Monday, 30 January 2017

सूरत के पुस्तक मेले में गुजराती पुस्तको की भरमार जबकि हिंदी पुस्तके नदारद .. गणपत भंसाली

सूरत के पुस्तक मेले में गुजराती पुस्तकों की भरमार, जबकि हिन्दी पुस्तकें नदारद
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सूरती सचमूच में गजब के पुस्तक प्रेमी हैं. सूरत के वनिता विश्राम के विशालतम ग्राउन्ड में सूरत महानगरपालिका द्वारा आयोजित स्वामी विवेकानंद नेशनल बुक फेयर में प्रतिदिन हजारों की तादाद में उमड़ते पुस्तक प्रेमी इस के जीते-जागते प्रमाण हैं. सूरत महानगर पालिका द्वारा आयोजित यह 16 वां इंटरनेशनल बुक फेयर हैं. संयोगवश में पहले से लेकर इस 16 वें यानि  तमाम के तमाम बुक फेयरो में सम्मिलित होता रहा हूँ. अतीत से वर्तमान तक मैंने देखा हे कि प्रत्येक पुस्तक मेले में पुस्तक प्रेमियों का हुजूम सा उमड़ पड़ता हैं. हर बुक फेयर में गुजराती साहित्य का विपुल भण्डार समाया रहता हैं. अधिकतया बिक्री भी गुजराती साहित्य की नजर आती हैं. रविवार 29 जनवरी शाम को में भी इस पुस्तक मैले में सहभागी बना. इस बार के पुस्तक मेले में 2 बिन्दु नए उभर कर नजर आए. एक प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रेरित डिजिटल क्रांति के तहत कैशलेस मनी का ट्रांजेक्शन, यही वजह हैं कि अधिकांश स्टॉलों पर PAYTM जैसी डिजिटल मनी स्वीकारने की सूचना लगी नजर आई, और दूसरा ऑन लाइन पुस्तको को प्राप्त करने की सूचना. हर बार की तुलना इस बार अधिकांश स्टॉलों पर पुस्तकों की बिक्री डिस्काउंट के साथ देखी गई. हाँ पुस्तक मेले में अंग्रेजी पुस्तकें तो काफी स्टॉलों पर बिकती नजर आई, लेकिन हिन्दी भाषा की पुस्तकों की स्थिति तो आटे में नमक या यूँ कहें कि ऊँट के मुंह में जीरे के समान ही दिखी. लेकिन इस कमी के पीछे हिंदी भाषियों की स्वंय की उदासीनता ही मुख्य वजह हैं. दरअसल हिंदी भाषी इस बुक फेयर में सम्मिलित तो होते हैं, लेकिन वे हिन्दी पुस्तकें खरीदना तो दूर उसकी इन्क्वारी तक नही करते, मुझे आश्चर्य हो रहा हैं कि सूरत में लाखों की संख्या में हिन्दी भाषी होने के वावजूद इस पुस्तक मेले में उनकी या तो उपस्थिति नगण्य हैं. या फिर हिंदी पुस्तकों के प्रति उनकी बेरुखी बनी रहती हैं, सूरत वो महानगर हैं जहां हजीरा ओद्योगिक विस्तार में स्थित रिलायंस, एस्सार. एन टी पी सी, कृभको, ए बी सी सीमेंट आदि कॉरपरेट जगत की पचासों कम्पनियों में हजारों-हजारों हिंदी भाषी कर्मचारी सेवारत हैं, यहां तक शहर की सेकड़ों की तादाद में विभिन्न बैंकों. विभिन्न सरकारी प्रतिष्ठानों, नाना प्रकार के इंसिट्यूटों. स्कूलों, कॉलेजों में अध्यापकों, रेलवे, आदि संस्थानों. विभागों के पदों पर अधिकांश रूप से हिंदी भाषी ही नजर आते हैं, अगर हम नजर डालें रिंग रोड के विशालतम 150 के करीब विभिन्न टेक्सटाइल्स मार्केटों की और! तो वहां लगभग 50 हजार के लगभग प्रतिष्ठान हे, इनमे से 90 प्रतिशत व्यवसाहिक इकाइयों के संचालक-प्रबन्धक (राजस्थानी-पंजाबी-हरियाणवी) यानि हिन्दी भाषी हे' इन कपड़ा व्यापारियों के यहां स्टॉफ आदि की गणना करें तो मुख्य भूमिका निभाने वाले प्रबंधको व कर्मचारियों की संख्यां लाखों में हैं. लेकिन पुस्तक मेले में इस तबके की उपस्थिति वही ऊंट के मुंह में जीरे समान भी नही हैं, मुझे स्मृत हे वर्ष 2001 में इसी वनिता विश्राम में आयोजित पुस्तक मेले के वे दृश्य, जहां अगिनित दिल्ली के प्रमुख पुस्तक प्रकाशक समूहों के स्टॉल स्थापित हुए थे. उनमे देहाती पुस्तक भण्डार, राजा पुस्तक. मनोज पॉकेट बुक्स, मनोज पब्लिकेशन्स, दिल्ली प्रेस समूह. हिन्द पॉकेट बुक्स, पुस्तक महल, आदि अनेक पुस्तक प्रकाशको के स्टॉल लगे थे, लेकिन पुस्तक मेले के