Wednesday, 6 September 2017

नज़रिया: भारतीय समाज को गौरी लंकेश जैसी हत्याओं की आदत पड़ती जा रही है: अपूर्वानंद

गौरी लंकेश की हत्या पर शोक उनके जीवन और काम का सम्मान नहीं होगा. अफ़सोस अगर किया जाना चाहिए तो इसका कि एक भारतीय भाषा कल के मुकाबले आज अधिक गरीब हो गई है क्योंकि वह एक साहसी आवाज़ को सुरक्षित न रख पाई कि वह उससे जितना समृद्ध हो सकती थी, उससे बहुत बहुत कम में ही उसे अब संतोष करना पड़ेगा.
गौरी लंकेश से आख़िर किसे ख़तरा था?
कन्नड़ भाषा की 'लंकेश पत्रिका' की सम्पादक और लेखक गौरी लंकेश की मंगलवार रात उनके घर पर ही गोली मार कर हत्या कर दी गई.
किसी ने इस हत्या के बारे में लिखा, सनसनीख़ेज़ हत्या. सनसनी अब ऐसी हत्याओं से नहीं होती, क्योंकि हम ऐसी हत्याओं का इंतज़ार कर रहे होते हैं.
गौरी लंकेश का हर एक दिन ही सनसनी था. एक ख़बर. मौत जो कल क़त्ल की शक्ल में आई एक लंबी प्रतीक्षा थी.

आश्चर्य है कि वो अब तक बची रहींगौरी लंकेश की बिरादरी के ही एक सदस्य को उनके एक परिचित ने मुस्कराते हुए आत्मीयता से कहा, "अरे आपसे यों भेंट हुई! हमने तो आपका शोक सन्देश लिख रखा है."

गौरी लंकेश का अब तक बचे रहना उस भाषा में जिसके पारखी कलबुर्गी को मार डाला गया हो, एक आश्चर्य था.
भारतीय भाषा में हर उस किसी का जीवित बचा रहना जो नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे और एमएम कलबुर्गी की जमात का है, हैरानी की बात है. या, उसका हरेक दिन खुद से यह पूछते जाना है कि क्या मेरी बातों का कोई असर नहीं?
इसीलिए गौरी लंकेश की हत्या नितांत प्रत्याशित है.
'देश की हर गली में एक गोडसे घूम रहा है'
पुलिस का कहना है कि वह हत्यारों का पता नहीं कर पाई है. किसी ने उन्हें देखा नहीं. गौरी लंकेश के घर में घुसकर उनपर सात गोलियाँ दागकर वे चलते बने. अँधेरे में कहीं छिप गए.

'कर्नाटक दूसरा गुजरात बनने की राह परहत्यारे हमारे बीच हैं. जैसे गोविन्द पानसरे के, नरेंद्र दाभोलकर के, एमएम कलबुर्गी के. हम हत्यारों को तुरंत पकड़ने और सख्त सज़ा की मांग कर रहे हैं.

लेकिन जब भाषाएँ हत्या की संस्कृति का उत्सव मनाने लगें, जब जन संहारों के अध्यक्षों को समाज अपना अभिभावक चुन ले तो गौरी का मारा जाना सिर्फ़ वक्त की बात है.
जिसने गौरी को मारा, दरअसल उसने सिर्फ एक संस्कृति की ओर से गोली चलाई है.
कैसे मिली औरतों को जंग लड़ने की इजाज़त?
गौरी लंकेश कन्नड़ में लिख रही थीं. अपने लोगों को सावधान कर रही थीं कि कर्नाटक दूसरा गुजरात बनने की राह पर है.
यह चेतावनी वे नहीं दे सकते थे जो कर्नाटक की राजधानी को सूचना प्रौद्योगिकी की राजधानी बना रहे हैं. उनकी भाषा कन्नड़ नहीं है हालांकि वे सकल राष्ट्रीय उत्पाद में बढ़ोत्तरी कर रहे हैं.
गौरी इस प्रगति की यात्रा में विचलन पैदा कर रही थीं. वे राष्ट्र की प्रगति के लिए जो अनिवार्य है, वह नहीं कर रही थीं. वे गैर ज़रूरी काम कर रही थीं. समाज में नकारात्मकता फैला रही थीं. वे समाज को कह रही थीं कि जिसे वह स्वास्थ्य समझ रहा है, वह दरअसल एक सूजन का शिकार शरीर है.
गौरी चेतावनी दे रही थीं कि भारतीय समाज को नाइंसाफ़ियों और हत्याओं की आदत पड़ती जा रही है और उसकी आत्मा बीमार हो गई है.

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