Sunday, 23 October 2016

भ्रष्‍टाचार मिटाने की शुरुआत खुद से..... विद्रोही की तड़फ

 
आज सारी दुनिया जिस मुल्क को, जिस मुल्क की तरक़्क़ी को आदर और सम्मान के साथ देख रही है, वह भारत है. लोग कहते हैं कि हिंदुस्तान में सब कुछ मिलता है, जी हां हमारे पास लेकिन हमें यह कहते हुए शर्म भी आती है और अफ़सोस भी होता है कि हमारे पास ईमानदारी नहीं है
( थोड़ी बहुत थी वो बेच दी ). हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भ्रष्टाचार कितनी गहराई तक उतर चुका है और किस तरह से बेईमानी एक राष्ट्रीय मजबूरी बनकर हमारी नसों में समा चुकी है इसका सही अंदाज़ा करने के लिए मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूं. ......
मेरे गांव थामला के स्कूल में इंटरवल के दौरान एक कुल्फी बेचने वाला गिरधारी लाल अपनी साइकिल पर आता था और बच्चों में कुल्फियां बेचा करता था जिसे हम भाटा की कुल्फी बोलते थे कीमत थी 10 पेसा ! यह उसका रोज़गार और हम सभी बच्चों की पसंद, दोनों एक दूसरे की ज़रूरत थे. इंटरवल में उसकी साइकिल के चारों तरफ़ भीड़ लग जाती. ऐसे में कुछ शरारती लोग उसकी आंख घूमते ही कुल्फ़ी के डिब्बे में हाथ डाल कर कुछ कुल्फियां ले उड़ते. कुल्फियां कम होने का शक तो उसे होता, लेकिन रंगे हाथ न पकड़ पाने की वजह से वह कुछ कर नहीं पाता था ! (मेने भी एक बार हाथ आजमाया)
एक दिन उसने एक अजनबी हाथ को तब पकड़ लिया जब वह डिब्बे में ही था. वह लड़ पड़ा, तो इस लड़ाई का फ़ायदा उठाकर कुछ और हाथों ने सफ़ाई दिखा दी. यह देखकर कुल्फ़ीवाले ने अपना आपा खो दिया. फिर तो लूटने वालों के हौसले और बुलंद हो गये. जब क़ुल्फ़ीवाले को यह अहसास हुआ कि उसकी सारी कुल्फ़ियां लुट जाएंगी तो वह भी लूटने वालों में शामिल हो गया और अपने दोनों हाथों में जितनी भी क़ुल्फियां आ सकती थीं उन्हें लूट-लूट कर जल्दी जल्दी खाने लगा.कहानी का तात्पर्य शायद आप समझ गए होंगे क्यू की हमारे यहां बेईमानी, भ्रष्टाचार और खुली लूट का यही आलम हैं. इससे पहले कि कोई दूसरा लूट ले. हम ख़ुद ही ख़ुद को लूट रहे हैं !
जुर्म, वारदात, नाइंसाफ़ी, बेईमानी और भ्रष्टाचार का सैकड़ों साल पुराना क़िस्सा नई पोशाक पहनकर एक बार फिर हमारे दिलों पर दस्तक दे रहा है. रगों में लहू बन कर उतर चुका भ्रष्टाचार का कैंसर. आखिरी ऑपरेशन की मांग कर रहा है. अवाम सियासत के बीज बोकर हुकूमत की रोटियां सेंकने वाले भ्रष्ट नेताओं के का फैसला करना चाहती है. ये गुस्सा एक मिसाल है कि हजारों मोमबत्तियां जब एक मकसद के लिए एक साथ जल उठती हैं तो हिंदुस्तान का हिंदुस्तानियत पर यकीन और बढ़ जाता है.
बेईमान सियासत के इस न ख़त्म होने वाले दंगल में हक़ीकत और ईमानदारी दोनों थक कर चूर हो चुके हैं. मगर फिर भी बेईमान नेताओं, मंत्रियों, अफसरों और बाबुओं की बेशर्मी को देखते हुए लड़ने पर मजबूर हैं. बेईमान और शातिर सियासतदानों की नापाक चालें हमें चाहे जितना जख़्मी कर जाएं. तो मेरे जेसे कमबख्त पत्रकार व लेखको के आगे दम तोड़ देती हैं क्यू की जिसे राजनीति मे मे कभी कोई रुचि ही नही रही ! कम बोलता हु पर दिल की तड़फ को लिख कर आप तक ब्लॉग व संपादकीय के माध्यम से भेजता हु ! तभी तो मित्र मुझे विद्रोही बोलने लगे ! महंगाई, ग़रीबी, भूख और बेरोज़गारी जैसे अहम मुद्दों से रोज़ाना और लगातार जूझती देश की अवाम के सामने भ्रष्टाचार इस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा और सबसे खतरनाक बीमारी है. अगर इस बीमारी से हम पार पा गए तो यकीन मानिए सोने की चिड़िया वाला वही सुनहरा हिंदुस्तान एक बार फिर हम सबकी नजरों के सामने होगा. पर क्या ऐसा हो पाएगा? क्या आप ऐसा कर पाएंगे? जी हां, मे आप से पूछ रहा हु क्योंकि सिर्फ क्रांति की मशालें जला कर, नारे लगा कर, आमरण अनशन पर बैठ कर या सरकार को झुका कर आप भ्रष्टाचार की जंग नहीं जीत सकते. इस जंग को जीतने के लिए खुद आपका बदलना जरूरी है. क्योंकि भ्रष्टाचार और बेईमानी को बढ़ावा देने में आप भी कम गुनहगार नहीं हैं.जो अपना काम जल्दी हो जाये ले देकर जल्दी निपटने के चक्कर मे रिश्वत देते हो ! दिल करता है आप जेसे व्यक्ति को गोली मार दु जो खुद इस बीमारी को बढ़ावा देते हो ओर फिर रोना रोते हो ! सबसे बड़े चोर ओर भ्रष्ट तो आप हो !
