मनोभाव से मैं भी यहां भारत की जनता की उम्मीदों के साथ अपने को खड़ा जरूर पा रहा हूँ पर इस उम्मीद के साथ कि हमारा जाधव दूसरा सरबजीत न बने हमे व सरकार को इस ओर उचित कदम उठाने चाहिए !

उत्तम जैन ( विद्रोही )

Thursday, 9 February 2017

जीवन के ये रिश्ते नाते स्वार्थ से भरे है - आपकी भूमिका व कर्तव्य


दो लोगों के बीच में पारस्परिक हितों का होना, बनना और बढऩा रिश्तों को न केवल जन्म देता है बल्कि एक मजबूत नींव भी प्रदान करता है, लेकिन जैसे ही पारस्परिक हित निजी हित में तब्दील होना शुरु होते हैं रिश्तों को ग्रहण लगाना शुरु हो जाता है। पारस्परिक हित में अपने हित के साथ-साथ दूसरे के हित का भी समान रुप से ध्यान रखा जाता है, जबकि निजी हित में अपने और सिर्फ अपने हित पर ध्यान दिया जाता है।मनुष्य जन्म लेते ही कई तरह के रिश्तों की परिभाषाओं में बंध जाता है, जिनका आधार रक्त सम्बन्ध होता है लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे कुछ नए रिश्तों की दुनिया भी आकार लेने लगती है। जिनका वह ख़ुद चयन करता है, ऐसे रिश्तों की एक अलग अहमियत होती है। क्योंकि ये विरासत में नहींं मिलते, बल्कि इनका चयन किया जाता है। ऐसे रिश्तों को प्रेम का नाम दिया जाए या दोस्ती का या कोई और नाम दिया जाये, लेकिन ये बनते तभी हैं, जब दोनोंं पक्षों को एक दूसरे से किसी न किसी तरह के सुख या संतुष्टि की अनुभूति होती है यह सुख शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या आत्मिक किसी भी तरह का हो सकता है। जब एक पक्ष दूसरे के बिना ख़ुद को अपूर्ण, अधूरा महसूस करता है, तो अपनत्व का भाव पनपता है और जैसे-जैसे यह अपनत्व बढ़ता जाता है, रिश्ता प्रगाढ़ होता जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किन्हीं दो लोगों के बीच में पारस्परिक हितों का होना, बनना और बढऩा रिश्तों को न केवल जन्म देता है बल्कि एक मजबूत नींव भी प्रदान करता है, लेकिन जैसे ही पारस्परिक हित निजी हित में तब्दील होना शुरु होते हैं रिश्तों को ग्रहण लगाना शुरु हो जाता है। पारस्परिक हित में अपने हित के साथ-साथ दूसरे के हित का भी समान रुप से ध्यान रखा जाता है, जबकि निजी हित में अपने और सिर्फ अपने हित पर ध्यान दिया जाता है।निज हित को प्राथमिकता देने या स्वहित की कामना करने में उस समय तक कुछ भी ग़लत नहींं है जब तक दूसरे के हितों का भी पूरी तरह से ध्यान रखा जाये, लेकिन जब दूसरे के हितों की उपेक्षा करके अपने हित पर जोर दिया जाता है, तो रिश्ते को स्वार्थपरता की दीमक लग जाती है,जो धीरे-धीरे किसी भी रिश्ते को खोखला कर देती है। स्वार्थ की भावना रिश्तों की दुनिया का वह मीठा जहर है, जो रिश्ते को असमय ही कालकवलित कर देती है। स्वार्थ की भावना उस समय और भी खराब रुप धारण कर लेती है, जब दूसरे पक्ष के अहित की कीमत पर भी ख़ुद का स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश की जाती है। किसी भी रिश्ते में एक-दो बार ऐसे प्रयास सफल भी हो सकते हैं, लेकिन जब बार-बार किसी का अहित करके कोई अपना हित साधने की कोशिश करता है, तो रिश्ते जख्मी होने लगते हैं। ये जख्म जितने गहरे होते जाते हैं, रिश्तों की दरार उतनी ही चौड़ी होती जाती