Saturday, 7 January 2017

राह यूपी की भाजपा के लिए बहत कठिन है

वेसे तो हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है लेकिन जब चुनाव यूपी में हो तो बात अलग हो जाती है अब यूपी में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राज्‍य की सियासत में तीन चेहरे ऐसे हैं, जिनके लिए ये चुनाव बेहद अहम साबित होने जा रहे हैं. दरअसल ये चुनाव इनके राजनीतिक अस्तित्‍व और भविष्‍य के लिए खासा अहमियत रखते हैं और नतीजों का इन पर निर्णायक असर होगा पहले अखिलेश यादव जो अपने जीवन का सबसे महत्‍वपूर्ण चुनाव लड़ने जा रहे हैं क्‍योंकि इनके सियासी भविष्‍य पर इसका निर्णायक प्रभाव पड़ेगा. सपा में मचे घमासान के बीच पहली बार पिता की छाया से निकलकर सियासी मोर्चे पर अपनी किस्‍मत आजमाने जा रहे हैं. विकासवाद बनाम जातिवाद के इर्द-गिर्द घूमती सियासत के बीच विकास पुरुष की इमेज के साथ चुनाव में लड़ने का इरादा रखते हैं. अखिलेश का यह अवतार सपा की परंपरागत सियासी सोच से अलग मिजाज का है. स्‍वच्‍छ छवि, ईमानदार चेहरा उनकी सियासी पूंजी मानी जा रही है.
दूसरे शिवपाल यादव सपा के कद्दावर नेता माने जाते रहे हैं. पार्टी के भीतर गजब की संगठन क्षमता मानी जाती रही है. हालांकि भतीजे के साथ संघर्ष में फिलहाल अखिलेश खेमे ने उनको यूपी के प्रदेश अध्‍यक्ष पद से हटा दिया है. अगर सपा में दो फाड़ की स्थिति में अखिलेश खेमा चुनावी शिकस्‍त का सामना करना पड़ता है तो यह कहने की स्थिति में होंगे कि पार्टी की बागडोर उनके हाथ में ही सुरक्षित है. लेकिन अखिलेश खेमा जीतता है तो शिवपाल के पास भविष्‍य के लिहाज से सियासी विकल्‍प सीमित होंगे. मायावती बसपा सुप्रीमो. 2012 में पार्टी हारकर यूपी की सत्‍ता से बाहर हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता तक नहीं खुला. अबकी बार चुनाव से ऐन पहले स्‍वामी प्रसाद मौर्य जैसे बड़े नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने से पार्टी के हौसलों पर विपरीत असर पड़ा. पिछले दो दशकों में राज्‍य के सियासी फलक पर सपा के विकल्‍प के रूप में बसपा को ही देखा जाता रहा है लेकिन अबकी बार बीजेपी के उभार और कांग्रेस, रालोद के अखिलेश खेमे वाली सपा के साथ गठजोड़ की स्थिति में बसपा के लिए सत्‍ता में लौटने की राह आसान नहीं होगी. इन सब परिस्थितियों में लगातार यदि पार्टी सत्‍ता में नहीं लौटती है तो बसपा और मायावती की आगे की सियासी राह आसान नहीं होगी अपने अभियान 'काम बोलता है' के माध्‍यम से अब तक किए गए विकास कार्यों का ब्‍यौरा भी पेश कर रहे हैं. इस मोर्चे पर उनकी सराहना आलोचक भी करते हैं. जाति, धर्म की सियासत से भी खुद को नहीं जोड़ा और प्रगतिशील इमेज है. कांग्रेस की यूपी में सीएम पद का चेहरा शीला दीक्षित भी अखिलेश की तारीफ करती नजर आती हैं और तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में अखिलेश को मुख्‍यमंत्री के रूप में पहली पसंद बताया जा रहा है. हालांकि यह भी सही है कि यदि सपा में दो फाड़ होता है और मुलायम गुट अलग से चुनाव लड़ता है तो एक ही वोट बैंक होने से वोट कटने का खतरा है. वोटों के बिखराव को रोकना अखिलेश के लिए बड़ी चुनौती है.
