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Monday, 18 September 2017

पलक की फुंसी: घरेलु उपचार

गुहेरी या होर्डेओलम (stye or hordeolum) या अंजनी एक छोटा, छूने पर दर्द करने वाला उभार है जो पलक पर विकसित होती है और इसके कारण सूजन आ जाती है | गुहेरी पीड़ादायक और कुरूप हो सकती है लेकिन सामान्यतः ये गंभीर नहीं होतीं और घर पर प्रभावशाली रूप से उपचारित की जा सकती हैं | अगर घर पर की जाने वाली विधियों जैसे ऑइंटमेंट या गर्म सेक से कोई लाभ न हो तो चिकित्सीय मदद की आवश्यकता हो सकती है | अगर गुहेरी के कारण आपकी दृष्टी में कोई परिवर्तन होता है या आपको उस समय चेहरे या आँख पर कोई चोट लगी हो तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ या नजदीकी आपातकाल कक्ष में जाएँ 
अपनी पलक पर एक छूने पर दर्द करने वाले लाल उभार को देखें: गुहेरी मुंहासों के समान ही होती है जो पलक पर होते हैं | गुहेरी अक्सर स्किन की सतह पर रहने वाले बैक्टीरिया (सामान्यतः स्टेफ़ायलोकोकस या “स्टेफ” बैक्टीरिया) के कारण आँख में या आँख के पास संक्रमण उत्पन्न करने से होती है | सामान्यतः आप गुहेरी के रूप को देखकर उसकी पहचान कर सकते हैं-यह पलक पर छूने पर दर्द करने वाले लाल उभार होते हैं जो एक छोटे पस से भरे केंद्र को विकसित कर सकते हैं |गुहेरी पलक के अंदर की ओर बनती है और अंदर या बाहर की ओर बढती है | बाहरी गुहेरी में ज़ीस या मोल ग्लैंड्स शामिल होती हैं | आंतरिक गुहेरी में मिबोमियन ग्लैंड (meibomian gland) शामिल होती है और यह अंदर की ओर बढती है | एक आंतरिक गुहेरी सिर्फ एक संक्रमित चेलेज़ियन (chalazian) या पलकों की गिल्टी या ग्रंथि है 
गुहेरी को पहचानना सीखें: गुहेरी को पहचानने में चेलेजियन के साथ भ्रम हो सकता है जो आँख के पास एक उभार के रूप में दिखती है | गुहेरी और चेलेज़ियन दोनों का इलाज़ एक समान है इसलिए अगर आप इसे अलग से नहीं बता पाते तो कोई चिंता की बात नहीं है |एक गुहेरी या होर्डेओलम बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होती है | ये लाल उभार एक मुहांसे के समान अक्सर पस से भर जाते हैं | गुहेरी के कारण पलक में दर्द और सूजन होती है ”चेलेजियन” एक सिस्ट या तरल पदार्थ से भरी हुई थैली है जो छोटी तेल ग्रंथियों (मेबोमियन ग्लैंड्स) में विकसित होती है | ये अधिकतर पलक के अंदर की साइड पायी जाती हैं परन्तु ये दर्दरहित होती हैं | ”ब्लेफेराइटिस (Blepharitis) या वर्त्मशोध” पलक की सूजन होती है | इसके कई कारण होते हैं जिनमे संक्रमण, एलर्जी और अनुपचारित चेलेज़ियन आते हैं | ब्लेफेराइटिस (blepharitis) आपकी पलकों के किनारों को लाल और सूजनयुक्त बना देती है | आपकी पलकें खुजलीयुक्त, परतदार और कठिनाई से खुलने वाली हो सकती हैं 
सूजन देखें: सामान्यतः गुहेरी होने पर आपकी पलक सूज जाती है | कुछ केसेस में सूजन के कारण पलक पूरी तरह से बंद हो जाती है | यह सूजन लगभग तीन दिन तक बनी रहेगी जिसके बाद यह कभी-कभी अपने आप फूट कर बह जाती है | कभी-कभी, सूजन आँख के चारों ओर चेहरे के हिस्सों में फ़ैल जाती है, ऐसी स्थिति में आपको डॉक्टर को दिखाना चाहिए
अन्य लक्षणों से सावधान रहें: सूजी हुई पलक आँख को उत्तेजित कर सकती है जिसके कारण दर्द हो सकता है और पानी निकल सकता है | आपकी आँख प्रकाश के प्रति भी संवेदनशील हो सकती है | सूजन के कारण पलक झपकने में असुविधा हो सकती है

गुहेरी के लिए घरेलू उपचार--- 
एक गर्म सेक लगायें: घर पर किये जाने वाले गुहेरी के उपचार के लिए आँख पर 10-15 मिनट के लिए दिन में दो से तीन बार गर्म सेक लगाने की सलाह दी जाती है |[८]इससे उस जगह संचरण बढ़ेगा और गुहेरी के फूटकर बह जाने को गति मिलेगी | यह ज़रूरी है कि जैसे ही आप गुहेरी की पहचान करें, जल्दी से जल्दी गर्म सेक लगाना शुरू कर दें | अनुपचारित गुहेरी कई सप्ताह तक बनी रह सकती है लेकिन उपचार से यह सिर्फ कुछ दिनों में ही ठीक हो जाती है |गर्म सेक हमेशा “बंद” पलक पर उपयोग करें | ध्यान रखें कि सेक बहुत गर्म नहीं होना चाहिए अन्यथा इसके कारण आप जल सकते हैं | इसका टेस्ट अपनी स्किन के साफ़ हिस्से जैसे अपनी भुजा पर कुछ कुछ मिनट के लिए करें | अगर ये बहुत गर्म हो तो इसे कुछ मिनटों के लिए ठंडा होने दें और अपने चेहरे पर लगाने के पहले फिर से टेस्ट करें |
  • एक गर्म सेक बनाने के लिए, एक साफ़ टॉवल को गर्म पानी (उबलता हुआ नहीं) में भिगोकर निचोड़ें | लेट जाएँ और टॉवल को अपनी बंद पलक पर 10-15 मिनट के लिए लगायें | ज़रूरत पड़ने पर टॉवल को फिर से गर्म पानी में डुबोकर निचोड़ें |
  • वैकल्पिक रूप से, आप गीली टॉवल को एक गर्म पानी की बोतल के चारों ओर लपेट सकते हैं | लेट जाएँ और अपनी आँखें बंद करके बोतल को अपने चेहरे पर लगायें | इस विधि से टॉवल लम्बे समय तक गर्म बनी रहेगी |
  • आप एक मेडिकल स्टोर से बैकपैन के लिए उपयोग किये जाने वाले माइक्रोवेवल हीटिंग पैक (microwaveable heating pack) का भी इस्तेमाल कर सकते हैं | इनसे गर्मी (heat) आती रहती है इसलिए छूने पर गर्म लगते हैं लेकिन पकड़ने में सुविधाजनक होते हैं | अगर आप इन्हें अपने हाथों में नहीं पकड़ सकते तो ये आपके चेहरे के लिए हैं बहुत गर्म हैं | ये लगभग 30 मिनट तक गर्म बने रहते हैं |
  • कुछ लोग अपनी पलकों पर गर्म नमीयुक्त टी बैग्स (tea bags) रखते हैं | ये छोटे होते हैं और अच्छी तरह से गर्म बने रहते हैं लेकिन किसी भीगे हुए कपडे की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली नहीं होते हैं
  • सामान्यतः मिलने वाली दवाइयाँ लें: मेडिकल स्टोर पर कई तरह की क्रीम, ऑइंटमेंट (ointment) और यहाँ तक कि मेडिकेटिड पैड्स (medicated pads) भी उपलब्ध होते हैं जो गुहेरी के कारण होने वाले आँख के संक्रमण को दूर करने में मदद करते हैं | ऐसा उपचार ढूंढें जिसकी सामग्री में पोलीमिक्सिन बी सल्फेट (polymyxin b sulfate) हो जो नेत्र संक्रमण को ठीक करने के लिए एक प्रभावशाली एंटीबायोटिक है सुनिश्चित करें कि ये आँखों के लिए सुरक्षित हैं | जब तक कोई इमरजेंसी न हो इस तरह बगैर प्रिशक्रिपशन के दवा (OTC) लेना टालें क्योंकि ज्यादातर ओप्थाल्मोलोजिस्ट्स इनकी सलाह नहीं देते क्योंकि ये सुरक्षित नहीं हैं, अगर इन्हें आँख में डालना ही पड़े तो हमेशा इनके ऑइंटमेंट (ointment) को डालें |ऐसे प्रोडक्ट से सावधान रहें जो दावा करते हैं कि वे तुरंत या रात भर में गुहेरी को हटा देंगे | ये सामान्यतः महंगे होते हैं और उतने जल्दी काम नहीं करते जिसका ये दावा करते हैं | सामान्यतः गुहेरी के ट्रीटमेंट में 2 से 4 दिन का समय लगता है 