है। मन के किसी कोने में या दिल के दर्पण पर स्वार्थ की परत के जमते ही रिश्तों का संसार दरकने लगता है और धीरे-धीरे एक समय ऐसा भी आता है,जब रिश्ता पूरी तरह टूट कर बिखर जाता है। सुदीर्घ और मजबूत रिश्ते मनुष्य को न केवल भावनात्मक संबल देते हैं, बल्कि आत्मबल बढ़ाने में भी मददगार साबित होते हैं। सदाबहार रिश्तों के हरे-भरे वृक्षों की छाया में मनुष्य ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है, जबकि किसी भी तरह के रिश्ते का बिखरना ऐसे घाव दे जाता है, जिसकी जीवन भर भरपाई नहींं हो पाती। इसलिए जहाँ तक हो सके रिश्तों को टूटने से बचाने की कोशिश करनी चहिये। रिश्तों को बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि स्वार्थ के बजाय त्याग और स्वहित के बजाय पारस्परिक हित को प्रधानता दी जाये। दूसरे के अहित की कीमत पर भी अपना हित साधने के बजाए जब अपना अहित होने पर भी दूसरे का हित करने की भावना जन्म लेती है, तो रिश्ते ऐसी चट्टान बन जाते हैं, जिनका टूट पाना असंभव हो जाता है। इस तरह रिश्तों का बंधन इतना मजबूत होता जाता है कि कोई भी इससे बाहर नहींं निकल सकता। रिश्तों की नाव को डूबने से बचाने के लिए यह जरूरी है कि इस नाव में स्वार्थपरता का सुराख न होने पाये, क्योंकि रिश्तों की नाव मझधार में तभी डूबती है जब पारस्परिक हित रुपी पतवार और त्याग रुपी खेवनहार लुप्त हो जाते हैं।कहा जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक है तो रिश्ते भी होंगे ही। वैसे तो प्रेम एक ऐसी भावना है जो मनुष्य तो मनुष्य, मूक पशुओं तक से रिश्ता जोड़ देती है। रिश्ते भी कई प्रकार के होते हैं। इनमें सबसे बड़ा रिश्ता है परिवार का जो आपको कई-कई रिश्तों में बांध देता है। एक बच्चा जब इस दुनिया में आता है तो वह किसी को मां किसी को पिता, भाई, बहन, चाचा, मामा, दादा-दादी या नाना-नानी बनाता है। कुछ रिश्ते केवल कामकाजी होते हैं, और कुछ ऐसे कि जिनका कोई नाम नहींं होता पर वे नामधारी रिश्तों से ज्यादा पक्के होते हैं। कुछ रिश्ते हमें जन्म से मिलते हैं और कुछ हम बनाते हैं, जिनमें सबसे ज्यादा अहम होता है पति-पत्नी का रिश्ता जो कहा जाता है कि सात जन्मों का होता है। कुछ रिश्ते मुंहबोले होते हैं। कुछ रिश्ते केवल विश्वास से बनते हैं, और जैसे ही विश्वास टूटा, रिश्ते भी बिखर जाते हैं। कुल मिलाकर रिश्ते एक ऐसा चक्रव्यूह रचते हैं जिसमें हम में से हर एक कभी न कभी उलझता ही है। हर तरह के रिश्तों में कभी न कभी दरार आ ही जाती है। इस बात से कोई फर्क नहींं पड़ता कि आपका संबंध कितना अंतरंग और मजबूत है। आमतौर पर अलग-अलग विचार और एक दूसरे से अलग-अलग अपेक्षाओं के कारण रिश्तों में खटास पैदा हो जाती है। रिश्तों के शुरुआती दौर में ही यह पनपने लगती है और समय के साथ-साथ रिश्ते में दरारें दिखने लगती हैं। यह महत्वपूर्ण नहींं कि रिश्तों में खटास पैदा होने के बाद बातचीत की शुरुआत कौन करता है। महत्वपूर्ण यह है कि आप एक स्वस्थ बातचीत के जरिए मामले को सुलझा लें। अहम व निज स्वार्थ को त्यागे जीवन सुंदर बन जाएगा ! अहम आपके भविष्य का विनाश ही कर सकता है सन्मान दे ओर सन्मान पाये बिना सन्मान दिये आपको कभी सन्मान प्राप्त नही हो सकता !
