Monday, 24 October 2016

मुलायम के सामने उनका अतीत और वर्तमान है। अखिलेश के सामने वर्तमान और भविष्य है

कहावत है कि ——-
‘लीक लीक चींटी चले, लीकहिं चलें कपूत। लीक छाड़ि तीनों चलें शायर, सिंह, सपूत।”
समाजवादी पार्टी किस रास्ते की ओर बढ़ रही है, यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है, क्योंकि इस दल में जारी सत्ता संघर्ष किसी ठोस नतीजे की शक्ल नहीं ले सका है।
विधानसभा चुनाव के पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति रोचक मोड़ लेती जा रही है। एक ओर जहां सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी आंतरिक कलह के कारण बिखराव की ओर बढ़ती नजर आ रही है ! सपा में जो कलह मची है, वह मुख्यत: मुलायम सिंह के परिवार की आंतरिक खींचतान का नतीजा है। इस खींचतान में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व उनके समर्थक एक ओर हैं और उनके पिता मुलायम एवं चाचा शिवपाल सिंह यादव दूसरी ओर। यह खींचतान जिस तरह अधिकारों के संघर्ष में बदलती जा रही है, उससे सपा के कार्यकर्ताओं में बिखराव भी नजर आने लगा है। यह टकराव तब चरम पर पहुंच गया, जब अखिलेश ने मंत्रिमंडल से शिवपाल यादव की छुट्टी कर दी, तो बदले में शिवपाल ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर रामगोपाल यादव को पार्टी से निष्कासित करने का फरमान सुना दिया। उनके निष्कासन की सूचना देने के साथ ही शिवपाल सिंह ने उन पर कई तरह के आरोप भी मढ़े।
सपा के इस संकट को उसके सभी विरोधी दल एक बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं। बीते लगभग एक माह से इस दल में करीब-करीब हर दिन कुछ न कुछ अप्रत्याशित हो रहा है। शिवपाल और रामगोपाल के खिलाफ कार्रवाई से इसकी तो पुष्टि हो गई कि सपा में इस कलह का एक कारण इन दोनों के बीच तनातनी भी है, लेकिन अभी यह सार्वजनिक होना शेष है कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच किन बातों को लेकर मतभेद हैं और वे कितने गंभीर हैं। यह भी अस्पष्ट ही है कि मतभेद बाहरी लोगों की वजह से हैं, जैसा कि अखिलेश बता रहे हैं या फिर अंदर यानी परिवार के लोगों के कारण, जैसा पार्टी के कुछ विधायक रेखांकित कर रहे हैं। जैसे कल तक निगाहें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर से बुलाई गई बैठक की ओर थीं वैसे ही आज मुलायम सिंह की ओर से बुलाई गई बैठक की ओर थी। कहना कठिन है कि इस बैठक में क्या कुछ हुआ है ! नेता जी (मुलायम यादव ) द्वारा अखिलेश यादव को खरी खोटी सुनाने के बाद भी इस जंग का पटाक्षेप होता नही दिख रहा है ! गले मिलने के लिए आगे बढ़े मगर फिर छीना झपटी , धक्का मुक्की से नही लगता ये दिल मे गहराई तक बसी कटुता किसी का बलिदान( पार्टी निष्कासन) लिए बिना दूर होगी ! ऐसे कोई फैसले लिए जाते हैं या नहीं, जिनसे पार्टी को चपेट में लेने वाली परिवार की लड़ाई का पटाक्षेप हो। मगर यह साफ है कि यदि उठापटक का सिलसिला इसी तरह कायम रहा तो सपा को नुकसान होना ओर भाजपा का फायदा तय है। किसी दल में सत्ता और संगठन के लोगों के बीच कलह का यह पहला मामला नहीं। अतीत