Tuesday, 3 January 2017

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जाति और धर्म के नाम पर वोट नहीं मांग सकते

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बड़े फैसले में कहा कि धर्म, जाति, मत और संप्रदाय के नाम पर वोट नहीं मांगा जा सकता। इन आधारों पर वोट मांगना चुनाव कानूनों के तहत भ्रष्ट व्यवहार होगा, जिसकी अनुमति नहीं है। ऐसा करने वाले उम्मीदवार का चुनाव रद्द किया जा सकता है।
बहुमत से फैसला: मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात जजों की पीठ ने 4:3 के अनुपात से यह फैसला दिया। आरपी एक्ट में भ्रष्ट व्यवहार को परिभाषित करने वाली धारा 123 (3) में इस्तेमाल शब्द ‘उसका धर्म’ के संदर्भ में जस्टिस ठाकुर और तीन अन्य जजों एमबी लोकुर, एसए बोब्डे और एलएन राव ने तीन के मुकाबले चार के बहुमत से फैसला सुनाया। साथ ही कहा कि इसका यह मतलब मतदाताओं, उम्मीदवारों और उनके एजेंटों आदि समेत सभी के धर्म और जाति से है। सात जजों की पीठ ने यह फैसला हिंदुत्व मामले में विभिन्न पक्षों और विपक्षों की विस्तृत सुनवाई के बाद दिया।
तीन जजों का अल्पमत
तीन जज यूयू ललित, एके गोयल और डीवाई चंद्रचूड़ का अल्पमत यह था कि ‘उसका धर्म’ का अभिप्राय सिर्फ उम्मीदवार के धर्म से है। वहीं, पीठ ने कहा कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है धर्म के नाम पर बहस नहीं हो सकती। पीठ ने कहा, इस मामले में कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और कानून बनाने का मामला संसद पर छोड़ देना चाहिए।
धारा-123 (3)में क्या
धारा 123 (3) में लिखा हुआ है कि सिर्फ उम्मीदवार ही अपने धर्म के आधार पर वोट नहीं मांग सकता, लेकिन उसके एजेंट का धर्म के आधार पर वोट मांगने में कोई दिक्कत नहीं है।

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