उत्तम जैन (विद्रोही ) 

Saturday, 4 February 2017

उत्तम( विद्रोही) जैन का श्रीमति सोनिया गाँधी जी के नाम खुला पत्र

आदरणीया सोनिया जी,.
जय हिन्द - 
सादर नमस्कार 
सर्वप्रथम तो मैं आपके शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ के लिए अपनी शुभकामना प्रेषित करता हूँ क्योंकि आपके स्वास्थ्य की स्थिति दीर्घावधि से चिंताजनक बनी हुई है और जो सूचनाएं मुझे सार्वजनिक संचार माध्यमों से प्राप्त हुई ! वे आपके हितैषियों तथा प्रशंसकों के लिए उत्साहवर्धक नहीं हैं ! ईश्वर की अनुकंपा से आप अतिशीघ्र पूर्ण स्वस्थ हों, मैं यही प्रार्थना करता हूँ । इस देश में आपके शुभचिंतक भी इने-गिने ही हैं और प्रशंसक भी । आपका जन्म इस देश में नहीं हुआ, दूसरे देश में हुआ, इसी बात को आधार बनाकर आपके सभी सदगुणो पर धूलि डाल दी जाती हैं और विशेष रूप से आपकी हिन्दी भाषा पर पूर्ण अधिकार नही होने से मज़ाक भी बनाया जाता है ! आपके विदेश-जन्मा होने के मुद्दे कारण जनता ऐसी सभी बातों पर निष्प्रमाण ही विश्वास कर लेगी । संभवतः उनकी यह धारणा ठीक भी है क्योंकि विगत सामान्य चुनाव में वे ऐसा करके राजनीतिक लाभ पाने में सफल रहे हैं । आपके व्यक्तित्व एवं चरित्र की निर्मलता एवं उदात्तता को देखने-परखने और स्वीकार करने वाले आपके ऐसे सच्चे प्रशंसक आज भी भारत में हैं । मैं उन्हीं में से एक हूँ । मे एक उभरता हुआ एक पत्रकार व लेखक हु साथ मे मैं एक अराजनीतिक व्यक्ति हूँ क्यू की वर्तमा्न राजनीति से तो मुझे घिन आती है जो सिर्फ व सिर्फ स्वार्थ परस्त राजनीति है ! लेकिन जब से मे सयाना हुआ राजनीति को समझने की कोशिस की अर्थात दो दशकों से भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ावों पर दृष्टि रख रहा हूँ । मैंने आपके व्यक्तित्व में रुचि लेना तब आरंभ किया था जब आपके पति स्वर्गीय राजीव गाँधी भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसीन थे ! उस समय आपके पति के मोत जिन्होने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी ओर मीडिया , कथित राजनेता देश के ठेकेदार आपके विदेशी मुद्दे को बार बार उठा रहे है जबकि उस समय आपके साथ साहनुभूति की जरूरत थी मगर आप अपने लिए कही जा रही थी उन बेतुकी बातों का खंडन नहीं करती थीं (वस्तुतः आप सार्वजनिक जीवन से पूर्ण दूरी बनाए रखती थीं), इसीलिए आपके विषय में कई किवदंतियों ने जन्म लिया और मुझ जैसे बहुत से लोग वर्षों तक भ्रमित होते रहे । लेकिन राजीव जी के असामयिक निधन के उपरांत मैंने आपके वास्तविक व्यक्तित्व को पहचानना आरंभ किया और अंततः मैं आपके भीतर छुपी उस संवेदनशील मानवी को देख पाने में सफल हुआ जिससे आज भी इने-गिने लोग ही परिचित हैं । मैं स्वयं एक संवेदनशील मनुष्य हूँ और एक संवेदनशील व्यक्ति ही किसी दूसरे व्यक्ति की संवेदनशीलता को देख-सुन-पहचान सकता है, उसे सराह सकता है ।