Thursday, 27 April 2017

मोटापे से आप परेशान – 25 किलो वजन कम करने का घरेलु आयुर्वेदिक काढ़ा

मोटापा (अंग्रेज़ी: Obesity) वो स्थिति होती है, जब अत्यधिक शारीरिक वसा शरीर पर इस सीमा तक एकत्रित हो जाती है कि वो स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालने लगती है।
[1] यह आयु संभावना को भी घटा सकता है।
[2 शरीर भार सूचकांक (बी.एम.आई), मानव भार और लंबाई का अनुपात होता है, जब २५ कि.ग्रा./मी.२ और ३० कि.ग्रा/मी२ के बीच हो, तब मोटापा-पूर्व स्थिति; और मोटापा जब ये ३० कि.ग्रा/मी.२ से अधिक हो।
[3] मोटापा बहुत से रोगों से जुड़ा हुआ है, जैसे हृदय रोग, मधुमेह, निद्रा कालीन श्वास समस्या, कई प्रकार के कैंसर और अस्थिसंध्यार्ति
[4 ] मोटापे का प्रमुख कारण अत्यधिक कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन, शारीरिक गतिविधियों का अभाव, आनुवांशिकी का मिश्रण हो सकता है। हालांकि मात्र आनुवांशिक, चिकित्सकीय या मानसिक रोग के कारण बहुत ही कम संख्या में पाये जाते हैं।
उचित वजन— एक युवा व्यक्ति के शरीर का अपेक्षित वजन उसकी लंबाई के अनुसार होना चाहिए, जिससे कि उसका शारीरिक गठन अनुकूल लगे। शरीर के वजन को मापने के लिए सबसे साधारण उपाय है बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआइ) और यह शरीर के व्यक्ति की लंबाई को दुगुना कर उसमें वजन किलोग्राम से भाग देकर निकाला जाता है।वजन कम करने के लिए लिये उपभोग की जाने वाले खाद्य पदार्थों में यह ध्यान रखना चाहिए कि उनमें प्रोटीन की मात्रा अधिक हो और चर्बी तथा कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम हो।
 
भार/लंबाई अनुपात वर्गीकरण
< 18.5 कम भार
18.5–24.9 सामान्य भार
25.0–29.9 अधिक भार
30.0–34.9 श्रेणी-१ मोटा
35.0–39.9 श्रेणी-२ मोटा
> 40.0 श्रेणी-३ मोटा
25 किलो वजन कम करने का घरेलु आयुर्वेदिक काढ़ा
25 किलो वजन कम करने का घरेलु आयुर्वेदिक काढ़ा”
आइये जाने कैसे बनाये-
सामग्री-
शुद्ध शिलाजीत,सुखी मेथी,दारुहल्दी,करंजी,आवला ,गिलोय,कुटकी,बहेड़ा,हल्दी,बबूल,कालीजीरी,मंजीठ,चिरायता,द्रोणपुष्पी,पंवार,भुमिआवला,हरड़,गूगुल,
बबुल गोंद,बाकुची
कैसे बनाये-
इन सभी सामग्री को 6-6 ग्राम मिला लेवे
अब सुबह शाम खाली पेट 2 चम्मच इसे 2 गिलास पानी में तब तक उबाले जब तक एक गिलास रह जाये
अब इसे ठंडा करके छान कर पीलेवे
यह काढ़ा  नियमित 2 महीने तक पीना हे, यह नुस्का वजन और चर्बी कम करने में बहुत ज्यादा ही प्रभावी हे,अगर शुद्ध जडीबूटिया इस्तेमाल की जाये तो
 
नोट-अगर आप शुद्ध जड़ीबूटियां नहीं ला सकते तो तो हमारे आयुर्वेदिक ओषधि केंद्र से भी शुद्ध जड़ीबूटियों से युक्त बना बनाया काढ़ा मंगवा सकते हे संपर्क- whats app 8460783401 (इसका मूल्य 2 महीने का 1500 Rs. हे )

Sunday, 26 February 2017

अजवायन का पानी आजमाएं सिर्फ 15 दिनों में कम होगा मोटापा

अजवायन का प्रयोग घरों में ना केवल मसाले के रूप में ही किया जाता है बल्‍कि छोटी-मोटी पेट की बीमारियां भी इसके सेवन से दूर हो जाती हैं। खाना खाने के बाद हाजमा बेहतर बनाना हो तो इसका चूरन बना कर खाइये और फिर फायदा देखिये। वैसे तो अजवायन बड़ी ही काम की चीज़ है मगर इसका एक फायदा मोटापे को भी कम करने के काम आता है। जी हां, यह बात काफी कम लोग जानते हैं कि अजवायन का पानी रोज सुबह खाली पेट पीने से मोटापा प्राकृतिक रूप से कम हो जाता है। मोटापा कम करने के लिये अक्‍सर लोग गरम पानी और नींबू पीते हैं, जिससे शरीर के विशैले तत्‍व बाहर निकलते हैं ना कि वजन में कमी आती है।
दूसरी ओर अजवायन का पानी पीने से शरीर का मेटाबॉलिज्‍म बढ़ता है जिसकी वजह से कार्ब तथा फैट बर्न होने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है। तो अगर आप भी अपने बढ़ते हुए वजन से परेशान है तो, कुछ दिनों तक इस नुस्‍खे को आजमाइये और असर देखिये। आइये जानते हैं अजवान का पानी बनाने की विधि और रिजल्‍ट पाने के लिये किन-किन चीज़ों से परहेज रखना है।
ऐसे बनाएं अजवायन का पानी - 
स्‍टेप 1. कैसे तैयार करें अजवाय का पानी ..... 
स्‍टेप 2. 50 ग्राम अजवायन लें (आप चाहें तो 25 ग्राम भी ले सकते हैं पर 50 ग्राम ज्‍यादा प्रभाव शाली है) 
स्‍टेप 3. अजवायन को 1 गिलास पानी में रातभर के लिये भिगो कर छोड़ दें और फिर सुबह पानी को छान लें। स्‍टेप 4. उसके बाद पानी में 1 चम्‍मच शहद मिक्‍स करें और सुबह खाली पेट पी लें। 
स्‍टेप 5. यदि आप चाहें तो उसी अजवायन को धूप मे सुखा कर फिर से दूसरे दिन भी प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन तीसरे दिन आपको इर्न अजवायन का प्रयोग करना होगा। 
स्‍टेप 6. अजवायन के पानी को 45 दिन लगातार पियें, आपको फायदा जरुर मिलेगा।

वैसे तो आपको इसका असर मात्र 15 दिनों में ही दिखने लगेगा पर अगर प्रभावी परिणाम चाहिये तो, 45 दिन लगेंगे। वजन कम होना आपके शरीर के प्रकार पर भी निर्भर करेगा। इस पानी को पीने से आपका 5 किलो वजन कम होगा पर अगर आप किसी बीमारी से पीड़ित नहीं होंगे तो।
अच्‍छा रिजल्‍ट पाने के लिये कुछ जरुरी बातों का पालन करें- चावल पूरी तरह से छोड़ दें रोटियों का संख्‍या घटा दें। मतलब अगर आप दो राटी खाते हैं तो उसे आधा कर दें। आलू, शक्‍कर, फास्‍ट फूड और ऑइली फूड ना खाएं। भोजन करने के एक घंटे तक पानी ना पियें। यह उपचार खास तौर पर उन महिलाओं के लिये है जिन्‍हें पीरियड्स की समस्‍या है और जिसकी वजह से उनका वजन बढ़ जाता है।

