Friday, 27 July 2018

त्याग तपस्या एवं बलिदान की ईंटों द्वारा आचार्य भिक्षु ने तेरापंथ की बुनियाद लगाई -- " शासन श्री " साध्वी श्री ललितप्रभा जी


259 वें तेरापंथ स्थापना दिवस के अवसर पर तेरापंथ भवन उधना में प्रेरक उद्बोधन


उधना - क्रांतिकारी आचार्य श्री भिक्षु ने विक्रम संवत 1817 आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा अर्थात गुरु पूर्णिमा के रोज तेरापंथ धर्मसंघ की स्थापना की। श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा, उधना के तत्वावधान में आज 259 वां तेरापंथ स्थापना दिवस आचार्य श्री महाश्रमण जी की सुशिष्या "शासन श्री" साध्वी श्री ललितप्रभा जी के सानिध्य में बड़े हर्षोल्लास से मनाया गया।
इस अवसर पर विशाल धर्म सभा को संबोधित करते हुए शासन श्री साध्वी श्री ललित प्रभा जी ने कहा-- तेरापंथ एक आचार, एक विचार और एक आचार्य की अनुशासना में चलने वाला धर्मसंघ है। यहां आचार्य की आज्ञा ही सर्वोपरि एवं सभी के लिए शिरोधार्य होती है। आज 259 वर्ष होने के उपरांत तेरापंथ धर्मसंघ रूपी इमारत बुलंदी से खड़ी है। क्योंकि उसकी बुनियाद में है त्याग तपस्या बलिदान और अनुशासन ।आचार्य श्री भिक्षु ने त्याग तपस्या और बलिदान की मजबूत नीव लगाई है।

साध्वी श्री दिव्ययशा जी ने कहा गुरु का मतलब है अंधकार का नाश करने वाला। तेरापंथ के अनुयायी बड़े सौभाग्यशाली है कि उन्हें आचार्य भिक्षु जैसे संस्थापक गुरु मिले।उन्होंने तेरापंथ धर्मसंघ में वर्तमान में हो रही सुदीर्घ तपस्या की जानकारी दी।
साध्वी श्री लब्धियशा जी ने कहा आचार्य भिक्षु का जीवन कठोर साधना का जीवन था। रामनवमी के दिन पूर्व दीक्षित संघ से पृथक हो गए एवं आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन पुनः भाव दीक्षा ग्रहण की। उनका जीवन साहस, समर्पण एवं बलिदान की यशोगाथा है।
आज के अवसर पर विशेष अतिथि के रुप में स्थानीय गुजरात विधानसभा के सदस्य श्री विवेक भाई पटेल एवं सूरत महानगर पालिका के रुग्णालय समिति के नव मनोनीत अध्यक्ष श्री मूलजीभाई ठक्कर उपस्थित रहे। उन्होंने गद्य एवं पद्यमय शैली में गुरु की महिमा का रोचक वर्णन किया। तेरापंथी सभा के अध्यक्ष श्री बसंती लाल जी नाहर उपाध्यक्ष श्री अर्जुन जी मेडतवाल श्रीमती विमला जी नाहर एवं श्री राकेश चौरड़िया ने भावाभिव्यक्ति की।उपाध्यक्ष श्री नाथू लाल जी बोहरा एवं अन्य पदाधिकारियों ने अतिथियों का सम्मान किया। कार्यक्रम का संचालन तेरापंथी सभा के मंत्री श्री अशोक जी दुगड़ ने किया।

साध्वी श्री अमित श्री जी ने कहा आचार्य श्री भिक्षु बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि के धारक थे। उनके पास अहिंसा और सत्य रूपी हथियार थे जिसके द्वारा उन्होंने अनेक संकटों का सामना किया। उन्होंने जैन आगमों का गहन अध्ययन किया शुद्ध साधुत्व एवं शुद्ध साधुत्व की परिभाषा प्रस्तुत की

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