सोनिया जी, आप जन्म से चाहे विदेशी हैं किन्तु पहले एक प्रेयसी,फिर पत्नी एवं पुत्रवधू और फिर एक माँ के रूप में आपका जीवन एक आदर्श भारतीय स्त्री जैसा ही रहा है जिसने एक भारतीय पुरुष को अपने जीवन साथी के रूप में स्वीकार किया तथा उसके जीवनकाल में एक आदर्श सहधर्मिणी के रूप में सदा उसके साथ खड़ी रही । अपनी सास इन्दिरा जी के जीवनकाल में आप एक आदर्श पुत्रवधू की भांति सदा उनकी इच्छा एवं दिशानिर्देशों के अनुरूप ही रहीं । आप अपने पति के राजनीति में जाने के पक्ष में नहीं थीं किन्तु जब कालचक्र ने आपके पति को राजनीति में धकेल ही दिया तो आपने अपने पति को अपना सम्पूर्ण नैतिक समर्थन दिया । आप कभी अनावश्यक रूप से सुर्खियों में नहीं आईं तथा अपने पति के प्रधानमंत्रित्व काल में आपने अपने व्यक्तित्व की निजता तथा गरिमा को अक्षुण्ण बनाने रखा । जब आपके पति का असामयिक निधन हो गया तो इस पहाड़ जैसे दुख को अपने हृदय की परिधि में समेटे हुए आपने अपने पितृहीन बालकों का पालन-पोषण स्वयं को भारतीय राजनीति से पूरी तरह से दूर रखते हुए किया । और यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं । यह आपके आत्मबल, दृढ़ इच्छाशक्ति एवं व्यक्तित्व की गहनता का जीताजागता प्रमाण है । जिसे मे व मेरे विचारो के समर्थक सदा नमन करते है !.
आप सादगी में विश्वास रखती हैं एवं आडंबरों से सदैव दूर रहती हैं । इसका प्रमाण मुझे तब मिला था जब आपने अपनी पुत्री का विवाह अत्यंत साधारण ढंग से बिना किसी तड़क-भड़क एवं अपव्यय के किया । १८ फ़रवरी,१९९७ को यह विवाह सम्पन्न हुआ था । पूर्व प्रधानमंत्री की पुत्री का विवाह तो वैभवपूर्वक तथा भरपूर प्रचार के साथ भी किया जा सकता था किन्तु मुझे बहुत आश्चर्य हुआ इस विवाह को गिने-चुने अतिथियों की उपस्थिति में अत्यंत सादा तरीके से सम्पन्न कराया गया था तथा पत्रकारों को भी इस समारोह से दूर रखा गया था ।.
आप कितनी संवेदनशील हैं विदेश मे जन्म लेने के बाद भी आप भारतीय संस्कृति व एक भारतीय नारी जेसे दयाभाव व रागद्वेष युक्त व बलिदान की प्रतिमूर्ति है इसका प्रमाण यह है कि आपने अपने पति की हत्या का षड्यंत्र रचने वालों को मृत्युदंड न दिए जाने के लिए स्वयं भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री के॰आर॰ नारायणन को पत्र लिखकर षड्यंत्रकारियों के लिए और विशेषतः नलिनी नाम की षड्यंत्रकारिणी के लिए क्षमादान मांगा था । अपने पत्र में आपने इस बात का संदर्भ दिया था कि नलिनी एक छोटी बच्ची की माता थी और स्वयं अपने पति को खोने की पीड़ा से गुज़रने तथा अपने बच्चों को उनके पिता को खोने की पीड़ा से गुज़रता देखने के कारण आप जानती थीं कि अपने माता या पिता को खो देने पर एक बालक पर क्या बीतती है । मुझे यह देखकर बहुत दुख हुआ था कि आपके इस अत्यंत मानवीय कार्य की भी राजनीतिक व्याख्या ही की गई थी । मुझ जैसे विद्रोही या अराजनीतिक इने-गिने लोग ही आपके इस कार्य के पीछे आपके हृदय में बसी संवेदनशीलता को देख सके, भाँप सके, अनुभूत कर सके । आपके विरोधियों से ही नहीं वरन समस्त भारतवासियों से मेरा प्रश्न है कि आप पर केवल आपके विदेशी मूल के कारण नाना प्रकार से आक्रमण किया जाए जिसमें शालीनता की सारी सीमाएं पार कर दी जाएं, यह किस दृष्टिकोण से उचित है ? काश लोग राजनीति से परे जाकर आपको केवल एक मानवी के रूप में देखें और निर्णय करें कि आपके सदगुणों को अनदेखा करना क्या आपके प्रति अन्यायपूर्ण नहीं है ! क्या आपके विरोधी भी अपने परिवारों में ऐसे ही मानवीय गुणों से युक्त तथा ऐसे ही दृढ़ संकल्प एवं साहस से परिपूर्ण परिपक्व व्यक्तित्व वाली पुत्रवधुएं नहीं चाहेंगे ? इसके विपरीत आपके प्रमुख राजनीतिक विरोधी तथा भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री का कोई कट्टर समर्थक भी अपनी पुत्री के लिए उनके जैसा वर नहीं चाहेगा क्योंकि ऐसा जामाता किस काम का जो अपनी ब्याहता पत्नी को उसका न्यायोचित अधिकार एवं सम्मान न दे ?.
