Saturday, 29 April 2017

तेरापंथ भवन सिटीलाइट में वर्षीतप पारणोत्सव में 38 तपस्वियों ने किए अपनी सुदीर्घ तपस्या के पारणे

साध्वीश्री मधुबालाजी एवं साध्वीश्री सोमलताजी के सानिध्य में गरिमापूर्ण कार्यक्रम
सूरत महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वीश्री मधुबालाजी एवं साध्वीश्री सोमलताजी के सानिध्य में सूरत के सिटीलाइट स्थित तेरापंथ भवन में वर्षीतप पारणोत्सव का आयोजन हुआ। श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, सूरत द्वारा आयोजित इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम में सूरत एवं दूर सुदूर से समागत 38 भाई – बहनों ने साध्वीश्री को इक्षुरस का सुपात्र दान देकर अपनी सुदीर्घ तपस्या का समापन किया। इस अवसर पर अपने उद्बोधन में साध्वीश्री मधुबालाजी ने फरमाया – जैन परम्परा में अक्षय तृतीया और महावीर जयंती ये दोनों पर्व बड़े उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। महावीर जयंती अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के साथ जुड़ा हुआ पर्व है, वहीं अक्षय तृतीया प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की साधना के साथ जुड़ा हुआ पर्व है। भगवान ऋषभ सृष्टि के प्रथम राजर्षि, प्रथम महर्षि और प्रथम तीर्थंकर थे। उन्होंने सतत् 400 दिन की निराहार – निर्जल तपस्या की। इस कलयुग में तो उनके जैसी तपस्या संभव नहीं है, लेकिन श्रद्धालु साधक सतत 13 महीने तक एकान्तर उपवास की तपस्या कर भगवान ऋषभदेव के प्रति अपना अर्ध्य चढ़ाते हैं। साध्वीश्री ने कहा – जो वर्षीतप की कठोर साधना नहीं कर सकते वे भी निरंतर एक वर्ष तक कषाय विजय और वाणी संयम की साधना का प्रयास अवश्य करें। साध्वीश्री सोमलताजी ने फरमाया – भगवान ऋषभ ऐसे तीर्थंकर थे जिन्होंने आध्यात्मिक और सामाजिक उभय प्रकार का मार्गदर्शन दिया। वे कर्मयुग के प्रणेता थे तो धर्मयुग के भी प्रणेता थे। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ‘नाथ’ शब्द अनेक महापुरुषों के साथ जुड़ा हुआ है लेकिन *’आदिनाथ’* शब्द तो केवल भगवान ऋषभदेव के साथ ही अनुबंधित है। अक्षय तृतीया का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रहा है। 
 उत्तराखंड में बद्रीनाथ के कपाट इसी दिन खोले जाते हैं।
भगवान परशुराम का जन्मदिन और शिवजी की जटा से गंगामैया का अवतरण भी इसी दिन के साथ जुड़ा हुआ है। वर्षीतप की तपस्या बहुत कठिन तपस्या है। यह तपस्या अनासक्त चेतना के विकास के बिना संभव नहीं लगती। इस साधना के माध्यम से जीवन को नया मोड़ मिलता है। साध्वीश्री ने अपने भ्राता मुनिश्री कमलकुमारजी द्वारा सतत् 38 वर्ष से की जा रही वर्षीतप की तपस्या का उल्लेख किया तो सभी भाव – विभोर हो गए। साध्वीश्री ने वर्षीतप साधना करने वालों को आजीवन जमीकंद त्याग की एवं सभी श्रावकों को रसनेन्द्रिय के संयम द्वारा वाणी के वर्षीतप की प्रेरणा दी। साध्वीवृन्द द्वारा अक्षय तृतीया पर विशेष समूहगान की एवं कन्यामण्डल द्वारा भगवान ऋषभ के जीवन – कवन पर आधारित रोचक परिसंवाद की प्रस्तुति हुई। तेरापंथी महासभा गुजरात प्रभारी श्री लक्ष्मीलालजी बाफणा, तेरापंथी सभा सूरत के अध्यक्ष श्री विनोदजी कोचर , उपाध्यक्ष श्री दिलीपजी गोठी, तेरापंथी सभा उधना के उपाध्यक्ष श्री अर्जुनजी मेड़तवाल, महिला मंडल अध्यक्षा श्रीमती पूनम गुजरानी, तेयुप सूरत अध्यक्ष श्री कमलेशजी गादिया, अणुव्रत समिति अध्यक्ष श्री कांतिलालजी सिसोदिया, भायंदर मुम्बई सभाध्यक्ष श्री जगतजी संचेती, तेरापंथ महिला मंडल मुंबई अध्यक्षा श्रीमती भारती जैन, मधुर संगायक श्री निलेशजी बाफणा ने प्रासंगिक अभिव्यक्ति दी। संचालन तेरापंथी सभा-सूरत के मंत्री श्री नानालालजी राठौड़ ने किया

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