Sunday, 16 October 2016

तीन तलाक जिद्ध – समझ से परे

भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन ने कुछ सालों से हजारो मुस्लिम महिलाओं, वकीलों , धार्मिक विद्वानों की सलाह/ सुझाव से कुरान के सिद्धांतों के अनुरूप मुस्लिम फॅमिली लॉ का ड्राफ्ट बनाया है, जिसमें विवाह की उम्र, मेहर , तलाक़, बहु-विवाह , निर्वाह –भत्ता (मेंटेनेंस) और बच्चों पर अधिकार जैसे विषय शामिल हैं ! तीन तलाक जैसी कुप्रथा की चपेट में आकर अचानक बेसहारा हो चुकी महिलाएं धर्म के अलंबरदारों से न सिर्फ सवाल कर रही हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक जाकर अपने अधिकार तलाश रही हैं! समाज का प्रगतिशील तबका भले इन पीड़ित महिलाआें के अधिकार का हामी हो, लेकिन सवाल उठते ही धर्म के मठ और गढ़ हिलने लगे हैं  ! मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तर्क समझ से परे है. एक तर्क यह है कि ‘पुरुषों में बेहतर निर्णय क्षमता होती है, वह भावनाओं पर क़ाबू रख सकते हैं. पुरुष को तलाक़ का अधिकार देना एक प्रकार से परोक्ष रूप में महिला को सुरक्षा प्रदान करना है. पुरुष शक्तिशाली होता है और महिला निर्बल. पुरुष महिला पर निर्भर नहीं है, लेकिन अपनी रक्षा के लिए पुरुष पर निर्भर है.’ बोर्ड का एक तर्क सुना. बोर्ड का कहना है कि महिला को मार डालने से अच्छा है कि उसे तलाक़ दे दो ! यह हलफ़नामा इस बात का खुला दस्तावेज़ है कि तीन तलाक़ की नाजायज़ ज़िद पर अड़े मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास तीन तलाक़ को जायज़ ठहराने के लिए वाक़ई एक भी ठोस तर्क नहीं है. बोर्ड के पास तीन तलाक़ के पक्ष में अगर वाक़ई कुछ ठोस तर्क होते तो अपने हलफ़नामे में उसे ऐसी हास्यास्पद बातों का सहारा न लेना पड़ता! बोर्ड ने इस आरोप को सही साबित कर दिया है कि इसलाम में महिलाएँ शोषित और उत्पीड़ित हैं क्योंकि वहाँ महिलाओं को पुरुषों से कमतर माना जाता है ! आज पड़ोसी मुसलिम देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में तीन तलाक़ जैसी कोई चीज़ नहीं है. पाकिस्तान आज से पचपन साल पहले यानी 1961 में क़ानून बना चुका है कि तलाक़ की पहली घोषणा के बाद पुरुष को ‘आर्बिट्रेशन काउंसिल’ और अपनी पत्नी को तलाक़ की लिखित नोटिस देनी होगी. इसके बाद पति-पत्नी के बीच मध्यस्थता कर मामले को समझने और सुलझाने की कोशिश की जायेगी और तलाक़ की पहली घोषणा के 90 दिन बीतने के बाद ही तलाक़ अमल में आ सकता है. इसका उल्लंघन करनेवाले को एक साल तक की जेल और जुरमाना या दोनों हो सकता है. बांग्लादेश में भी यही क़ानून लागू है.
सरकार पर आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य कई मुसलिम संगठनों की नाराजगी कोई हैरानी का विषय नहीं है। तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह की बाबत जब सर्वोच्च अदालत में केंद्र ने अपना रुख हलफनामे के तौर पर पेश किया, तभी यह लगने लगा था कि मुसलिम संगठनों से तनातनी तय है। केंद्र से पहले मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपना पक्ष रख चुका था। बोर्ड के हलफनामे में दो बातें खास थीं। एक यह कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय पहले ही फैसला सुना चुका है, इसलिए नए सिरे से सुनवाई का कोई औचित्य नहीं है। दूसरा यह कि मुसलिम पर्सनल लॉ में संशोधन, धार्मिक स्वतंत्रता के संविधान-प्रदत्त अधिकार का हनन होगा, इसलिए इसकी पहल हरगिज नहीं होनी चाहिए। दूसरी तरफ, पिछले हफ्ते पेश किए गए केंद्र के हलफनामे में तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह की मुखालफत की गई है और यह तर्क दिया गया है कि ये रिवाज लैंगिक समानता तथा कानून के समक्ष समानता जैसे मूलभूत नागरिक अधिकारों के विरुद्ध हैं। कुछ मुसलिम महिलाओं की याचिका पर ही इस मसले पर सर्वोच्च अदालत में कुछ महीनों से सुनवाई चल रही है। इसी दौरान विधि आयोग ने एक प्रश्नावली जारी कर मुसलिम पर्सनल लॉ के विवादित पहलुओं पर लोगों की राय मांगी है। मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड, आयोग के इस कदम से भी खफा है। इस प्रश्नावली का विरोध करते हुए मुसलिम संगठनों ने यह तक कहा है कि सरकार मुसलिम समुदाय के खिलाफ ‘युद्ध’ छेड़ना चाहती है।
इस सिलसिले में मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उसके साथ खड़े मुसलिम संगठन सरकार की मंशा पर तो सवाल उठा रहे हैं, लेकिन वे इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहे हैं कि पर्सनल लॉ पर पुनर्विचार क्यों नहीं होना चाहिए। यह सही है कि संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, लेकिन यह असीमित और निर्बाध नहीं है; यह मूलभूत नागरिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता। संविधान ने ही सभी नागिरकों को कानून के समक्ष समानता और लिंग के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव न किए जाने की गारंटी दे रखी है। फिर, अनेक मुसलिम बहुल देशों ने जब पर्सनल लॉ में बदलाव किए हैं और उन्हें देश-काल के अनुरूप ढाला है, तो भारत में इस मामले में पुनर्विचार क्यों नहीं हो सकता? इस्लाम की चार मान्य या प्रचलित व्याख्याएं होना यही बताता है कि पसर्नल लॉ के प्रावधानों को अधिक युक्तिसंगत और अधिक न्यायसंगत बनाने से इस्लाम पर कोई आंच नहीं आएगी। हां, यह बेहतर होगा कि सर्वोच्च अदालत के पहले के फैसले को देखते हुए इस मामले को पांच जजों की संवैधानिक पीठ को सौंप दिया जाए। दूसरा तकाजा, इस मामले में राजनीतिक सावधानी बरतने का है। इस मामले के एक तल्ख सियासी विवाद और फिर एक तरह के ध्रुवीकरण का जरिया बन जा सकने का खतरा मौजूद है। यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि इसमें किन-किन की दिलचस्पी होगी! इस खतरे से पार पाना होगा, ताकि संबंधित विषय पर पूर्वाग्रहों से रहित और गहरे लोकतांत्रिक अर्थ में विचार-विमर्श संभव हो सके।
उत्तम जैन (विद्रोही )

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