आपने दल एवं सरकार के प्रमुख का पद १९९१ में ही ठुकरा दिया था जो आपके इस प्रकार की लालसाओं से निर्लिप्त होने का प्रमाण था । आगामी कुछ वर्षों में भी आपने स्वयं को अनावश्यक चर्चाओं एवं विवादों से पूरी तरह दूर रखा तथा राजनीति में किसी भी प्रकार की रुचि तब तक नहीं ली जब तक कि आपको नहीं लगा कि आपके परिवार की राजनीतिकविरासत पूरी तरह से नष्ट होने जा रही थी और उसे बचाने का प्रयास करना आपका कर्तव्य था । यदि आपने उस समय दल की बागडोर को न संभाल लिया होता तो सीताराम केसरी के तत्वावधान में इस देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल का अंतिम संस्कार १९९८ में ही हो गया होता । .
वैसे तो आपका भारतीय राजनीति में पदार्पण करना ही आपका सबसे बड़ा त्याग था । उस पर आपने शासन-प्रमुख का पद दो बार ठुकराया । यह आपके त्यागमय स्वभाव तथा चारित्रिक दृढ़ता का परिचायक है । भारतीय संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत आपको प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होने का पूर्ण अधिकार था जिससे आपको रोका नहीं जा सकता था । लेकिन आपने स्वेच्छा से इस पद के प्रस्ताव को अस्वीकार किया एवं साफ-सुथरी छवि वाले डॉ॰ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनने का अवसर दिया । फिर भी आप पर आरोप लगाया जाता रहा कि आप एक कठपुतली प्रधानमंत्री की आड़ में स्वयं सत्ता तथा सरकार का संचालन मानो रिमोट कंट्रोल से करती रहीं लेकिन इस बात का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है यह एक सुनी-सुनाई बात है जिसे बिना किसी आधार के बार-बार दोहराया जाता है । किसी दार्शनिक ने कहा है ‘बार-बार दोहराए गए झूठ को लोग सच मानने लगते हैं’, आपके लिए विभिन्न माध्यमों से बारंबार बोले गए इस झूठ को अब सच का रंग दे दिया गया है । जबकि वस्तुस्थिति यह है कि आपने डॉ॰ मनमोहन सिंह को अपने पद के संचालन एवं कर्तव्य-निर्वहन में पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की थी एवं अपनी ओर से तभी हस्तक्षेप किया था जब आपको जनहित में आवश्यक लगा । भूमि-अधिग्रहण कानून में आपने जनहित में हस्तक्षेप करके यथोचित संशोधन करवाए थे ताकि किसानों एवं आम लोगों की भूमि को बलपूर्वक हड़पा न जा सके । महिला आरक्षण विधेयक चाहे अंतिम रूप में पारित न हो पाया हो लेकिन उसके राज्य सभा की बाधा पार कर लेने में सफल हो जाना भी आपके अनवरत एवं निष्ठावान प्रयासों से ही संभव हो सका था । आप नारी-सशक्तिकरण में आस्था रखती हैं एवं महिलाओं को विधानमंडलों में आरक्षण दिलवाने की आपकी हार्दिक इच्छा थी जो नारी-विरोधी पुरुष-प्रधान राजव्यवस्था ने पूर्ण नहीं होने दी । आपके विश्वासी स्वभाव को जैसे १९९९ में मुलायमसिंह यादव ने छला था, वैसे ही एक दशक से अधिक समय के उपरांत आपके अपने ही दल के सदस्यों ने भी इस संदर्भ में उसके साथ छल ही किया ।.