में कांग्रेस समेत अन्य अनेक सियासी दल ऐसी कलह से दो-चार हो चुके हैं और उनसे यही स्पष्ट हुआ है कि अंतत: संगठन के लोग ही पराजित नजर आए हैं। पता नहीं सपा में क्या होगा, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि आज के दिन इस पार्टी की सबसे बड़ी ताकत मुख्यमंत्री अखिलेश ही हैं। वेसे अखिलेश युवा होने के साथ गंभीरता से लोगो का व पार्टी कार्यकर्ताओ का दिल जीते है ! तमाम समस्याओं, बाधाओं और आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद उन्होंने विनम्र एवं विवादों से दूर रहने वाले नेता की छवि अर्जित की है। उनकी इस छवि की अनदेखी करने की स्थिति में कोई भी नहीं। यह भी उल्लेखनीय है कि अब वैसी राजनीति के लिए स्थान और भी कम हो गया है, जिसका प्रतिनिधित्व मुलायम सिंह और शिवपाल करते चले आ रहे हैं। पिछले एक माह में यह दूसरी बार है जब अखिलेश ने यह साबित करने की कोशिश की है कि सत्ता की कमान उनके हाथ में है और वह पार्टी के हित में कठोर फैसले लेने में भी सक्षम हैं। आम जनता जिस तरह साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं की मुरीद होती है, वैसे ही इसकी भी कि नेता कठोर फैसले ले सकने में सक्षम है या नहीं? भले ही दोनों पक्षों की ओर से जवाबी कार्रवाई के बाद भी सपा टूट की ओर बढ़ती नहीं दिख रही, लेकिन यह भी ठीक नहीं कि कलह सतह पर बनी हुई है। 
मुलायम सिंह यादव ने बेटे अखिलेश को सत्ता सौंपकर परिवार में राजनीतिक विरासत तय कर दी थी, लेकिन इससे बात बनी नहीं। बेटे को सत्ता सौंपकर भी मुलायम सिंह उसकी चाभी अपने ही पास रखना चाहते थे। यहीं से बात बिगड़ गई। स्थिति यह हो गई कि मुलायम यह बताने लगे कि अखिलेश मुख्यमंत्री होकर भी मुख्यमंत्री नहीं हैं और वह मुख्यमंत्री नहीं होते हुए भी मुख्यमंत्री हैं। यह वैसा ही है कि पिता बेटे को नई कार खरीदकर दे, पर कहे कि चलाएंगे हम। कौन बेटा ऐसी कार चाहेगा। अखिलेश भी वही कह रहे हैं। मेरी नजर मे अखिलेश का स्वाभिमान भी सही है !
सपा में हालात कुछ-कुछ 1969 की कांग्रेस जैसे हो गए हैं। पार्टी सिंडीकेट और इंडीकेट में बंट चुकी है, केवल औपचारिक घोषणा बाकी है। 1969 की ही तरह सत्ता इंडीकेट (अखिलेश) के पास है और संगठन सिंडीकेट (मुलायम) के हाथ में। अब सवाल इतना ही है कि क्या अखिलेश के पास इंदिरा जैसा साहस और दूरदृष्टि है? यह अखिलेश के राजनीतिक कौशल और जोखिम लेने की क्षमता की अग्निपरीक्षा है। मुलायम हारेंगे तो बेटे से और अगर अखिलेश हारे तो राजनीतिक विरासत के लिए उन्हें जंग लड़नी पड़ेगी। मुलायम सिंह कुछ भी बोल सकते हैं। उन्हें अब किसी के सामने कुछ साबित नहीं करना है। अखिलेश को बोलने से पहले शब्दों को तौलना पड़ेगा। मगर अखिलेश युवा है उनकी सोच गंभीर है झुझारू है जल्दी घुटने नही टेकने वाले केकई की रोल निभा रही माता पटखनी जरूर खायेगी ! अमरसिंग हो या चाचा या सोतेली माँ उनका मिशन पूरा नही होगा ओर अगर हुआ तो नेता जी की पार्टी का नामोनिशान मिट जाएगा ! 
लेखक- उत्तम जैन (विद्रोही )
संपादक- विद्रोही आवाज़ ,सूरत

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