Friday, 17 November 2017

25 साल से कचरे के ऊपर रह रहे 90 परिवार

सूरत. शहर के पांडेसरा इलाके में 90 परिवारों के 500 लोग ऐसे भी हैं, जो सूरत में रह तो 25 वर्षों से रहे हैं, लेकिन आज तक गुमनाम हैं। यहां तक कि शहर की 55 लाख की आबादी में भी वे शामिल नहीं हैं। न कोई पहचान पत्र है और न किसी देश की नागरिकता। झोंपड़ी बनाने को भी कहीं जगह नहीं मिली तो कचरे के ढेर को ही अपना घर बना लिया। राशन, बिजली, पानी, प्राथमिक चिकित्सा और शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतें तो इनके लिए हैं ही नहीं। इन लोगों की सबसे बड़ी जो तकलीफ है, उससे शायद ही शहर के किसी व्यक्ति का कभी सामना हुआ हो। कहने को तो हिंदू हैं, लेकिन सरकारी पहचान नहीं होने के कारण इनको अंतिम समय में श्मशान में भी प्रवेश नहीं मिलता। मजबूरन शव को दफनाना पड़ता है। 25 साल में लोकसभा, विधानसभा और महानगर पालिका के दर्जनभर से भी ज्यादा चुनाव हो चुके, लेकिन कभी किसी नेता ने इनकी सुध नहीं ली। न भाजपा, न कांग्रेस और न कोई और। गांधी कुटीर इलाके से थोड़ा आगे पालिका के डिस्पोजल प्लांट के पास रह रहे इन 90 परिवारों को आज तक किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला। 25 साल पहले ये परिवार महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले के नवापुर से रोजी रोटी के लिए यहां आए थे। पहले दिहाड़ी मजदूरी और फिर कचरा बीनकर गुजारा करने लगे
मनपा का डिस्पोजल प्लांट, वहीं ये परिवार, किसी को नहीं दिखते- शहर को कच्ची बस्ती मुक्त बनाने के लिए मनपा ने 2007 से सर्वे शुरू किया था। नदी किनारे, कैनाल और खाड़ी किनारे की झोपड़पट्टी का सर्वे किया। लेकिन, डिस्पोजल प्लांट पर आने-जाने वाले अधिकारी और कर्मचारियों को कचरे के ऊपर बसी ये बस्ती नहीं दिखी। 2004 के खाड़ी की बाढ़ के बाद कलेक्टर आॅफिस से भी सर्वे हुआ, लेकिन उसमें भी इन 90 परिवारों की तरफ नहीं देखा गया। महाराष्ट्र के नवापुर का राशन कार्ड भी इन लोगों का खारिज हो चुका है और सूरत में भी पहचान नहीं मिल पाई

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