सोनिया जी, इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा जाता है और इसीलिए वह न तो पूर्णरूपेण सत्य होता है और न ही वह पराजितों के साथ न्याय करता है जब इतिहास आपके निर्मल-हृदय पति के साथ न्याय नहीं कर सका और बोफ़ोर्स सौदे की दलाली का मिथ्यारोप उन पर उनके देहावसान के दशकों पश्चात् आज तक लगाया जाता रहा है तो वह आपके साथ न्याय कैसे करेगा ? कौन स्वीकारेगा और मान्यता देगा भारत देश और भारतीय राजनीति में दिए गए आपके सकारात्मक योगदान को ? आपने तो अपने दल के सत्ता में रहते हुए भी किसी राजनीतिक विरोधी पर कोई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई नहीं की लेकिन आपके राजनीतिक विरोधी ऐसे उदारमना एवं स्वच्छ मन के नहीं हैं । आपने चुनाव प्रचार एवं राजनीतिक अभियानों में भाषा तथा भंगिमाओं की गरिमा सदा बनाए रखी और व्यक्तिगत आक्षेपों से परहेज़ रखा लेकिन आपके राजनीतिक विरोधी शालीनता की सभी सीमाएं तोड़ते हुए सदा आप पर व्यक्तिगत आक्रमण करते रहे । जब भी इटली से संबंधित कोई तथ्य सामने आता है, आप पर उंगलियाँ उठाई जाने लगती हैं मानो इटली में जन्म लेना कोई अपराध हो अथवा इटली कोई बुरा स्थान या देश हो । भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाले आपके विरोधी इस सनातन भारतीय सामाजिक परंपरा को अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए विस्मृत कर देते हैं कि विवाह के उपरांत वधू अपने ससुराल की सदस्या होती है, अपने पितृगृह की नहीं । इस दृष्टि से भी एवं विगत आधी सदी में प्रदर्शित अपने सम्पूर्ण आचरण से भी आप भारतीय ही हैं ।यह विपणन अथवा मार्केटिंग का युग है सोनिया जी तथा आपके वर्तमान प्रमुख राजनीतिक विरोधी मार्केटिंग की कला में निष्णात हैं । इसीलिए वे जनमानस में स्वयं को दुग्ध-धवल सिद्ध करने में एवं आपके दल पर कालिमा के आरोपण में सफल रहे हैं । काठ की हांडी चाहे बार-बार आँच पर न चढ़ सके, एक बार तो चढ़ ही जाती है । मैंने ऊपर ही कहा है कि बार-बार बोला गया झूठ सुनने वालों द्वारा सच मान लिया जाता है । इसीलिए आपके लिए निराधार झूठ इतनी बारंबारता तथा इतनी प्रचंडता के साथ बोले जाते हैं ताकि वे जनता की मानसिकता में गहरे पैठ जाएं और आमजन उन्हें शाश्वत सत्य समझ बैठें । आप कर्मयोगिनी हैं, विपणन-विशेषज्ञा नहीं । इसीलिए संभवतः आप अपने राजनीतिक विरोधियों की कुटिल चालों का उचित प्रत्युत्तर नहीं दे सकतीं । अब आपकी बढ़ती आयु एवं रोगावस्था के कारण भी आप राजनीतिक गतिविधियों हेतु पर्याप्त ऊर्जावान नहीं रहीं । अब आपको शारीरिक तथा मानसिक आराम की आवश्यकता है । मेरा आपको यही परामर्श है कि अब आप दल एवं राजनीति से संबंधित सभी दायित्वों से स्वयं को मुक्त कर लें ।.
