एक थे
राम। किसी कथाकार का कल्पनातीत चरित्र थे,अथवा वाकयी ऐतिहासिक
किरदार,इसमें कुछ लोगों की सोच में मतांतर हो सकता है,किन्तु उनकी कथा का
कथानक इतना वस्तुपरक था कि त्रेता से शुरू होकर वाया द्वापर कलयुग तक जस का
तस दोहराया जाता रहा है। एक दिन पूर्व राम के राजतिलक की अवध में जोरों
शोरों से तैयारियाँ चल रही थी,कि दासी मंथरा की कोऊ नृप होय,हमवू का हानि
वाली कुटिल सलाह से वसीभूत सौतेली माँ केकयी ने राम के राज्याभिषेक की भां
जी
मार दी,और अगले ही दिन राम को चौदह बरस वनवास को निकलना पङा। कुछ कुछ ऐसा
ही तमिलनाडु की चेन्नयी में कलयुग में हुआ। कहां पन्नीर सेल्वम को अपने
रास्ते से हटाकर विधायक दल को आलीशन रिसोर्ट की ऐय्याशगाह में तफरीह करवाने
के बीच अम्मा के छौङे राज सिंहासन की बागडौर थामने की लगभग पूरी तैयारी कर
ली थी,चेनम्मा शशिकला नटराजन ने,कि बीच ही में माननीय उच्चतम न्यायालय ने
सारा गुङ गोबर कर डाला,और चेन्नयी का राजपाट बंगलुरू की जेल तक सिफ्ट कर
दिया गया। जेसा कि इतिहास अपने आपको दोहराता आया है। तब सौतेले भाई भरत में
अग्रज भ्राता की स्वामी भक्ति के वसीभूत चौदह बरस भाई की खङाऊ को सिंहासन
पर रख अवध की राज्य व्यवस्था का संचालन किया,और बखूबी किया कि इतिहास में
इसके उदाहरण ही बन गये।अब पनीरसामी भी चार साल वेसा ही कुछ करने वाले है।
जब चौदह साल तक व्यवस्था व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसके नाम पर चलाई जा
सकती है,तो फिर चार साल भी चलाई जा ही सकेगी। कालांतर में लालू जी के कृष्ण
जन्म स्थानान्तरण के वक्त भी ऐसा ही कुछ पाटलीपुत्र गणतंत्र में उनकी जीवन
संगिनी राबङी देवी द्वारा किया ही जा चुका है। इतिहास,काल,परिपेक्ष्य,
परिस्थिति के अनुरूप भारतीय नारियों ने समय समय पर समझ बूझ कर कदम उठाये
है। तब सीता राम के साथ वन को गमन कर गयी थी। इस वार राबङी जी ने भरत की
भूमिका के मध्यनजर पाटलीपुत्र में ही रहना उचित समझा,क्योंकि इस बार छौटे
भाई लालू के कोई थे ही नहीं, और राबङी के भाईयों पर लालू जी को जरा भी
विश्वास नहीं था।कुल जमा राज्य व्यवस्था राजशाही,सामंतशाही या लोकशाही जेसी
भी रही हो,परस्पर विश्वास और षडयंत्रो की गुंजाईश हर वक्त बरकरार रहती आई
है,और आईन्दा भी बनी रहेगी,ऐसा मैरा मानना है। आप चाहें तो मुझसे सहमत हो
भी सकते हैं,और नहीं भी..अस्तु।
विनोद दाधीच - सूरत
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