Saturday, 21 January 2017

किसी संजीवनी से कम नहीं है एलोवेरा

  • एलोवेरा में संजीवनी बूटी के सभी गुण मौजूद हैं।
  • खून की कमी पूरा कर रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढाये।
  • एंटीबायोटिक और एंटीसेप्टिक के रूप में काम करता है।
  • एलोवेरा का जूस त्वचा की नमी को बनाए रखता है।
  • औषधी की दुनिया में एलोवेरा किसी चमत्कार से कम नहीं। एलोवेरा एक संजीवनी है यानी इसमें संजीवनी बूटी के सभी गुण मौजूद हैं। एलोवेरा से तमाम रोग दूर किए जा सकते हैं। एलोवेरा औषधीय गुणों से परिपूर्ण है। एलोवेरा के जूस और एलोवेरा युक्त उत्पाद के सेवन और इस्तेमाल से फिट रहा जा सकता है। एलोवेरा एक ऐसा पौधा है जिसमें अन्य सभी जड़ी-बूटियों के मुकाबले अधिक गुण है। यानी व्यक्ति को फिट रखने में एलोवेरा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं। एलोवेरा के पौधे को कई नाम हैं, जैसे संजीवनी बूटी, साइलेंट हीलर, चमत्कारी औषधि। इसे कई अन्यो नामों ग्वारपाठा, क्वारगंदल, घृतकुमारी, कुमारी, घी-ग्वार इत्यादि से पुकारा जाता है। एलोवेरा का उपयोग अनेक प्रकार की आयुर्वेदिक औषधि बनाने में किया जाता है। एलोवेरा के पौधे में वो सारे गुण समाहित है जिसे संजीवनी बूटी कह सकते है। कब्ज से लेकर कैंसर तक के मरीजों के लिए एक अत्यंत लाभकारी औषधि है।
  • रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये- एलोवेरा में वो औष‍धीय तत्व हैं जो शरीर में नहीं बनते बल्कि एलोवेरा से ही प्राप्त होते हैं जैसे– कुछ मिनरल और अमीनो एसिड। इन तत्वों को निरंतर शरीर की जरूरत रहती है जिसे पूरी करना भी जरूरी है। और जो खून की कमी को दूर कर रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढाते हैं।
  • शक्ति तथा स्फूर्ति का अहसास- एलोवेरा बढि़या एंटीबायोटिक और एंटीसेप्टिक के रूप में काम करता है। एलोवेरा में शरीर की अंदरूनी सफाई करने और शरीर को रोगाणु रहित रखने के गुण भी मौजूद है। यह हमारे शरीर की छोटी बड़ी नस, ना़डि़यों की सफाई करता है उनमें नवीन शक्ति तथा स्फूर्ति भरता है।
  • त्‍वचा और बालों के लाभकारी- त्वचा की देखभाल और बालों की मजबूती व बालों की समस्या से निजात पाने के लिए एलोवेरा एक संजीवनी का काम करती है। एलोवेरा का जूस त्वचा की नमी को बनाए रखता है जिससे त्वचा स्‍वस्‍थ दिखती है। यह स्किन के कोलाजन और लचीलेपन को बढाकर स्किन को जवान और खूबसूरत बनाता है। एलोवेरा का जूस पीने से त्वचा की खराबी, मुहांसे, रूखी त्वचा, धूप से झुलसी त्‍वचा, झुर्रियां, चेहरे के दाग धब्बों, आंखों के काले घेरों को दूर किया जा सकता है।

  • हीमोग्लोबिन की कमी पूरा करें- एलोवेरा औषधी हर उम्र के लोग इस्तेमाल कर सकते है और यह शरीर में जाकर खराब सिस्टम को ठीक करता है। इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। साथ ही एलोवेरा का जूस ब्लड को प्यूरीफाई करता है और हीमोग्लोबिन की कमी को पूरा करता है। इसके अलावा यह शरीर में व्‍हाईट ब्लड सेल्स की संख्या को बढाता है।बीमारियों को दूर करें- शरीर में मौजूद हृदय विकार, जोड़ों के दर्द, मधुमेह, यूरीनरी प्रॉब्ल्म्स, शरीर में जमा विषैले पदार्थ इत्यादि को नष्ट करने में मददगार है। एलोवेरा के जूस का हर रोज सेवन करने से शरीर के जोडों के दर्द को कम किया जा सकता है।
    बच्चे से लेकर वरिष्ठ लोगों तक सभी के लिए एलोवेरा किफायती है। इसके प्रयोग से बीमारियों से मुक्त रहकर लंबी उम्र तक स्वस्थ और फिट रहा जा सकता है।

शरीर कांपने के मुख्य कारण

ठंड के कारण शरीर कांपना कोई समस्‍या नहीं है, इसके कारण अक्‍सर आपने लोगों के शरीर को कांपते हुए देखा होगा। लेकिन ठंड के बिना भी अक्‍सर आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनके कुछ अंगों में अनायास ही कंपन होता है। कांपने का अगर सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो यह वास्तव  में इतना गंभीर बन सकता है।

शरीर का कांपना- ठंड के कारण शरीर कांपना कोई समस्‍या नहीं है, इसके कारण अक्‍सर आपने लोगों के शरीर को कांपते हुए देखा होगा। लेकिन ठंड के बिना भी अक्‍सर आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनके कुछ अंगों में अनायास ही कंपन होता है। कांपना बिना इच्‍छा के होना वाला वह लयबद्ध मूवमेंट है जो किसी भी विशिष्‍ट अंग जैसे हाथ, पैर, सिर या गले में हो सकता है। कांपने का अगर सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो यह वास्‍तव में इतना गंभीर बन सकता है कि इससे आप अपने दैनिक कार्यों को करने में भी असमर्थ हो सकते हैं।

शरीर कांपने के कारण- शरीर के कांपने को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। रेस्‍ट कंपन और दूसरा एक्‍शन कंपन। रेस्‍ट कंपन की समस्‍या आराम के दौरान होती है। रेस्‍ट कंपन आमतौर पर बहुत ज्‍यादा मानसिक तनाव और पार्किंसंस रोग के साथ जुड़ा होता है। ऐसे में डर या भय के कारण शरीर का कांपने सामान्‍य है। दूसरा प्रकार यानी एक्‍शन कंपन में कुछ स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍यायें जैसे ब्रेन ट्यूमर या स्‍ट्रोक आदि शरीर में कंपन का कारण बनता है। इसके अलावा नींद से जुड़ी समस्‍याओं के चलते भी शरीर कांपने लगता है। अगर आप भी शरीर के कांपने का सही कारण जानना चाहते हैं तो यहां कांपने के कारण दिये गये है।

शराब छोड़ना- अगर आप ऐसे लोगों में एक है जो शराब छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, तो शराब छोड़ने की कोशिश भी आपके शरीर में  कंपन का कारण हो सकती है। लेकिन गंभीर और बेकाबू कंपन महसूस होने पर आप अपने डॉक्‍टर से परामर्श जरूर करें।

नींद संबंधी विकार- नींद से जुड़ी विभिन्‍न समस्याओं के कराण भी रात को सोते समय शरीर कांपने लगता हैं। वायु मार्ग के आंशिक रूप से बंद होने के कारण शरीर में कंपन होता है जबकि नींद सामान्‍य श्‍वास पैटर्न को फिर से स्‍थापित करने की कोशिश करता है।

मल्टीपल स्क्लेरोसिस- मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में तंत्रिका कोशिकाओं के इन्सुलेटिंग कवर खराब होने के कारण मल्टीपल स्क्लेरोसिस होता है। यह आमतौर पर सूजन की बीमारी है, जो नसों के संचार की क्षमता को प्रभावित करती है। इस बीमारी से कई प्रकार की न्‍यूरोलॉजिकल समस्‍या होने लगती है। जिससे शरीर भी कांपने लगता है।

स्ट्रोक- इस्‍कीमिया या रक्‍तस्राव के कारण मस्तिष्‍क तक रक्‍त की आपूर्ति ठीक प्रकार से न होने के कारण स्‍ट्रोक की समस्‍या होती है। इसमें मस्तिष्‍क के प्रभावी हिस्‍से के कारण लक्षण और गंभीरता भी अलग-अलग होती है। स्‍ट्रोक शरीर में कांपने के प्रमुख कारणों में से एक है जो सेरिबैलम में घाव या नुकसान के कारण होता है।  

ट्रामेटिक ब्रेन इंजरी (टीबीआई)- ट्रामेटिक ब्रेन इंजरी मस्तिष्क की दर्दनाक चोट को दर्शाता है। इसमें मस्तिष्‍क में बाहरी से ज्‍यादा चोट लगने से अंदर की नसें दब जाती है या उनमें कई प्रकार की विकृति आ जाती है। यह एक गंभीर बीमारी होती है। ट्रामेटिक ब्रेन इंजरी दुनिया भर में होने वाली मौतों या विकलांगता के लिए जिम्‍मेदार कारकों में से एक है। टीबीआई से जुड़े प्रमुख लक्षणों में कांपना भी शामिल है।