आखरी दिन मेंने अधिकांश हिंदी जगत के इन पुस्तक प्रकाशकों आदि से मुलाकात कर जानना चाहा कि बुक फेयर में प्रतिसाद कैसा रहा ? तो अधिकांश का प्रत्युत्तर था कि हम तो इस पुस्तक मेले में आकर अपने आप को कौस रहे हैं कि आखिर हम आए क्यूँ ? हालाँकि मैंने नही भी पूछा होता तो भी उन के चेहरे पर छाई उदासीनता साफ-साफ संकेत दे ही रही थी कि इस पुस्तक मेले में उनका यहां भाग लेना निरर्थक ही रहा होगा ? उसके पश्चात प्रत्येक पुस्तक मेलों से हिंदी के बुक स्टॉलों की संख्या निरन्तर घटती रही, और आज 16 वें पुस्तक मेले तक पहुंचते-पहुंचते हिंदी भाषा में प्रकाशित पुस्तकों का इक्का-दुक्का स्टॉल भी नजर नही आया, हाँ गुजराती साहित्य के साथ-साथ हिन्दी की कुछ पुस्तकें वे भी शिव खेड़ा, डेल कारनगी, उज्ज्वल पाटनी, चेतन भगत आदि चर्चित मोटिवेटरों या विदेशी लेखकों की नजर आई, में विगत वर्षों में दुबई से सटे शरजहां के इंटरनेशनल बुक फेयरो के दो अलग-अलग आयोजनों का साक्षी रहा हूँ, वहां भी इक्के-दुक्के स्टॉलों पर हिंदी की कुछ पुस्तकें मिल ही जाती थी, जहां तक बुक फेयर में पुस्तकों की मांग का प्रश्न हे तो गुजराती भाषा में भी हिंदी या अंग्रेजी भाषा में रूपांतरित की हुई कुछ चर्चित लेखकों की पुस्तकें बिकती नजर आई, यह उल्लेखनीय हैं कि गुजराती भाषा में जितेंद्र अढिया जैसे मोटिवेटरों की पुस्तकें युवाओं में विशेष पसन्द की जा रही हैं, तथा चेतन भगत की गुजराती भाषा में रूपांतरित बुक एक इंडियन गर्ल  की अग्रिम बुकिंग हो रही थी, जहां तक इस बुक फेयर में पुस्तकों की बिक्री का प्रश्न हे तो बड़ी उम्र के महिला-पुरुष धर्म, अध्यात्म तथा सन्त-महात्माओं, तीर्थ तथा सामाजिक विषयों की पुस्तकें पसन्द करते हैं, युवा पीढ़ी का फ़ोकस कॅरियर, मोटिवेशनल आदि की पुस्तकों पर रहता हैं, मेले में बच्चों से जुडी नर्सरी आदि की पुस्तकों व वीडियों सी डी की भरमार हैं, स्कूली बच्चों के उपयोगी कुर्सी, टेबल तथा स्लेट, पेन्सिल, चार्ट, ब्लैक बोर्ड आदि सामग्री के स्टॉल भी सजे हुए नजर आते हैं, इस फेयर में इस्लामिक साहित्य, बाईबिल, स्वामी विवेकानंद केंद्र, दादा भगवान, इस्कॉन, ओशो रजनीश,आर्ट ऑफ़ लिविंग,प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी आश्रम जैसे अनेक धर्म-अध्यात्म से जुड़े संगठनो के स्टॉल दिखाई देते हैं, इस बार इस्लामिक साहित्य से जुड़ा इक्का-दुक्का स्टॉल ही नजर आया जबकि अगले मेलों में 3-4 स्टॉल दिखाई देते थे, इस बार आशाराम बापू के आश्रम से जुड़ा स्टॉल नजर नही आया जबकि अतीत में कॉर्नर का बड़ा स्टॉल लगता था, बुक फेयर में राष्ट्रीय स्वंय संघ तथा भारतीय जनता पार्टी ने भी अपना स्टॉल लगाया हैं, विशेष यह भी हैं कि में जब इन दोनों स्टॉलों पर पहुंचा तो वहां दोनों जगह कुछ मुस्लिम बन्धु भी जानकारी प्राप्त करते नजर आए, हालाँकि पुस्तक मेला धीरे धीरे अपना वास्तविक स्वरूप खोता जा रहा हैं, मेले में भीड़ जुटाने हेतु इसे अब तीन विभागों में बाँट दिया हैं` 16 साल पूर्व `विद्या` शीर्षक के रूप में प्रारम्भ हुए इस मेले में 14 वर्ष पहले `सुमन` के नाम से बागवानी विभाग जोड़ दिया गया था, उसके बाद 6 साल पूर्व `शिल्पग्राम` इस मेले का हिस्सा बन गया, हो सकता हे आगामी वर्षों में इस बुक फेयर में खाद्य सामग्री, ज्वेलरी, गारमेंट, टूरिज्म आदि विभाग भी जुड़ जाए, हालाँकि पिछले कई सालों से रेडीमेड, सौन्दर्य प्रसाधन, शर्बत, आचार, इलोक्ट्रोनिक्स वस्तुए, इमिटेशन ज्वेलरी के भी कुछ स्टॉल तो नजर आते ही हैं, इस बार खादी बिक्री के कुछ स्टॉल दिखे।
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गणपत भंसाली

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