जैन परंपरा में पर्युषण पर्व आत्म विशुद्धि योग के सबसे बड़े साधन हैं | पहले और आज की पर्युषण पर्व की आराधना,साधन और साधना में बहुत अंतर आ गया है | पहले संयुक्त परिवारों में बड़े बुजुर्गों के सान्निध्य में पर्युषण के दिन कब आते थे और धर्माराधना करते हुए कब दिन निकल जाते थे पता ही नहीं चलता था | परन्तु आज इस कंप्यूटर युग में जहां Whatsapp, google, youtube, twitter आदि ने सभी को इतना उलझा रखा है कि बड़े शहरों में एकल परिवारों (nuclear families) में युवतियां पर्युषण के दिनों में धर्म लाभ तो लेना चाहती हैं, परन्तु छोटी-बड़ी समस्याएं उनके सामने अक्सर उपस्थित रहतीं हैं जिनके कारन कभी कभी जैन युवती चाहकर भी धर्म साधना नहीं कर पाती है | इन्हीं सब परिस्थितियों में सामंजस्य बिठाते हुए किस प्रकार पर्युषण के दिनों में धर्माराधना की जा सकती है, आइये कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर विचार करते हैं –कडूर और बिरूर में अहिंसा यात्रा का भव्य स्वागत कडूर, कर्नाटक- सद्भावना नैतिकता और नशामुक्ति इन तीनों आयामों से जन-जीवन का कल्याण कर...
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