पार्किंसंस रोग- पार्किंसंस रोग केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का विकार है। इसके लक्षणों में शरीर के अंगों में बेकाबू रूप से कंपन विशेष रूप से हाथों में,  शामिल है। ऐसा मस्तिष्‍क का शरीर की गतिविधियों का सही प्रबंधन न करने के कारण होता है। कंपना पार्किंसंस रोग के कार्डिनल लक्षणों में से एक है। जो रोग के निदान में आपकी मदद कर सकता है।

शरीर के लिए इन कारणों से जरूरी है विटामिन सी

    • विटामिन सी की संतुलित मात्रा शरीर के लिए लाभदायक। 
    • प्रतिरोधक क्षमता और अवशोषण शक्ति को बढ़ाती है।
    • नींबू, अंगूर, अमरूद, केला, संतरा आदि फल इसके स्रोत।
    • कोलाजेन, आखों लिगामेंट्स आदि को मजबूत बनाती है।     
    • विटामिन सी को एस्कॉर्बिक एसिड के नाम से भी जाना जाता है। यह हमारे शरीर की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाने के लिए अति आवश्यक पोषक तत्वों में से एक है। यह पोषक तत्व फ्री रेडिकल्स से हमारी कोशिकाओं का बचाव करता है। साथ ही, शरीर में विटामिन ई की सप्लाई को पुनर्जीवित करता है और आयरन के अवशोषण की क्षमता को भी बढ़ाता है। यह एक ऐंटि-एलर्जिक व ऐंटि-ऑक्सिडेंट के रूप भी काम करता है। संतरा, टमाटर, आलू इत्यादि विटामिन सी के अच्छे स्रोत में संतरा, टमाटर, आलू इत्यादि शामिल हैं। सिटरस फ्रूट्स में भी विटामिन्स पाए जाते हैं। आंवला, नारंगी, नींबू, अंगूर, अमरूद, केला, बेर, कटहल, शलगम, पुदीना, मूली के पत्ते, मुनक्का, दूध, चुकंदर, चौलाई, बंदगोभी, हरा धनिया, और पालक इत्यादि भी विटामिन सी के अच्छे स्रोत हैं।विटामिन सी को खाद्य पदार्थों के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। आमतौर पर विटामिन सी के अच्छे स्रोत आलू, टमाटर, संतरा हैं। इनके अलावा लाल मिर्च, अनानास, स्ट्रापबेरी, सेब, खट्टे रसीले फल, कच्चे फलों और सब्जियों में भी विटामिन सी पाया जाता है।विटामिन सी की कमी के कारण कई बीमारियां जैसे मोतियाबिंद, चर्म रोग, गर्भपात, रक्ताल्पता, भूख न लगना इत्यादि हो सकती हैं।विटामिन सी शरीर को कई बीमारियों से तो बचाता ही है, साथ ही सांस संबंधी बीमारियों और पाचन संबंधी समस्याओं से भी निजात दिलाता है।विटामिन सी न सिर्फ स्कर्वी नामक रोग से बचाता है बल्कि इससे कैंसर की संभावना भी कम हो जाती है, और तो और मस्तिष्क के कार्य करने में भी ये सहायक है।   विटामिन सी की मदद से हड्डियों को जोड़ने वाले कोलाजेन पदार्थ, रक्त वाहिकाएं, लिगामेंट्स, कार्टिलेज आदि अंगों का पूर्णरूप से निर्माण संभव है। विटामिन सी आंखों के रोग ग्लूकोमा से आंखों का बचाव करता है। विटामिन सी शरीर के लिए बहुत आवश्यक है। इसकी कमी से कई रोगों के होने की संभावना बढ़ जाती है। विटामिन सी संतुलित मात्रा में खाना फायदेमंद है। लौह तत्वों को भी विटामिन सी से ही आधार मिलता है। शरीर में विटामिन सी कई तरह की रासायनिक क्रियाओं को अंजाम देता है जैसे कोशिकाओं तक ऊर्जा प्रवाहित करना आदि।विटामिन सी मस्तिष्क में एक रसायन सेराटोनिन के बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और सेराटोनिन नामक रसायन हमारी नींद के लिए ज़रूरी है।  विटामिन सी कोलेस्ट्रॉल को भी नियंत्रित काबू में रखता है।विटामिन सी युक्त खाद्य पदार्थों को गैस या अवन में पकाने या उबालने व अधिक समय तक स्टोर करके रखने से उनकी पौष्टिकता कम हो जाती है। इसलिए विटामिन सी का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के लिए कच्चे फल व सब्जियां ही खाएं।

टमाटर होता है विटामिन सी, लाइकोपीन और पोटैशियम से भरपूर

टमाटर को हर तरह से खाया जाता है। इसे ज्यादतर मिक्स करके या फिर सलाद के साथ खाया जाता है। लगभग हर सब्जी को बनाते वक्त टमाटर का प्रयोग किया जाता है। हालांकि, टमाटर का सूप, जूस और चटनी भी बनाकर खाया जाता है। इस लेख में जानें टमाटर के अनेक फायदे।
टमाटर में विटामिन सी, लाइकोपीन, विटामिन, पोटैशियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। टमाटर में कोलेस्ट्रॉल को कम करने की क्षमता होती है। टमाटर खाकर वजन को आसानी से कम किया जा सकता है। टमाटर की खूबी है कि गर्म करने के बाद भी इसके विटामिन समाप्त नहीं होते हैं। आइए हम आपको टमाटर के गणों के बारे में बताते हैं।

टमाटर के गुण –

  • सुबह-सुबह  बिना कुल्ला किए पका टमाटर खाना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है।
  • बच्चों को सूखा रोग होने पर आधा गिलास टमाटर के रस का सेवन कराने से बच्चे का सूखा रोग ठीक हो जाता है।
  • बच्चों के विकास के लिए टमाटर बहुत फायदेमंद होता है। दो या तीन पके हुए टमाटरों का नियमित सेवन करने से बच्चों का विकास शीघ्र होता है।
  • वजन घटाने के लिए टमाटर बहुत काम का होता है। मोटापा कम करने के लिए सुबह-शाम एक गिलास टमाटर का रस पीना फायदेमंद होता है।
  • यदि गठिया रोग है तो एक गिलास टमाटर के रस की सोंठ तैयार करें व इसमें एक चम्मच अजवायन का चूर्ण सुबह-शाम पीजिए, गठिया रोग में फायदा होगा
    • टमाटर के नियमित सेवन से अन्य रोग जैसे डायबिटीज, आंखों व पेशाब संबंधी रोगों, पुरानी कब्ज व चमड़ी के रोगों में फायदा होता है।
    • गर्भवती महिलाओं के लिए टमाटर बहुत फायदेमंद होता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को सुबह एक गिलास टमाटर के रस का सेवन करना चाहिए।
      • टमाटर पेट के लिए बहुत फायदेमंद होता है। टमाटर के नियमित सेवन से पेट साफ रहता है।
      • कफ होने पर टमाटर का सेवन अत्यंत लाभदायक है।
      • पेट में कीड़े होने पर सुबह खाली पेट टमाटर में पिसी हुई कालीमिर्च लगाकर खाने से फायदा होता है।
      • भोजन करने से पहले दो या तीन पके टमाटरों को काटकर उसमें पिसी हुई कालीमिर्च, सेंधा नमक एवं हरा धनिया मिलाकर खाएं। इससे चेहरे पर लाली आती है।
      • टमाटर के गूदे में कच्चा दूध व नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे पर चमक आती है।टमाटर का सेवन करने से नुकसान भी होता है। अम्ल पित्त, सूजन और पथरी के मरीजों को टमाटर नहीं खाना चाहिए। आंतों की बीमारी होने पर भी टमाटर का प्रयोग नहीं करना चाहिए। मांस पेशियों में दर्द या शरीर में सूजन हो तो टमाटर नहीं खाना चाहिए।

ख़ुश रहिए और सर्दी से बचिए

सर्दी आते ही लोग गर्म कपड़े पहनने शुरू कर देते हैं और बाहर निकलना कम कर देते हैं खासकर सुबह और रात में कम ही लोग बाहर घूमने निकलते हैं। सर्दी अपने साथ कई बीमरियां भी लेकर आती है जिस कारण घरों में काफी तनाव का माहौल भी रहता है। लेकिन हमेशा सतर्क रहकर या साफ-सफाई करके ही सर्दी के खतरो को नहीं टाला जा सकता। खुश रहकर भी सर्दी में होने वाले खतरों को टाला जा सकता है। खुश रहकर आप ना केवल अपने आसपास वालों के लिए माहौल अच्छा बनाते हैं, बल्कि सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं से भी बच जाते हैं।

