Monday, 30 January 2017

कला के आड़ में भावनात्मक खिलवाड़ क्या जायज है ?


अभी ताजा ताजा भंसाली साहब के साथ जो घटना घटी वह वाकई नींदनीय है |लेकिन ऐसी घटनाओं के पीछे लोगों के आंतरिक पीड़ा उनका खुद को निःसहाय महसूस करना ही ऐसी घटनाओं का प्रणेता है , कल तक लोग जिन्हें देवी मानते थे आज कोई कला के नाम पर उनके देवी के साथ मजाक करे किस तरह बर्दाश्त करें वो …मगर एक कटु सत्य है जहा हिन्दूस्तान मे धर्म व आस्था के लिए मर मिटने वाले व 36 करोड़ देवी देवता मे विश्वाश रखने वाली संस्कृति अगर आज वो विरोध न करें तो कब ?आज बात पद्मावती की है कल सीता की होगी द्रौपदी की होगी आज खिलजी तो कल रावण फिर दुर्योधन , और लोग कला के नाम पे सब कुछ सहते जाएं क्यों ?एक पल के लिए मान भी लूँ की कला में सब जायज है तो फिर कुछ घटनाएं कुछ विचार ऐसा सोचने से रोकती है|हम लोगों में से बहुतों ने रामानंद सागर की रामायण या बी आर चोपड़ा की महाभारत देखी होगी और सच कहूँ तो रामायण या महाभारत को वो स्वरुप हमारे दिमाग में अपना अमिट छाप छोड़ चुकी है या फिर यूँ कह लें लोगों को वही याद रहता है जो उन्हें दिखाया जाता है | फिर आज खिलजी का ये स्वरुप दिखाकर या फिर हाल ही में अब्दुल लतीफ़ (अंडरवर्ल्ड डॉन ) के साथ रईस में भावनाओं को जोड़कर हम अपने कल को क्या देने की कोशिस कर रहे हैं …
कुछ इतिहासकारों ने झटपट में ये घोषणा भी कर दी की पद्मावती एक काल्पनिक पात्र है बस ..चलो मान भी लेते हैं..लेकिन जब एक बड़ा वर्ग उस पात्र को अपनी देवी के रूप में देखती है तो क्या ये उचित है ? काश ये कला के “पुजारी” लोगों की भावनाओं की भी पूजा करते , लेकिन नही उन्हें तो बस एक थप्पड़ में सारा समुदाय आतंकवादी नजर आता है …. के पास राम , कृष्णा , मुहम्मद साहब या फिर जीसस के लिए भी नहीं है | मगर मे नास्तिक व विद्रोही विचारो का होते हुए भी कहना चाहूँगा की काश ये कला के “पुजारी” लोगों की भावनाओं की भी पूजा करते , लेकिन नही उन्हें तो बस एक थप्पड़ में सारा समुदाय आतंकवादी नजर आता है ….खैर ..||||
उत्तम (विद्रोही ) 

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