Tuesday, 3 October 2017

चाल चेहरे और चित्त से व्यक्तित्व का पता चलता है

चाल, चेहरे और चित्त से व्यक्तित्व का पता चलता है
*आचार्य श्री विजयराज जी का प्रवचन*
राजनांदगांव ,एक अक्टूबर। विश्व वल्लभ आचार्य श्री विजयराज जी ने कहा कि मन के 18 दोषों में 15 वां दोष है आतुरता। यह आतुरता मति और गति में भी होती है। गति का मतलब है चाल। इससे मानव के व्यक्तित्व का आंकलन किया जाता है। चाल से चरित्र का गहरा संबंध है। अगर किसी की गज गति है तो वह गंभीर प्रकृति का होता है और जिसकी घोड़ा गति है, वह चंचल प्रकृति का होता है। चंचल गति वालों में गंभीरता नहीं होती। चाल से, चेहरे से और चित्र से व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता चलता है। जिनकी गति प्रशांत होती है, उनकी चाल भी प्रशांत होती है।
उदयाचल की वियज वाटिका में आज आचार्य श्री ने अपने नियमित प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर बहुत बड़े वैज्ञानिक थे। वे आध्यात्म विज्ञान के बहुत बड़े वैज्ञानिक तो थे ही, जीवन विज्ञान के भी बहुत बड़े - वैज्ञानिक थे। उन्होंने मुनियों को चाल के बारे में बताया कि चाल सुधरी तो चरित्र भी सुधर जाता है। दूरिया समिति चलने के तौर - तरिके को बताता है। चाल को देखकर की समझ लिया जाता है कि व्यक्ति किस प्रकृति का है। सांसारी चलते हैं तो आंखे घुमाते हुए चलते हैं। वे चल तो रहे हैं लेकिन चलते हुए भी मति स्थिर नहीं है। चाल से चरित्र का बोध होता है। चाल की गति की आतुरता भी व्यक्ति की अभिव्यक्ति दर्शाती है। सधी हुई चाल व्यक्ति की दबंगई को प्रदर्शित करती है। रूकना और चलना, रूकना भी चलने को एक गति प्रदान करता है। अगर हम साढ़े तीन हाथ जमीन देखकर होश पूर्वक चलते हैं तो हम कर्मों का निग्रह करते हैं। हाथी की मस्ती से चलने को गज गति कहते हैं। यह भी एक बड़ी साधना है।
आचार्य श्री ने कहा कि मन जैसा मित्र नहीं और मन जैसा शत्रु भी नहीं है। मन के दोषों को समझकर उन्हें दूर करने का प्रयास करें। जब भी हमारे मन में आतुरता आती है तो मन अशांत  हो जाता है। सत्संग के द्वारा ही हमारी मति - सुमति बनती है और हमारी चाल में सुधार आता है। सत्संग के साधकों के दर्शन मात्र से ही उद्धार हो जाता है। मति और गति जब कभी भी सुधरेगी, वह सत्संग से ही सुधरेगी। सत्संग करते हैं तो सत्य का, धर्म का श्रवण होता है। गति हमारी सुधरती है।

बचपन विवश हैं, बुढ़ापा लाचार है। जवानी में धर्म - ध्यान नहीं किया तो पूरी जिन्दगी बेकार है।"
आचार्य श्री ने कहा कि गुस्सा जब आता है, तो हम क्या बोलते हैं, इसका एहसास नहीं होता। गरमाई अपने आपको तोड़ती है और नरमाई दूसरों के अहं को तोड़ती हैं। सत्संग से मति - गति की अवस्था बदलती है। गति का योग बहुत बड़ा योग है। मन की गति सुधर गई तो समझो आनंद ही आनंद है।

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