प्रतिरक्षा प्रणाली बूस्टर – सर्दी में शरीर का पाचन-तंत्र कमजोर हो जाता है जिस कारण इम्युन सिस्टम कमजोर हो जाता है। जबकि किसी भी प्रकार के रोग से लड़ना हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली का काम है और हमारी नकारात्मक सोच प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर बनाती है। इससे संक्रामक बीमरियों का खतरा भी बढ़ जाता है, इसलिए अच्छा सोचें और रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित करें। हंसने से हमारी शरीर की मांस-पेशियों में रक्त-संचार सुचारु रुप से होने लगता है जिससे शरीर का पाचन-तंत्र और प्रतिरक्षा-प्रणाली सही तरीके से काम करने लगती है।

गुस्से पर लगाम कसें:- कहते हैं गुस्सा करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं। वैज्ञानिकों की मानें तो, जो लोग तनावग्रस्त रहते हैं या गुस्सा करते हैं, उनमें सर्दी और दूसरी संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। अगर आप भी छोटी-छोटी बातों पर गुस्सार करने वालों में से हैं, तो अपनी यह आदत आज ही बदल डालें सीधा।

तनाव प्रबंधन का महत्व:-

हमारी सोच सीधा हमारे स्वास्‍थ्‍य को प्रभावित करती है। नकारात्क्द  सोच, तनाव को बढ़ावा देती है और स्वास्‍थ्‍य पर बुरा प्रभाव डालती है। तनाव प्रबंधन के लिए मेडिटेशन या योगा का भी सहारा लिया जा सकता है। मेडिटेशन आपको खुश रखने के साथ ही आपके तनाव को कम करेगा औऱ दिमाग को शांत रखेगा। साथ ही आपकी चेहरे की चमक को भी बढ़ाएगा।

खुश रहने के आसान तरीके- 

  • स्वस्थ आहार का पालन करें।
  • हफ्ते में कम से कम 3 बार व्यायाम करें।
  • प्रेरणादायक किताबें पढ़ें या फिल्में  देखें।
  • हफ्ते में कम से कम एक दिन अपना पसंदीदा काम करें।
  • नकारात्मक सोच वाले लोगों से दूर रहें।
सर्दी-जुकाम से बचने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली का मजबूत होना आवश्याक है। तनाव के कारण हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली कमज़ोर हो जाती है और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

Wednesday, 26 October 2016

बवासीर बेहद दुखदायी रोग-उपचार

बवासीर बेहद दुखदायी रोग है जिसकी वजह से रोगी बेहद परेशान रहता है। बवासीर को पाइल्स भी कहा जाता है। यह दो प्रकार की होती है। बहार की बवासीर औरअंदर की बवासीर। आइये जानते हैं दोनो में क्या अंतर होता है। बहारी बवासीर में गुदा वाली जगह में मस्सा होता है और इसमें दर्द नहीं होता है। लेकिन खुजली ज्यादा होती है। जिस वजह से गुदा से खून आने लगता है और इंसान बेवजह परेशान हो जाता है। अंदर की बवासीर में मस्से गुदे के अंदर होता है। और कब्ज की वजह से मलकरते समय जोर लगाने से खून बाहर आ जाता है और रोगी बेहद तेज दर्द से तड़प जाता है। और यदि मस्से छिल जाए तो दर्द बढ़ जाता है।बवासीर को जड़ से खत्म करने के आयुर्वेद में अचूक और कारगर उपाय बताए हैं !

बवासीर का प्रभावी हर्बल उपचार- इस बीमारी को अर्श, पाइस या मूलव्याधि के नाम से भी जाना जाता है। इस रोग में गुदा की भीतरी दीवार में मौजूद खून की नसें सूजने के कारण तनकर फूल जाती हैं। इससे उनमें कमजोरी आ जाती है और मल त्याग के वक्त जोर लगाने से या कड़े मल के रगड़ खाने से खून की नसों में दरार पड़ जाती हैं और उसमें से खून बहने लगता है।

कारण-कुछ व्यक्तियों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है। अतः अनुवांशिकता इस रोग का एक कारण हो सकता है। जिन व्यक्तियों को अपने रोजगार की वजह से घंटों खड़े रहना पड़ता हो, जैसे बस कंडक्टर, ट्रॉफिक पुलिस, पोस्टमैन या जिन्हें भारी वजन उठाने पड़ते हों,- जैसे कुली, मजदूर, भारोत्तलक वगैरह, उनमें इस बीमारी से पीड़ित होने की संभावना अधिक होती है। कब्ज भी बवासीर को जन्म देती है, कब्ज की वजह से मल सूखा और कठोर हो जाता है जिसकी वजह से उसका निकास आसानी से नहीं हो पाता मलत्याग के वक्त रोगी को काफी वक्त तक पखाने में उकडू बैठे रहना पड़ता है, जिससे रक्त वाहनियों पर जोर पड़ता है और वह फूलकर लटक जाती हैं। बवासीर गुदा के कैंसर की वजह से या मूत्र मार्ग में रूकावट की वजह से या गर्भावस्था में भी हो सकता है।
बवासीर मतलब पाइल्स यह रोग बढ़ती उम्र के साथ जिनकी जीवनचर्या बिगड़ी हुई हो, उनको होता है। जिन लोगों को कब्ज अधिक रहता हो उनको यह आसानी से हो जाता है। इस रोग में गुदा द्वार पर मस्से हो जाते है। जो सुखे और फुले दो प्रकार के होते है। मल विसर्जन के वक्त इसमें असहनीय पीड़ा होती है तथा खून भी निकलता है इससे रोगी कमजोर हो जाता है। बवासीर को आधुनिक सभ्यता का विकार कहें तो कॊई अतिश्योक्ति न होगी । खाने पीने मे अनिमियता , जंक फ़ूड का बढता हुआ चलन और व्यायाम का घटता महत्व , लेकिन और भी कई कारण हैं बवासीर के रोगियों के बढने में ।
बवासीर के प्रकार.......

खूनी बवासीर- खूनी बवासीर में किसी प्रक़ार की तकलीफ नही होती है केवल खून आता है। पहले पखाने में लगके, फिर टपक के, फिर पिचकारी की तरह से सिफॅ खून आने लगता है। इसके अन्दर मस्सा होता है। जो कि अन्दर की तरफ होता है फिर बाद में बाहर आने लगता है। टट्टी के बाद अपने से अन्दर चला जाता है। पुराना होने पर बाहर आने पर हाथ से दबाने पर ही अन्दर जाता है। आखिरी स्टेज में हाथ से दबाने पर भी अन्दर नही जाता है।
बादी बवासीर
बादी बवासीर रहने पर पेट खराब रहता है। कब्ज बना रहता है। गैस बनती है। बवासीर की वजह से पेट बराबर खराब रहता है। न कि पेट गड़बड़ की वजह से बवासीर होती है। इसमें जलन, ददॅ, खुजली, शरीर मै बेचैनी, काम में मन न लगना इत्यादि। टट्टी कड़ी होने पर इसमें खून भी आ सकता है। इसमें मस्सा अन्दर होता है। मस्सा अन्दर होने की वजह से पखाने का रास्ता छोटा पड़ता है और चुनन फट जाती है और वहाँ घाव हो जाता है उसे डाक्टर अपनी जवान में फिशर भी कहते हें। जिससे असहाय जलन और पीडा होती है। बवासीर बहुत पुराना होने पर भगन्दर हो जाता है। जिसे अंग़जी में फिस्टुला कहते हें। फिस्टुला प्रक़ार का होता है। भगन्दर में पखाने के रास्ते के बगल से एक छेद हो जाता है जो पखाने की नली में चला जाता है। और फोड़े की शक्ल में फटता, बहता और सूखता रहता है। कुछ दिन बाद इसी रास्ते से पखाना भी आने लगता है। बवासीर, भगन्दर की आखिरी स्टेज होने पर यह केंसर का रूप ले लेता है। जिसको रिक्टम केंसर कहते हें। जो कि जानलेवा साबित होता है।
—-बवासीर के कारण
कुछ व्यक्तियों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है। अतः अनुवांशिकता इस रोग का एक कारण हो सकता है। जिन व्यक्तियों को अपने रोजगार की वजह से घंटों खड़े रहना पड़ता हो, जैसे बस कंडक्टर, ट्रॉफिक पुलिस, पोस्टमैन या जिन्हें भारी वजन उठाने पड़ते हों,- जैसे कुली, मजदूर, भारोत्तलक वगैरह, उनमें इस बीमारी से पीड़ित होने की संभावना अधिक होती है। कब्ज भी बवासीर को जन्म देती है, कब्ज की वजह से मल सूखा और कठोर हो जाता है जिसकी वजह से उसका निकास आसानी से नहीं हो पाता मलत्याग के वक्त रोगी को काफी वक्त तक पखाने में उकडू बैठे रहना पड़ता है, जिससे रक्त वाहनियों पर जोर पड़ता है और वह फूलकर लटक जाती हैं। बवासीर गुदा के कैंसर की वजह से या मूत्र मार्ग में रूकावट की वजह से या गर्भावस्था में भी हो सकता है।
बवासीर के लक्षण
बवासीर का प्रमुख लक्षण है गुदा मार्ग से रक्तस्राव जो शुरूआत में सीमित मात्रा में मल त्याग के समय या उसके तुरंत बाद होता है। यह रक्त या तो मल के साथ लिपटा होता है या बूंद-बूंद टपकता है। कभी-कभी यह बौछार या धारा के रूप में भी मल द्वारा से निकलता है। अक्सर यह रक्त चमकीले लाल रंग का होता है, मगर कभी-कभी हल्का बैंगनी या गहरे लाल रंग का भी हो सकता है। कभी तो खून की गिल्टियां भी मल के साथ मिली होती हैं
  • मलद्वार के आसपास खुजली होना
  • मल त्याग के समय कष्ट का आभास होना
  • मलद्वार के आसपास पीडायुक्त सूजन
  • मलत्याग के बाद रक्त का स्त्राव होना
  • नोट – बवासीर 2 माह की दवा हमारे द्वारा 3000 मे पोस्टल चार्ज के साथ भेजी जाएगी 2 माह मे बवासीर केसा भी हो जडमूल से निकल जाएगा
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Saturday, 22 October 2016