सोनिया जी, एक माता के रूप में आपकी स्वाभाविक अभिलाषा होगी कि आपका पुत्र भारत के प्रधानमंत्री के पद पर शोभायमान हो लेकिन आपकी जगह यदि कोई भारतीय मूल की स्त्री भी होती तो एक माता के रूप में उसकी अभिलाषा तो यही होती। माता तो सदा यही चाहती है कि उसकी संतान सफलता की पराकाष्ठा पर पहुँचे । लेकिन सोनिया जी, प्रत्येक कार्यक्षेत्र प्रत्येक व्यक्ति के लिए नहीं होता । आपने यदि अपने पुत्र को २००९ में ही भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए आगे बढ़ा दिया होता तो आपकी अभिलाषा पूर्ण हो गई होती लेकिन आपने राष्ट्रहित में डॉ॰ मनमोहन सिंह को ही द्वितीय अवसर दे दिया और अब आपका पुत्र इस पद तक पहुँच सकेगा, इसकी संभावना अत्यंत क्षीण है । वह अभी भी राजनीति में अपरिपक्व है तथा मुझे तो यही लगता है कि वह भारतीय राजनीति के लिए नहीं बना है । राजनीति के लिए ही उसने विवाह नहीं किया जो कि मेरी दृष्टि में एक बड़ा व्यक्तिगत त्याग है । लेकिन इस त्याग की तो आवश्यकता ही नहीं सोनिया जी । क्या आपकी कामना नहीं होती कि आपके घर में पुत्रवधू के चरण पड़ें, पायल की छमछम एवं नवजात की किलकारियाँ गूँजें, आपको दादी बनने का गौरव प्राप्त हो ? होती है न ? तो फिर अपने पुत्र को विवाह करने के लिए प्रेरित कीजिए । पुरुष का विवाह अधिक आयु में भी संभव है । कई भारतीय राजनेताओं ने भी चालीस वर्ष की आयु पार करने के उपरांत विवाह किया है । वैवाहिक जीवन में प्रवेश करके उसके व्यक्तित्व की परिपक्वता भी बढ़ेगी । बाकी अपने राजनीतिक दल को उसके भाग्य पर छोड़ दीजिए । नियति से कोई नहीं बच सकता सोनिया जी । यदि इस दल की नियति मिट जाना ही है तो यह मिटकर ही रहेगा । आप इसकी भाग्य-नियंता नहीं बन सकती हैं । आयु के इस पड़ाव पर अब आप इसका प्रयास भी न कीजिए । अब आप केवल अपने स्वास्थ्य तथा मानसिक शांति का ध्यान रखिए ।
.शुभकामनाओं सहित ......आपका अपना
उत्तम जैन ( विद्रोही )
प्रधान संपादक - विद्रोही आवाज 

Friday, 3 February 2017

बेटिया व बहू है घर आन बान ओर शान ..... मत भूल इंसान

बेटी एक ऐसा शब्द है जिसको सुनकर एक खुशी भी होती है एक गर्व की अनुभूति भी ओर वर्तमान को देखकर एक मन मे दशहत भी की बेटी आज के माहोल मे कही हमारे मान सन्मान को ठेश न पहुचा दे ! स्वाभाविक है माँ व पिता की सोच भी मे इसे गलत भी नही कहूँगा ! क्यू की बेटी मे हर माता पिता एक सपना भी देखते है ओर सपने के साथ मन मे एक डर भी रहता है ! मगर घर की शोभा जितनी बेटे से होती है उतनी ही बेटी से भी होती है। बेटी के होने से घर में अनुशासन बना रहता है। आज हम सब लोग इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। दुनिया मानो सिकुड़कर मुट्ठी में आ गई है। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आज के इस अत्याधुनिक युग में भी बहुत से परिवारों में बेटी और बेटे में फर्क किया जाता है, जिसका दुष्परिणाम हम इन दोनों के जन्म दर अनुपात में देख सकते हैं। जन्म दर के अनुपात का असन्तुलन पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अधिक पाया जाता है। बेटों को आवश्यकता से अधिक प्रश्रय देने के कारण ही शायद यह समस्या उत्पन्न हुई है। ईश्वर की ओर से कोई अन्तर नहीं किया जाता। दोनों का जन्म माँ के गर्भ से ही होता है। दोनों के जन्म की अवधि भी एक जैसी यानि नौ महीने होती है। माता को दोनों ही बच्चों को जन्म देते समय गर्भावस्था में एक जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। और तो और माँ को दोनों को जन्म देते समय एक समान ही प्रसव पीड़ा भी होती है। समझ नहीं आता कि यह समस्या इतना विकराल रूप क्यों लेती जा रही है? शायद मुगलकाल में यह अन्याय जो बेटियों के साथ आरम्भ हुआ जो आजतक समाप्त नहीं हुआ। लड़की की पैदा होते ही हत्या करने का रिवाज उस समय से जो चला वह आज तक जारी है। उस समय की स्थितियाँ बहुत विपरीत थीं। मुगल सुन्दर युवतियों का जबरन हरण कर लेते थे। इसीलिए पर्दा प्रथा, सती प्रथा और जन्मते ही लड़कियों को मार देने जैसी कुप्रथाओं का प्रचलन आरम्भ हुआ। हम स्वतन्त्र देश के नागरिक हैं, फिर भी इन बेड़ियों जैसी कुप्रथाओं से मुक्त नहीं हो पा रहे। अब बेटियों की हत्या करने का वह कारण नहीं रहा। आधुनिक युग में इसका कारण शायद दहेज की बढ़ती हुई माँग है। जो लोग दो समय की रोटी की समस्या से जूझ रहे हैं वे दहेज जुटाने मे असफल होते हैं। दिन-प्रतिदिन दहेज उत्पीड़न की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैँ। अनेक मासूम बेटियाँ इसकी भेंट चढ़ गई हैं। केवल अनपढ़ स्त्रियों के साथ ही ये दुर्घटनाएँ नहीं होतीं बल्कि पढ़ी-लिखी उच्च पदासीन महिलाओं को इस निन्दनीय, हृदयविदारक कुरीति की समस्या से प्रतिदिन जूझना पड़ता है। हर माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वे बहू को अपनी बेटी मानें। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे भी एक औरत हैं और उनकी बेटी भी किसी की बहू है। ऐसा नृशंस व्यवहार अपनी बहू के साथ करने से पहले उन्हें अपनी बेटी के उस स्थिति में होने की कल्पना कर लेनी चाहिए। यदि इस नजर से लोग सोचने लगें तो शायद इस नृशंसता से बचा जा सकता है। आज बेटी के जन्म से पूर्व हत्या ऐसे लोग यदि किसी तरह से अपनी दरिन्दगी पर पर्दा डालने में सफल हो जाते हैं तो उस ऊपर वाले की बड़ी अदालत के न्याय से वे नहीं बच सकते। वहाँ पर तो पल-पल का हिसाब देना पड़ता है। उसके द्वारा दिए गए दण्ड को भोगने में नानी याद आ जाती है। तब मनुष्य न अपना बचाव कर सकता है और न ही उसकी न्याय व्यवस्था से बच सकता है। बहू को अपनी बेटी मानते हुए उसके साथ सहृदयता और अपनेपन का व्यवहार करना चाहिए। वह दूसरे घर से आई बेटी आपके वंश को चलाती है। आपके घर के साथ-साथ सारी जिम्मेदारियाँ निभाती है। इसलिए उसे भी अपनी तरह का इन्सान मानते हुए व्यवहार कीजिए और बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने अहं का त्याग करके अपने बडप्पन का प्रदर्शन कीजिए।
उत्तम जैन (विद्रोही ) 

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