मंदिर में दर्शन के लिए, स्कूल अस्पताल में एडमिशन के लिए, ट्रेन में रिजर्वेशन के लिए, राशनकार्ड, लाइसेंस, पासपोर्ट के लिए, नौकरी के लिए, रेड लाइट पर चालान से बचने के लिए, मुकदमा जीतने और हारने के लिए, खाने के लिए, पीने के लिए, कांट्रैक्ट लेने के लिए, यहां तक कि सांस लेने के लिए भी आप ही तो रिश्वत देते हैं. अरे और तो और अपने बच्चों तक को आप ही तो रिश्वत लेना और देना सिखाते हैं. ( वेसे मे भी अछूता नही हु पर कोसिश यही रहती है किसी को रिश्वत न दु )
अब आप ही बताएं कि क्या गुनहगार सिर्फ नेता, अफसर और बाबू हैं? आप एक बार ठान कर तो देखिए कि आज के बाद किसी को रिश्वत नहीं देंगे. फिर देखिए ये भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी कैसे खत्म होते हैं.
एक शर्म की बात की आंकड़े कहते हैं कि कुल 169 देशों में भ्रष्टाचार के मामले में हम 84वें नंबर पर हैं ! यह तस्वीर दिखाती है कि भारत गरीबों का देश है. पर दुनिया के सबसे बड़े अमीर यहीं बसते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो स्विस बैंक के खाते में सबसे ज्यादा पैसे हमारा जमा नहीं होता अब भले हराम का नेता का हो या उधयोगपति का . आंकड़ों के मुताबिक स्विस बैंक में भारतीयों के कुल 65,223 अरब रुपये जमा है. यानी जितना धन हमारा स्विस बैंक में जमा है, वह हमारे जीडीपी का 6 गुना है.
बहुत खोजने के बाद मुझे ये आंकड़े भी मिले जो की ये भी बताते हैं कि भारत को अपने देश के लोगों का पेट भरने और देश चलाने के लिए 3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ता है. यही वजह है कि जहां एक तरफ प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है, वही दूसरी तरफ प्रति भारतीय पर कर्ज भी बढ़ रहा है. अगर स्विस बैंकों में जमा ब्लैक मनी का 30 से 40 फीसदी भी देश में आ गया तो हमें कर्ज के लिए विश्व बैंक के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे.
स्विस बैंक में भारतीयों का जितना ब्लैक मनी जमा है, अगर वह सारा पैसा वापस आ जाए तो देश को बजट में 30 साल तक कोई टैक्स नहीं लगाना पड़ेगा. आम आदमी को इनकम टैक्स नहीं देना होगा और किसी भी चीज पर कस्टम या सेल टैक्स नहीं लगेगा अब आगे ले चलता हु .... मोदी जी की मन की बात तो आप रोज सुनते हो आज मेरे मन की भी बात सुनो .....
वेसे मोदी जी कल्पना व सोच तरीफे काबिल है मगर सरकार सभी गांवों को सड़कों से जोड़ना चाहती है. इसके लिए 40 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है. अगर स्विस बैंक से ब्लैक मनी वापस आ गया तो हर गांव तक चार लेन की सड़क पहुंच जाएगी ! जितना धन स्विस बैंक में भारतीयों का जमा है, उसे उसका आधा भी मिल जाए तो करीब 30 करोड़ नई नौकरियां पैदा की जा सकती है. हर हिंदुस्तानी को 2000 रुपये मुफ्त दिए जा सकते हैं. और यह सिलसिला 30 साल तक जारी रह सकता है. यानी देश से गरीबी पूरी तरह दूर हो सकती है ! अब ज्यादा लिखुंगा तो आप का छोटा दिमाग समझ ही नही पाएगा ! पर ऐसा हो इसके लिए आपका बदलना जरूरी है. वर्ना ये उत्तम विद्रोही के विचार (आपकी नजर मे बकवास ) बेकार चली जाएगी !
मेरी कुछ चंद पंक्ति अगर आपके दिमाग मे उतरे तो जरूर मंथन करे .... नही तो जय श्री राम .... बोल कर हम हम सुधरे न सुधरेंगे नारा बुलंद करे !

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए
सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )
संपादक-----विद्रोही आवाज़

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