बवासीर बेहद दुखदायी रोग और उससे मुक्ति

बवासीर बेहद दुखदायी रोग है जिसकी वजह से रोगी बेहद परेशान रहता है। बवासीर को पाइल्स भी कहा जाता है। यह दो प्रकार की होती है। बहार की बवासीर औरअंदर की बवासीर। आइये जानते हैं दोनो में क्या अंतर होता है। बहारी बवासीर में गुदा वाली जगह में मस्सा होता है और इसमें दर्द नहीं होता है। लेकिन खुजली ज्यादा होती है। जिस वजह से गुदा से खून आने लगता है और इंसान बेवजह परेशान हो जाता है। अंदर की बवासीर में मस्से गुदे के अंदर होता है। और कब्ज की वजह से मलकरते समय जोर लगाने से खून बाहर आ जाता है और रोगी बेहद तेज दर्द से तड़प जाता है। और यदि मस्से छिल जाए तो दर्द बढ़ जाता है।बवासीर को जड़ से खत्म करने के आयुर्वेद में अचूक और कारगर उपाय बताए हैं !

क्यों होती है बवासीर–
1. बवासीर होने की कई वजह होती है जिसमें से एक है अधिक देर तक एक जगह कुर्सी पर बैठे रहना।
2. दूसरा कारण है ज्यादा तेज मिर्च मसालों का अधिक सेवन करना।
3. देर तक किसी गाड़ी में बैठे रहना या मोटर बाईक चलना।
4. मोटापे का कारण भी बवासीर का मुख्य कारण बन सकता है।
5. अधिक शराब का का सेवन करना।
6. निराहार उपवास करने वाले लोगों को भी पाइल्स हो सकता है।
7. गर्भावस्था के दौरान आखरी के तीन महीनों में गर्भवती को बवासीर हो सकता है।
8. मल त्याग करते समय अधिक तेजी से प्रेश लगाना।
9. अधिक देर तक रात में काम करना।
10.जो लोग पानी का सेवन कम करते हैं उन्हें भी पाइल्स हो सकता है।
11. टेंशन और मानसिक रोग भी बवासीर का कारण बन सकता है।
यह पूरी तरह से कहा जा सकता है कि जब शरीर से निकलने वाला मल के रास्ते में रूकावट आती है और वह दर्द उत्पन्न करती है तो उसे बवासीर कहा जाता है।
बवासीर के लक्षण…….
गुदा वाली जगह पर दर्द होना जिस वजह से उठने, बैठने और चलने में दर्द होता है। दूसरा प्रमुख लक्षण है गुदा वाली जगह पर बार-बार खुजली का होना।
पेट में कब्ज बनने लगती है और रोगी दर्द की वजह से मल त्याग करने से डरता है। खून के लगातार बहने की वजह से रोगी का हीमोग्लोबिन कम हो जाता है।मल निकलने वाली जगह यानी गुदे में सूजन आने लगती है। अंदर वाली बवासीर में मस्से बाहर लटकने लगते है और रोगी मल त्याग नहीं कर पाता जिस वजह से वह जोर लगाता है लेकिन उसी समय मस्सों से खून निकलने लगता है।
सुझाव जो बवासीर को होने नहीं देंगे……
1. प्रतिदिन 2 लीटर गाय के दूध से बनी दही से निकली हुई मीठी छांछ में थोड़ा जीरा मिलाकर सेवन करने से बवासीर खत्म होने लगती है।
2. जिमीकंद और गुड का हमेशा इस्तेमाल करते रहने से भी बवासीर खत्म होने लगती है।
3. मल, मूत्र, गैस को अधिक देर तक न रोकें क्योंकि यह बवासीर का कारण बनती है।
अन्य सुझाव
1. पपीता, अंगूर, आम का सवेन करने से बवासीर नहीं होती।
2. तिल के लड्डू को खाने से बवासीर रोग में लाभ मिलता है।
3. नारियलपानी, सूप, पानी, और छाछ जैसी तरल चीजों का सेवन करें। यह मल को कठोर नहीं होने देती जिससे रोगी को मल त्यागना आसान हो जाता है।
4. उबले हुए दूध में पके केले को मसलकर दिन में 2 से 3 बारी लें।
5. 2 से 3 महीने तक लगातार पालक, गाजर और चुकंदर का रस रोज पीएं।
6. नीम का तेल बवासीर वाली जगह पर लगायें।
7. मेथी, गाजर, शलजम, करेला, अदरक, प्याज आदि का सेवन करना बवासीर के रोग में लाभ देता है।
8. सुबह सुबह जामुन में नमक लगाकर 1 से 2 महीने तक सेवन करते रहने से भी बवासीर ठीक हो सकता है।
9. छाछ में अजवाइन डालकर सेवन करते रहें।
10. मूली खाने से बवासीर में पूर्ण लाभ मिलता है।
11. अदरक, पुदीने का रस, और नींबू को पानी व शहद के साथ मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से भी बवासीर में लाभ मिल सकता है।
12.पका हुआ केला लें और उसे चीरकर दो टुकड़े कर लें और उसमें कत्था पीसकर छिड़क दें और इसे खुले आकाश के नीचे शाम को रख दें और सुबह उस केले का सेवन करें। लगातार एक सप्ताह तक एैसा करने से खतरनाक से खतरनाक बवासीर खत्म हो जाती है।
13- बकरी का दूध सुबह और शाम पीने से बवासीर से खून आना बंद हो जाएगा।
14- हरड़ को गुड के साथ लेने से बवासीर में लाभ होता है।
15- कमल के हरे पत्ते को पीसकर उसमें मिश्री को मिलाकर खाने से बवासीर से खून आना बंद हो जाता है।
16- छाछ और दही रोज खाएं।
17- एक ग्राम काले तिल और एक ग्राम दूध का मक्खन को मिलाकर खाने से बवासीर रोग ठीक हो जाता है।
18- छोटी पिप्पली को अच्छे से पीसकर उसका चूर्ण बना लें और इसे शहद के साथ सेवन करें।
19- 6 ग्राम शक्कर और नीम के 11 बीज को सुबह फांकने से बवासीर रोग में आराम मिलता है।
20- ताजा मक्खन, नागकेशर और मिश्री तीनों को बराबर मात्रा में मिलाकर खाने से बवासीर रोग में फायदा मिलता है।
21- हरड़ के साथ गुड खाने से भी बवासीर में लाभ मिलता है।
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➡ औषिधि सेवन के दौरान परहेज़ :
ध्यान रखे की औषिधि लेते समय सात दिन नमक का सेवन बिलकुल नहीं करना है ।
देशी इलाज में पथ्यापथ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है कई रोगों में तो दवाई से ज्यादा तो पथ्य आहार जादा कारगर होता है।
➡ औषिधि सेवन के दौरान क्या-क्या खाएं :
मुंग या चने की दाल, कुल्थी की दाल, पुराने चावलों का भात, सांठी चावल, बथुआ, परवल, तोरई, करेला, कच्चा पपीता, गुड, दूध, घी, मक्खन, काला नमक, सरसों का तेल, पका बेल, सोंठ आदि पथ्य है। रोगी को दवा सेवन काल में इसका ही सेवन करना चाहिए।
➡ औषिधि सेवन के दौरान क्या-क्या न खाएं :
उड़द, धी, सेम, भारी तथा भुने पदार्थ, घिया, धूप या ताप, अपानुवायु को रोकना, साइकिल की सवारी, सहवास, कड़े आसन पर बैठना आदि ये सभी बवासीर के लिए हानिकारक है।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे ….. औषधि के साथ खाने के बाद अभियारिस्ट का 20 मिली समभाग पानी से सेवन फायदे बंद है ….

