Thursday, 22 December 2016

अक्षर पथ की 4th हिन्दी सभा.की मासिक संगोष्ठी आयोजित

सूरत (विनोद दाधीच”वीनू”)- मनीशा देसाई जी के नेतृत्व में प्रथम हाउस,घोङदौङ मार्ग पर आयोजित सभा में सबसे पहले मनीशा जी ने ही अपनी लम्बी एवं मानव जीवन को झंकझोर देने वाली कहानी”ये मैरा दोष है?”का अपनी मधुर वाणी में वाचन किया।तदन्तर विनीताजी सिंघानीया ने नयी कविता शैली में चांद को खिङकी के रास्ते अपने शयन कक्ष में बखूबी उतारा,मानो चांद साक्षात शब्द की शक्ल में जमीन पर उतर आया हो। फिर बारी आई सविता आर्या जी की,जिन्होने १९९९ के अपने संस्मरण पढकर सुनाये जो हिन्दी दैनिक लोकतेज में तब छपे थे। साथ ही एक कविता भी कि उस वक्त किस तरह शिक्षकों की हङताल और शासन की जिद की वजह से छात्र-छात्राओं का कितना नुकसान हुआ। १९९९ में सूरत शहर से प्रकाशित होने वाला लोकतेज एक मात्र हिन्दी दैनिक था। तब अखबार में किसी की रचना छपना सौभाग्य की बात होती थी।‌उसके बाद विनोद दाधीच “वीनू” ने अपनी रचना पढी। “वीनू” जी परम्परागत राधा-कृष्ण के सौंदर्य के छंदो के साथ ही जल संग्रह के पुरोधा और साहित्यकार/पत्रकार श्री अनुपम मिश्र जी को कविता के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।ठेट राजस्थानी ग्रामीण नारी के सौंदर्य की उनकी राजस्थानी रचना”उठाकै घूंघट,तिरछी चितवन,नजर डार रही नार”की उपस्थित सभी सदस्यों ने भूरी भूरी प्रशंसा की। संघ के सबसे युवा सदस्य है।श्री राहुल जिन्दल ने अपनी आयु के ही अनुरूप एक प्रेम गीत”इस दिल पर लिखा,तेरा नाम मिटाने को कहते हैं,लोग मुझे किसी और का हो जाने को कहते हैं”सुनाया। , जेसे जेसे सभा का कारवां आगे बढेगा,उम्मीद। सभा के नये सदस्य सुरेन्द्र ठाकुर”अज्ञानी”आज पहली बार आये। पेशे से एस.आर.स्टील में इंजीनियर जब “मां” पर कोई मार्मिक कविता रचता है,तो विरोधाभासी सा लगता है,कि कैसे मशीनों की खटर पटर सुनने वाला इंसान इतने अच्छे तरीके से साहित्य की सेवा भी कर सकता है। ठाकुर की मां पर पढी रचना से अभीभूत होकर एक बार फिर कवि “वीनू” जी मूड में आ गये और मां पर लिखी अपनी रचना”थपकी जो देती देती,थकती नहीं है कभी,उन्नीदी आंखो में रोज,सपने सजाती मां”सुनाई। अंत में सभा से ताजाहाल जुङी उर्मिला”उर्मी”जी,जो .... आगे पढ़े 

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