आठ दिवसीय शिविर में ध्यान-साधना की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे शिविरार्थी
माधावरम, चेन्नई (तमिलनाडु) 21.08.2018 : ‘ठाणं’ आगमाधारित पावन प्रवचन में प्रेयस प्रत्यया के दो भेद माया और लोभ को किया वर्णित जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा के प्रणेता शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में मंगलवार से आठ दिवसीय प्रेक्षाध्यान शिविर का शुभारम्भ हुआ। शिविर के प्रथम दिन आचार्यश्री की मंगलवाणी का श्रवण करने को उपस्थित शिविरार्थियों को आचार्यश्री ने जहां ‘ठाणं’ आगमाधारित अपनी मंगलवाणी से पावन पाथेय प्रदान किया तो वहीं शिविरार्थियों को अपने मंगल आशीष के साथ शिविर के लिए उपसंपदाएं स्वीकार करवाईं और लोगों को इस शिविर का पूर्ण लाभ उठा अपने जीवन में सार्थक बदलाव लाने की प्रेरणा भी प्रदान की। शिविरार्थी इस शिविर में आठ दिनों तक ध्यान के विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से अपने जीवन को बेहतर बनाने का अभ्यास करेंगे।
मंगलवार को ‘महाश्रमण समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी मंगलवाणी से ‘ठाणं’ आगम के दूसरे स्थान में वर्णित तेजस प्रत्यया मूर्छा के दो प्रकार-माया और लोभ का वर्णन करते हुए कहा कि राग के कारण आदमी माया भी कर लेता है और लोभ भी कर लेता है। माया मित्रों का नाश करने वाली होती है। माया के करने वाले मित्र भी धीरे-धीरे उससे दूर हो जाते हैं। जिस आदमी के जीवन में माया हो उसके जीवन में सत्य रूपी सूय का अस्त हो जाता है। माया के कारण आदमी झूठ बोलने लग जाता है और फिर उसका विश्वास भी समाप्त हो जाता है। माया के कारण आदमी दुर्गति का वरण कर लेता है। आदमी चाहे कितनी भी माया कर ले या लोभ कर ले आदमी को भाग्य से अधिक और समय से पहले कुछ नहीं मिलने वाला। इसलिए आदमी को माया से बचने का प्रयास करना चाहिए। लोभी आदमी लोभ के वशीभूत होकर पाप कर्म भी कर लेता है। इसलिए आदमी को माया और लोभ से बचने का प्रयास करना चाहिए। माया और लोभ से बचने वाला अपने जीवन का कल्याण कर सकता है।
आगमाधारित मंगल प्रवचन के पश्चात् आचार्यश्री ने ‘मुनि मुनिपत का व्याख्यान’ क्रम को आगे बढ़ाया। इसके उपरान्त आचार्यश्री ने आज से ही प्रारम्भ हो रहे प्रेक्षाध्यान शिविर में आए शिविरार्थियों पावन पाथेय प्रदान करते हुए उन्हें समय से पूर्व उपस्थित होने के लिए भी अभिप्रेरित किया तथा आचार्यश्री ने उन्हें शिविर के संदर्भ में उपसंपदाएं भी प्रदान की। अनेकानेक लोगों ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी-अपनी तपस्याओं का प्रत्याख्यान भी किया।
संप्रसारक
सूचना एवं प्रसारण विभाग
जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा
मंगलवार को ‘महाश्रमण समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी मंगलवाणी से ‘ठाणं’ आगम के दूसरे स्थान में वर्णित तेजस प्रत्यया मूर्छा के दो प्रकार-माया और लोभ का वर्णन करते हुए कहा कि राग के कारण आदमी माया भी कर लेता है और लोभ भी कर लेता है। माया मित्रों का नाश करने वाली होती है। माया के करने वाले मित्र भी धीरे-धीरे उससे दूर हो जाते हैं। जिस आदमी के जीवन में माया हो उसके जीवन में सत्य रूपी सूय का अस्त हो जाता है। माया के कारण आदमी झूठ बोलने लग जाता है और फिर उसका विश्वास भी समाप्त हो जाता है। माया के कारण आदमी दुर्गति का वरण कर लेता है। आदमी चाहे कितनी भी माया कर ले या लोभ कर ले आदमी को भाग्य से अधिक और समय से पहले कुछ नहीं मिलने वाला। इसलिए आदमी को माया से बचने का प्रयास करना चाहिए। लोभी आदमी लोभ के वशीभूत होकर पाप कर्म भी कर लेता है। इसलिए आदमी को माया और लोभ से बचने का प्रयास करना चाहिए। माया और लोभ से बचने वाला अपने जीवन का कल्याण कर सकता है।
आगमाधारित मंगल प्रवचन के पश्चात् आचार्यश्री ने ‘मुनि मुनिपत का व्याख्यान’ क्रम को आगे बढ़ाया। इसके उपरान्त आचार्यश्री ने आज से ही प्रारम्भ हो रहे प्रेक्षाध्यान शिविर में आए शिविरार्थियों पावन पाथेय प्रदान करते हुए उन्हें समय से पूर्व उपस्थित होने के लिए भी अभिप्रेरित किया तथा आचार्यश्री ने उन्हें शिविर के संदर्भ में उपसंपदाएं भी प्रदान की। अनेकानेक लोगों ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी-अपनी तपस्याओं का प्रत्याख्यान भी किया।
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