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आर्थराइटिस एवं गठिया कारण निवारण एवं उपचार

गठिया, सुनने में यह रोग आज जितना सामान्य लगता है इसमें तकलीफें उतनी ही अधिक हैं। वैसे तो गठिया का उपचार आज एलोपैथ, आयुर्वेद और होम्योपैथ- चिकित्सा की तीनों विधाओं में मौजूद है। जब एलोपैथ से इसमें खास आराम नहीं मिलता तो इस दुष्ट रोग से लड़ने के लिए आयुर्वेदिक पद्धति एक बेहतरीन विकल्प साबित होती है। बस आवश्यकता है, इस रोग के लक्षण पहचानकर, सही समय पर इसका उपचार सही आयुर्वेदिक विशेषज्ञ के परामर्श से करवाएं।आमवात जिसे गठिया भी कहा जाता है अत्यंत पीडादायक बीमारी है।अपक्व आहार रस याने “आम” वात के साथ संयोग करके गठिया रोग को उत्पन्न करता है।अत: इसे आमवात भी कहा जाता है।लक्षण- जोडों में दर्द होता है, शरीर मे यूरिक एसीड की मात्रा बढ जाती है। छोटे -बडे जोडों में सूजन का प्रकोप होता रहता है।
गठिया के कारण
गठिया एक वात रोग है जिसका कारण कॉन्सटिपेशन, गैस, एसिडिटी, अव्यवस्थित जीवनशैली और अनियमित खान-पान आदि में से कुछ भी हो सकता है। कई बार शारीरिक श्रम कम होने और मानसिक श्रम अधिक होने के कारण भी यह बीमारी हो सकती है।’आमवात जिसे गठिया भी कहा जाता है अत्यंत पीडादायक बीमारी है।अपक्व आहार रस याने “आम” वात के साथ संयोग करके गठिया रोग को उत्पन्न करता है।अत: इसे आमवात भी कहा जाता है।लक्षण- जोडों में दर्द होता है, शरीर मे यूरिक एसीड की मात्रा बढ जाती है। छोटे -बडे जोडों में सूजन का प्रकोप होता रहता है।यूरिक एसीड के कण(क्रिस्टल्स)घुटनों व अन्य जोडों में जमा हो जाते हैं।जोडों में दर्द के मारे रोगी का बुरा हाल रहता है।गठिया के पीछे यूरिक एसीड की जबर्दस्त भूमिका रहती है। इस रोग की सबसे बडी पहचान ये है कि रात को जोडों का दर्द बढता है और सुबह अकडन मेहसूस होती है। यदि शीघ्र ही उपचार कर नियंत्रण नहीं किया गया तो जोडों को स्थायी नुकसान हो सकता है।महिलाओं में एस्ट्रोजिन हार्मोन की कमी होने पर गठिया के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।अधिक खाना और व्यायाम नहीं करने से जोडों में विकार उत्पन्न होकर गठिया जन्म लेता है।छोटे बच्चों में पोषण की कमी के चलते उनका इम्युन सिस्टम कमजोर हो जाता है फ़लस्वरूप रुमेटाईड आर्थराईटीज रोग पैदा होता है जिसमें जोडों में दर्द ,सूजन और गांठों में अकडन रहने लगती है।शरीर में रक्त दोष जैसे ल्युकेमिया होने अथवा चर्म विकार होने पर भी गठिया रोग हो सकता है।थायराईड ग्रन्थि में विकार आने से गठिया के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।आंतों में पैदा होने वाले रिजाक्स किटाणु शरीर के जोडों को भी दुष्प्रभावित कर सकते हैं। गठिया के ईलाज में हमारा उद्धेश्य शरीर से यूरिक एसीड बाहर निकालने का प्रयास होना चाहिये। यह यूरिक एसीड प्यूरीन के चयापचय के दौरान हमारे शरीर में निर्माण होता है। प्यूरिन तत्व मांस में सर्वाधिक होता है।इसलिये गठिया रोगी के लिये मांसाहार जहर के समान है। वैसे तो हमारे गुर्दे यूरिक एसीड को पेशाब के जरिये बाहर निकालते रहते हैं। लेकिन कई अन्य कारणों की मौजूदगी से गुर्दे यूरिक एसीड की पूरी मात्रा पेशाब के जरिये निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। इसलिये इस रोग से मुक्ति के लिये जिन भोजन पदार्थो में पुरीन ज्यादा होता है,उनका उपयोग कतई न करें। वैसे तो पतागोभी,मशरूम,हरे चने,वालोर की फ़ली में भी प्युरिन ज्यादा होता है लेकिन इनसे हमारे शरीर के यूरिक एसीड लेविल पर कोई ज्यादा विपरीत असर नहीं होता है। अत: इनके इस्तेमाल पर रोक नहीं है। जितने भी सोफ़्ट ड्रिन्क्स हैं सभी परोक्ष रूप से शरीर में यूरिक एसीड का स्तर बढाते हैं,इसलिये सावधान रहने की जरूरत है।
गठिया के लक्षण
इस रोग में घुटनों व शरीर के दूसरे जोड़ों में दर्द शुरू हो जाता है जिसमें यदि असावधानी बरतें तो यह आगे चलकर उंगलियों व जोड़ों में सूजन और लाल रंग का घाव उत्पन्न कर देता है। इतना ही नहीं, अनदेखी करने पर इससे हाथ-पैर टेढ़े हो जाते हैं। इस बीमारी में हाथ व पैर को हिलाना भी मुश्किल हो जाता है।
खान पान केसा हो ..
गठिया के मरीजों के लिए डाइट पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। अधिक तेल व मिर्च वाले भोजन से परहेज रखें और डाइट में प्रोटीन की अधिकता वाली चीजें न लें। भोजन में बथुआ, मेथी, सरसों का साग, पालक, हरी सब्जियों, मूंग, मसूर, परवल, तोरई, लौकी, अंगूर, अनार, पपीता, आदि का सेवन फायदेमंद है। इसके अलावा, नियमित रूप से लहसुन व अदरक आदि का सेवन भी इसके उपचार में फायदेमंद है
आर्थराइटिस एवं गठिया के अचूक नुस्खे :———–
A– सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मौसम के मुताबिक 3 से 6 लिटर पानी पीने की आदत डालें। ज्यादा पेशाब होगा और अधिक से अधिक विजातीय पदार्थ और यूरिक एसीड बाहर निकलते रहेंगे
B- संतरे के रस में 15 मिलि काड लिवर आईल मिलाकर शयन से पूर्व लेने से गठिया में आश्चर्यजनक लाभ होता है।
C- लहसुन,गिलोय,देवदारू,सौंठ,अरंड की जड ये पांचों पदार्थ 50-50 ग्राम लें।इनको कूट-खांड कर शीशी में भर लें। २ चम्मच की मात्रा में एक गिलास पानी में डालकर ऊबालें ,जब आधा रह जाए तो उतारकर छान लें और ठंडा होने पर पीलें। ऐसा सुबह-शाम करने से गठिया में अवश्य लाभ होगा।
D- लहसुन की कलियां 50 ग्राम लें।सैंधा नमक,जीरा,हींग,पीपल,काली मिर्च व सौंठ 2-2 ग्राम लेकर लहसुन की कलियों के साथ भली प्रकार पीस कर मिलालें। यह मिश्रण अरंड के तेल में भून कर शीशी में भर लें। आधा या एक चम्मच दवा पानी के साथ दिन में दो बार लेने से गठिया में आशातीत लाभ होता है।
E- हर सिंगार (पारिजात) के ताजे पती ४-५ नग लें। पानी के साथ पीसले या पानी के साथ मिक्सर में चलालें। यह नुस्खा सुबह-शाम लें ३-४ सप्ताह में गठिया और वात रोग में जबरदस्त लाभ होगा| (बहुत कारगर है ये )
F- बथुआ के पत्ते का रस करीब 50 मिलि प्रतिदिन खाली पेट पीने से गठिया रोग में जबर्दस्त फ़ायदा होता है। अल सुबह या शाम को 4 बजे रस लेना चाहिये।जब तक बथुआ सब्जी मिले या 2 माह तक उपचार लेना उचित है।रस लेने के आगे पीछे १ घंटे तक कुछ न खाएं। बथुआ के पत्ते काटकर आटे में गूंथकर चपाती बनाकर खाना भी हितकारी उपाय है।
