पर्व का साधारण अर्थ है त्यौहार ।
पर्व दो प्रकार का होता है -
1, लौकिकपर्व और 2, लोकोत्तर पर्व ।
प्रथम लौकिक पर्व मुख्य रूप से केवल शारीरिक आनंद प्रमोद मनोरंजन तक ही सीमित होता है यह पर्व मौज मस्ती और कर्म बंधन का कारक होता है । ठीक इसके विपरीत होता है अलौकिक पर्व ।
इस पर्व में मनोरंजन आमोद प्रमोद आदि नही होता है , होता है तो केवल आत्मोत्थान , आत्मचिंतन , आत्ममार्ग के प्रशस्त कर्म का प्ररूपण । और इस अलौकिक पर्व का नाम है पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण । पर्युषण शब्द के कई अर्थ होते हैं । यहां पर पर्युषण का अर्थ है शुद्धिकरण अर्थात् हमने अतीत में और उससे भी पूर्व भव भ्रमण में जो कुछ भी पाप कर्म किए हैं , या अनैतिक कार्य किए हैं तो उन सब से निवृत्त होना , स्वच्छ होना पर्यूषण है । पर्युषण का अर्थ है - मिथ्यात्व से निवृत्त होकर सम्यक्त्व की ओर प्रस्थान करना
पर्युषण का अर्थ है - ज्ञान दर्शन चारित्र तप रूप मोक्ष मार्ग पर चलना । यह पर्व मन की वृत्ति को शांत करके आत्मा की प्रवृति अर्थात ज्ञान दर्शन चरित्र में संलग्न करता है यह पर्यूषण पर्व कुल आठ दिवस का होता है यथा
1, अहिंसा दिवस
2, सत्य दिवस
3, मैत्री दिवस
4, प्रमोद भाव दिवस
5,सेवा व्रत दिवस
6, ब्रह्मचर्य दिवस
7, समभाव दिवस और
8, क्षमापना दिवस
इस आठ दिवस में गुरु भगवंत जनसमूह को अंतगढ़ सूत्र, कल्पसूत्र आदि आगम का श्रवण कराते हैं और अंतिम दिन अर्थात संवत्सरी दिवस के दिन गौरवशाली प्राचीन परंपरा अर्थात भगवान महावीर स्वामी से लेकर वर्तमान तक के मुनि वृन्द की पाठ परम्परा का विश्लेषण करते हैं ।
पर्यूषण पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिवस है संवत्सरी यह दिवस क्षमा का होता है क्षमा का महत्व जैन धर्म में सबसे अधिक है। शास्त्रीय भाषा में कहा है "क्षमा वीरस्य भूषणम्" अर्थात क्षमा वीर पुरुष, धीर पुरुष का आभूषण है , श्रृंगार है । क्षमा साधारण व्यक्ति कर नहीं सकता है। क्षमा करने से पहले व्यक्ति को असाधारण बनना पड़ता है ।महान बनना पड़ता है । अपने मन की प्रतिशोधात्मक भावना को संयम से शांत करना निश्चित ही कठिन है , पर असंभव नही । हमें भी अपने मन की वृत्ति को अपने अनुकूल (वश) में करना चाहिए ।
जो व्यक्ति क्षमा रुपी शस्त्र को अपना आभूषण बनाते हैं उनका कोई भी शत्रु होता ही नहीं है वे सब स्वतः ही शांत हो जाते हैं । जिसके पास क्षमा का शस्त्र है , विजयश्री सदा उसी का वरण करती है। क्षमा में वह शक्ति है जिसके द्वारा मोक्ष मार्ग का भव्य द्वार खोला जा सकता है ।आगम ग्रंथ एवं अन्य ग्रंथ में भी क्षमा का वर्णन बहुत ही सूक्ष्म रुप से अन्वेषणकर अपनाकर किया गया है ।क्षमा विद्वान, तपस्वी, मनो विजेता, जितेंद्रिय ,सात्विक पुरुष आदि के पास ही होती है । आज संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं चाहे वह भगवान महावीर स्वामी हो , गौतमबुद्ध हो , श्री कृष्ण हो, श्री राम हो , या वर्तमान में आचार्य रघुनाथ जी म सा हो ,
मरुधर केसरी जी म सा हो या महात्मा गांधी ये सब क्षमा के कारण ही प्रसिद्ध हुए है और सामाजिक आध्यत्मिक जगत का विकास किया है । क्षमा गुण को जीवन में धारण करने से संयम धीरता पवित्रता प्रमाणिकता मैत्री सत्यता दया भावना शरणार्थी की रक्षा आदि आदि सद्गुणों का जीवन में प्रवेश होता है । क्षमा गुण को आज के वैज्ञानिकों ने भी श्रेष्ठ सिद्ध किया है। जैन धर्म बौद्ध धर्म वैदिक धर्म सिक्ख धर्म शैव धर्म आदि आदि धर्म प्रवक्ताओं ने क्षमा को सबसे अधिक महत्व दिया है , उसको उच्च स्थान प्रदान किया है । क्षमा निर्बल मनुष्य का गुण है और सबल पुरुषों का आभूषण है । क्षमा हमारे जन्म जन्मांतर कर्मों को क्षय करने की शक्ति रखता है । आवश्यकता है बस क्षमा को अपनाकर सामाजिक राजनीतिक धार्मिक संगठनों को शक्ति प्रदान करने की । क्षमा से राज्य संबंधी , देश संबंधी , राष्ट्र संबंधी समस्याओं से निवृत्ति हो सकती है ।
मैं अपने जीवन में क्षमा रूप गुण को धारण करते हुए आप सभी से इस जन्म में या पूर्व जन्म में आपका मन व्यतित किया हो , किसी भी प्रकार की वेदना दी हो या मेरे द्वारा आपको असाता हुई हो तो संवत्सरी क्षमापना के पावन अवसर पर अपने अंतकरण को निर्मल करते हुए स्वच्छ करते हुए आपसे क्षमा मांगता हूं और आप भी मुझे क्षमा कर अपने कर्मो की निर्जरा करे ऐसी निर्मल भावनाओं के साथ मिच्छामी दुक्कडं ।
लेखक - वैरागी वरुण जैन "वैभव"
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