ऐसा माना जाता है कि पति और पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का होता है। कई
विपरित परिस्थितियों में भी पति-पत्नी एक-दूसरे का साथ निभाते हैं। यदि
पत्नी सर्वगुण संपन्न है तो तब तो दोनों का जीवन सुखी बना रहता है लेकिन
पत्नी हमेशा क्रोधित रहने वाली है तो दोनों के जीवन में हमेशा ही मानसिक
तनाव बना रहता है। ऐसे बहुत सारे परिवार हैं जिनमें पति-पत्नी के बीच
अधिकतर तनाव रहता है ! इस तरह की समस्याएं न उत्पन्न हों, पति-पत्नी व
संतानों का जीवन नरक न बने इसके लिए प्रारम्भ से ही ध्यान रखा जाना चाहिए।
पति पत्नी विचारधारा में समानता हो पूरी कोसिश करनी चाहिए । आजकल समाज में
धन और जाति बस दो ही बात देखी जाती हैं विचारधारा की समानता की ओर कम ही
ध्यान दिया जाता है जबकि सफल गृहस्थ जीवन के लिए विचारधारा में समानता होना
अति महत्वपूर्ण है। दाम्पत्य कहते किसे हैं? क्या सिर्फ विवाहित होना या
पति-पत्नी का साथ रहना दाम्पत्य कहा जा सकता है। पति-पत्नी के बीच का ऐसा
धर्म संबंध जो कर्तव्य और पवित्रता पर आधारित हो। इस संबंध की डोर जितनी
कोमल होती है, उतनी ही मजबूत भी। जिंदगी की असल सार्थकता को जानने के लिये
धर्म-अध्यात्म के मार्ग पर दो साथी, सहचरों का प्रतिज्ञा बद्ध होकर आगे
बढऩा ही दाम्पत्य या वैवाहिक जीवन का मकसद होता है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य
है कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर स्त्री और पुरुष दोनों ही
अधूरे होते हैं। दोनों के मिलन से ही अधूरापन भरता है। दोनों की अपूर्णता
जब पूर्णता में बदल जाती है तो अध्यात्म के मार्ग पर बढऩा आसान और आनंद
पूर्ण हो जाता है। दाम्पत्य की भव्य इमारत जिन आधारों पर टिकी है वे मुख्य
रूप से सात हैं। रामायण में राम सीता के दाम्पत्य में ये सात बातें देखने
को मिलती हैं- संयम : यानि समय-समय पर उठने वाली मानसिक उत्तेजनाओं जैसे-
कामवासना, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मोह आदि पर नियंत्रण रखना। राम-सीता ने
अपना संपूर्ण दाम्पत्य बहुत ही संयम और प्रेम से जीया। वे कहीं भी मानसिक
या शारीरिक रूप से अनियंत्रित नहीं हुए। संतुष्टि : यानि एक दूसरे के साथ
रहते हुए समय और परिस्थिति के अनुसार जो भी सुख-सुविधा प्राप्त हो जाए उसी
में संतोष करना। दोनों एक दूसरे से पूर्णत: संतुष्ट थे। कभी राम ने सीता
में या सीता ने राम में कोई कमी नहीं देखी। संतान : दाम्पत्य जीवन में
संतान का भी बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है। पति-पत्नी के बीच के संबंधों
को मधुर और मजबूत बनाने में बच्चों की अहम् भूमिका रहती है। राम और सीता के
बीच वनवास को खत्म करने और सीता को पवित्र साबित करने में उनके बच्चों लव
और कुश ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संवेदनशीलता : पति-पत्नी के
रूप में एक दूसरे की भावनाओं का समझना और उनकी कद्र करना। राम और सीता के
बीच संवेदनाओं का गहरा रिश्ता था। दोनों बिना कहे-सुने ही एक दूसरे के मन
की बात समझ जाते थे। संकल्प : पति-पत्नी के रूप अपने धर्म संबंध को अच्छी
तरह निभाने के लिये अपने कर्तव्य को संकल्पपूर्वक पूरा करना। सक्षम :
सामर्थ्य का होना। दाम्पत्य यानि कि वैवाहिक जीवन को सफलता और खुशहाली से
भरा-पूरा बनाने के लिये पति-पत्नी दोनों को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप
से मजबूत होना बहुत ही आवश्यक है। समर्पण : दाम्पत्य यानि वैवाहिक जीवन में
पति-पत्नी का एक दूसरे के प्रति पूरा समर्पण और त्याग होना भी आवश्यक है।
एक-दूसरे की खातिर अपनी कुछ इच्छाओं और आवश्यकताओं को त्याग देना या समझौता
कर लेना दाम्पत्य संबंधों को मधुर बनाए रखने के लिये बड़ा ही जरूरी होता
है। पति-पत्नी किसी भी गृहस्थी की धुरी होते हैं। इनकी सफल गृहस्थी ही सुखी
परिवार का आधार होती है। अगर पति-पत्नी के रिश्ते में थोड़ा भी दुराव या