सुरजन सीरी 100 ग्राम , सोंठ100 ग्राम देसी खंड 200 ग्राम ले कर पाउडर बना ले और सुबह श्याम लेने से बाय का रोग दूर होता है
1. हल्दी-चूर्ण, गुड़, मैथी दाना पाऊडर और पानी समान मात्रा में मिलाकर गरम करके इनका लेप रात को घुटनों पर करें व पट्टी बाँधकर रातभर बंधे रहने दें. सुबह पट्टी हटा कर साफ कर लें. कुछ ही दिनों में जबरदस्त फायदा महसूस होने लग जाएगा.
2. मैथी दाने, सौंठ और हल्दी समान मात्रा में मिलाकर, पीसकर नित्य सुबह-शाम भोजन करने के बाद गरम पानी से, दो-दो चम्मच फ़की लेने से लाभ होता है.
3. मैथी दाने हमेशा सुबह खाली पेट जबकि दोपहर और रात में खाना खाने के बाद, आधा आधा चम्मच मात्रा पानी के साथ फाँकने से सभी जोड़ मजबूत रहेंगे और जोड़ों में किसी भी प्रकार का दर्द कभी नहीं होगा.
4. अलसी के दानों के साथ 2 अखरोट की मिगी सेवन करने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है.
5. रोज सुबह भूखे पेट एक चम्मच कुटे हुए मैथी दाने में 1 ग्राम कलौंजी मिलाकर एक बार खा लें.
6. अँकुरित मैथी दाने खाएँ और उसके खाने के बाद आधे घंटे तक कुछ न खाएँ.
7. मैथी दानों को दरदरा कूटकर सर्दियों में 2 चम्मच और गर्मी में एक चम्मच की फाँकी सुबह-सुबह खाली पेट पानी के साथ लें.
8. अगर घुटनों की चिकनाई ख़तम हुई हो गई हो और जोड़ो के दर्द में किसी भी प्रकार की दवा से आराम ना मिलता हो तो ऐसे लोग हारसिंगार (पारिजात) पेड़ के 12 पत्तों को कूटकर 1 गिलास पानी में उबालें. जब पानी एक चौथाई बच जाए तो बिना छाने ही ठंडा करके पी लें. 90 दिन में चिकनाई पूरी तरह वापिस बन जाएगी. अगर कुछ कमी रह जाए तो 9. महीने का अंतर देकर फिर से 90 दिन तक इसी क्रम को दोहराएँ. निश्चित लाभ की प्राप्ति होती है.
10. 30 की उम्र के बाद मैथी दाने की फाँकी लेने से शरीर के जोड़ मजबूत बने रहते हैं तथा बुढ़ापे तक मधुमेह, ब्लड प्रेशर और गठिया जैसे रोगों से बचाव होता है.
11. अगर कैल्शियम की कमी से जोड़ों का दर्द हो तो खाने वाला चूना खाईए. गेंहू के दाने के आकार का चूना दही या दूध में घोल कर दिन में एक बार के हिसाब से, 90 दिन तक लीजिए. ध्यान रखें 90 दिन से अधिक नहीं लेना है
12. मैथी दानों को तवे या कढ़ाही में गुलाबी होने तक सेकें. ठंडा होने पर पीस लें. रोज सुबह खाली पेट आधा चम्मच, एक गिलास पानी के साथ लें
13. नीम का तेल एवं अरंडी का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम इसकी मालिश कीजिए.
14. मैथी के लड्डू खाने से हाथ-पैर और जोड़ों के दर्दो में आराम मिलता है.
15. पंचामृत लोह गुगल,रसोनादि गुगल,रास्नाशल्लकी वटी,तीनों एक-एक गोली सुबह और रात को सोते वक्त दूध के साथ २-३ माह तक लेने से गठिया में बहुत फ़ायदा होता है।
16. उक्त नुस्खे के साथ अश्वगंधारिष्ट ,महारास्नादि काढा और दशमूलारिष्टा २-२ चम्मच मिलाकर दोनों वक्त भोजन के बाद लेना हितकर है।
17. चिकित्सा वैग्यानिकों का मत है कि गठिया रोग में हरी साग सब्जी का प्रचुरता से इस्तेमाल करना बेहद फ़ायदेमंद रहता है। पत्तेदार सब्जियो का रस भी अति उपयोगी रहता है।
18. भाप से स्नान करने और जेतुन के तैल से मालिश करने से गठिया में अपेक्षित लाभ होता है।
19. गठिया रोगी को कब्ज होने पर लक्षण उग्र हो जाते हैं। इसके लिये गुन गुने जल का एनिमा देकर पेट साफ़ रखना आवश्यक है।
20. अरण्डी के तैल से मालिश करने से भी गठिया का दर्द और सूजन कम होती है।
21. सूखे अदरक (सौंठ) का पावडर १० से ३० ग्राम की मात्रा में नित्य सेवन करना गठिया में परम हितकारी है।
22. चिकित्सा वैज्ञानिकों का मत है कि गठिया रोगी को जिन्क,केल्शियम और विटामिन सी के सप्लीमेंट्स नियमित रूप से लेते रहना लाभकारी है।
23. गठिया रोगी के लिये अधिक परिश्रम करना या अधिक बैठे रहना दोनों ही नुकसान कारक होते हैं। अधिक परिश्रम से अस्थि-बंधनो को क्षति होती है जबकि अधिक गतिहीनता से जोडों में अकडन पैदा होती है।
24. गठिया उग्र होने पर किसी भी प्रकार का आटा ३ हफ्ते तक भोजन में शामिल ना करें| बाद में धीरे धीरे उपयोग शुरू करें|
25 पनीर ,दही,माखन,इमली,कच्चा आम का उपयोग बंद करने से लाभ होता है|
25. शकर की जगह शहद वापरें|
27. हल्दी गठिया का दर्द घटाती है और सूजन भी कम करती है|
28. प्याज,लहसुन और सेवफल का उपयोग हितकारी रहता है|
ऊपर दिया गए उपाय आप अवश्य अजमाए। इसका असर होने में थोड़ा समय लग जायेगा लेकिन ये असर जरूर करेगा। अगर कोई समस्या हो कुछ समझ नहीं आया तो आप अच्छे डॉक्टर और जानकार से सलाह ले सकते है।
हरसिंगार (पारिजात) के पेड़ से इलाज ——–
* पारिजात पेड़ के पांच पत्ते तोड़ के पत्थर में पिस के चटनी बनाइये और एक ग्लास पानी में इतना गरम करो के पानी आधा हो जाये फिर इसको ठंडा करके पियो तो बीस बीस साल पुराना गठिया का दर्द इससे ठीक हो जाता है।
*और ये ही पत्ते को पीस के गरम पानी में डाल के पियो तो बुखार ठीक कर देता है और जो बुखार किसी दावा से ठीक नही होता वो इससे ठीक होता है; जैसे चिकनगुनिया का बुखार, डेंगू फीवर, Encephalitis , ब्रेन मलेरिया, ये सभी ठीक होते है।* पारिजात बावासीर रोग के निदान के लिए रामबाण औषधी है। इसके एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बवासीर रोग ठीक हो जाता है। पारिजात के बीज का लेप बनाकर गुदा पर लगाने से बवासीर के रोगी को राहत मिलती है।* इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदय रोग से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते हैं। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएँ सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जहाँ बालों के लिए शीरप का काम करते हैं तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है।
एक और कारगर उपाय
एक लिटर पानी तपेली या भगोनी में आंच पर रखें। इस पर तार वाली जाली रख दें। एक कपडे की चार तह करें और पानी मे गीला करके निचोड लें । ऐसे दो कपडे रखने चाहिये। अब एक कपडे को तपेली से निकलती हुई भाप पर रखें। गरम हो जाने पर यह कपडा दर्द करने वाले जोड पर ३-४ मिनिट रखना चाहिये। इस दौरान तपेली पर रखा दूसरा कपडा गरम हो चुका होगा। एक को हटाकर दूसरा लगाते रहें। यह उपक्रम रोजाना १५-२० मिनिट करते रहने से जोडों का दर्द आहिस्ता आहिस्ता समाप्त हो जाता है।
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