अलगाव है तो फिर परिवार कभी खुश नहीं रह सकता। परिवार का सुख, गृहस्थी की
सफलता पर निर्भर करता है। पति-पत्नी का संबंध तभी सार्थक है जबकि उनके बीच
का प्रेम सदा तरोताजा बना रहे। तभी तो पति-पत्नी को दो शरीर एक प्राण कहा
जाता है। दोनों की अपूर्णता जब पूर्णता में बदल जाती है! मे कहना चाहूँगा
मात्र पत्नी से ही सारी अपेक्षाएं करना और पति को सारी मर्यादाओं और
नियम-कायदों से छूट दे देना बिल्कुल भी निष्पक्ष और न्यायसंगत नहीं है।
स्त्री में ऐसे कई श्रेष्ठ गुण होते हैं जो पुरुष को अपना लेना चाहिए।
प्रेम, सेवा, उदारता, समर्पण और क्षमा की भावना स्त्रियों में ऐसे गुण हैं,
जो उन्हें देवी के समान सम्मान और गौरव प्रदान करते हैं। जिस प्रकार
पतिव्रत की बात हर कहीं की जाती है, उसी प्रकार पत्नी व्रत भी उतना ही
आवश्यक और महत्वपूर्ण है। जबकि गहराई से सोचें तो यही बात जाहिर होती है कि
पत्नी के लिये पति व्रत का पालन करना जितना जरूरी है उससे ज्यादा आवश्यक
है पति का पत्नी व्रत का पालन करना। दोनों का महत्व समान है। कर्तव्य और
अधिकारों की दृष्टि से भी दोनों से एक समान ही हैं। जो नियम और कायदे-कानून
पत्नी पर लागू होते हैं वही पति पर भी लागू होते हैं। ईमानदारी और
निष्पक्ष होकर यदि सोचें तो यही साबित होता है कि स्त्री पुरुष की बजाय
अधिक महम्वपूर्ण और सम्मान की हकदार है मगर सन्मान देना उसका कर्तव्य भी है
! पति जब कर्तव्य निष्ठ हो पत्नी के प्रति वफादार हो उसे पूर्ण सन्मान
देना चाहिए !जब पति को सन्मान नही मिलेगा तो पति पथ से भ्रमित होता है उसकी
पूरी ज़िम्मेदारी पत्नी की होती है यानि दोषी पत्नी ही होती है इंसान को जो
कुछ भी मिलता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जीवन में प्राप्त हर
चीज उसकी खुद की ही कमाई है। जन्म के साथ ही भाग्य का खेल शुरू हो जाता
है। हम अक्सर अपने व्यक्तिगत जीवन की असफलताओं को भाग्य के माथे मढ़ देते
हैं। कुछ भी हो तो सीधा सा जवाब होता है, मेरी तो किस्मत ही ऐसी है। हम
अपने कर्मों से ही भाग्य बनाते हैं या बिगाड़ते हैं। कर्म से भाग्य और
भाग्य से कर्म आपस में जुड़े हुए हैं। किस्मत के नाम से सब परिचित है लेकिन
उसके गर्भ में क्या छिपा है कोई नहीं जानता। भाग्य कभी एक सा नहीं होता।
वो भी बदला जा सकता है लेकिन उसके लिए तीन चीजें जरूरी हैं। आस्था, विश्वास
और इच्छाशक्ति। आस्था परमात्मा में, विश्वास खुद में और इच्छाशक्ति हमारे
कर्म में। जब इन तीन को मिलाया जाए तो फिर किस्मत को भी बदलना पड़ता है।
वास्तव में किस्मत को बदलना सिर्फ हमारी सोच को बदलने जैसा है। अपनी
वर्तमान दशा को यदि स्वीकार कर लिया जाए तो बदलाव के सारे रास्ते ही बंद हो
जाएगे। भाग्य या किस्मत वो है जिसने तुम्हारे ही पिछले कर्मो के आधार पर
तुम्हारे हाथों में कुछ रख दिया है। अब आगे यह तुम पर निर्भर है कि तुम उस
पिछली कमाई को घटाओ, बढ़ाओ, अपने कर्मो से बदलो या हाथ पर हाथ धर कर बेठे
रहो और रोते-गाते रहो कि मेरे हिस्से में दूसरों से कम या खराब आया है।
भाग्यवाद और कुछ नहीं सिर्फ पुरुषार्थ से बचने का एक बहाना या आलस्य है जो
खुद अपने ही मन द्वारा गढ़ा जाता है। यदि हालात ठीक नहीं या दु:खदायक हैं
तो उनके प्रति स्वीकार का भाव होना ही नहीं चाहिये। यदि इन दुखद हालातों के
साथ आप आसानी से गुजर कर सकते हैं तो इनके बदलने की संभावना उतनी ही कम
रहेगी। अंत मे यही कहूँगा विकट परिस्थिति मे भी परिवार के प्रति समर्पण ,
स्वभाव परिवर्तन , अहंकार का त्याग आपके जीवन को दुख से सुख मे परिवर्तित
कर सकता है इस दुख की घड़ी मे आपका आवेश मे लिया निर्णय आपका पतन ही करेगा
.... मेरे हर शब्द पर मंथन करे जीवन को सकारात्मक रूप से देखे .....
नकारात्मक उर्झा को त्यागे ................. लेखक विद्रोही आवाज के संपादक उत्तम जैन ( विद्रोही ) नोट- पोस्ट को कांट छांट कर या नाम हटा कर पोस्ट न करे
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