.बात दरअसल यह है कि एक लम्बे समय तक ऐसा माना जाता रहा है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर जाता है.जनसंख्या के दृष्टिकोण से भी यूपी एक राज्य नहीं बल्कि महादेश है.चाहे केंद्र में किसी की भी सरकार क्यों न हो बिना यूपी का विकास किए भारत के विकास के बारे में वो सोंच भी नहीं सकती.सवाल है कि कैसे हो यूपी का विकास?तभी होगा जब वहां की जनता चाहेगी.विकास जबरदस्ती तो किया नहीं जा सकता.
मित्रों, उसी यूपी में अगले महीने चुनाव होने जा रहा है.सुप्रीम कोर्ट चाहे जितना भी ऑर्डर-ऑर्डर कर ले यूपी में चुनाव जाति और धर्म के नाम पर लडे जाते रहे हैं और इस बार भी लडे जाएंगे.मायावती ने उम्मीदवारों की घोषणा से पहले ही सीटों का जातीय और सांप्रदायिक विभाजन करके इसकी विधिवत शुरुआत भी कर दी है.आगे यह यूपी की जनता को निर्णय लेना है कि उनको पिछले ७५ साल की तरह जाति चाहिए या विकास चाहिए.
मित्रों,यहाँ मैं विद्रोही मोदी जी व भारतीय जनता पार्टी से उम्मीद रखता हूँ कि वो कम-से-कम उन गलतियों को तो नहीं दोहराए जो उसने बिहार विधानसभा चुनावों के समय की थी और बिहार को विनाश की राह पर धकेल दिया था.सबसे पहले तो भाजपा को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर देना चाहिए.साथ ही उम्मीदवारों का चयन बिहार की तरह पैसे लेकर नहीं बल्कि जीत की सम्भावना को देखते हुए करना चाहिए.इन दोनों कामों को करने के लिए गहन सर्वेक्षण की आवश्यकता होगी.बूथ मैनेजमेंट तो हर चुनाव में महत्वपूर्ण होता ही है.साथ ही भाजपा को अपने बूते पर चुनाव जीतने की तैयारी करनी होगी न कि दूसरे दलों सपा में चल रहे कलह के बल पर अति आत्मविश्वास से चुनाव जीतने के सपने देखने चाहिए.हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कोई पूरी कोशिश करेगा कि यूपी में भी महागठबंधन हो जाए और अगर ऐसा होता है तो क्या करना है के लिए भी पूरी तैयारी रखनी होगी.हम जानते हैं कि रसायन शास्त्र में २ और २ बाईस होता है लेकिन बिहार चुनाव ने साबित कर दिया है कि २ और २ हर बार २२ ही नहीं होता शून्य भी हो सकता है.
मित्रों,साथ ही नोटबंदी के समय नकद निकासी की जो सीमा निर्धारित की गयी थी उसमें क्रमशः ढील देनी चाहिए क्योंकि मैं अपने अनुभव के आधार पर कहता हूँ कि इससे काफी परेशानी हो रही है.अब बेनामी संपत्ति के खिलाफ युद्ध छेड़ा जाना चाहिए और सारे गड़े हुए कालेधन को पाताल से भी बाहर निकालना चाहिए क्योंकि अगर कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम को नोटबंदी से आगे नहीं बढाया जाता है तो जनता के बीच ऐसे संकेत जाएंगे कि मोदी सरकार ने भी सिर्फ दिखावा किया जिसके फलस्वरूप नोटबंदी के कारण अभी जो लाभ भाजपा को मिलता दिख रहा है वो समाप्त तो हो ही जाएगा साथ ही नुकसानदेह भी हो जाएगा ओर यूपी की जीत का सपना सिर्फ सपना भी हो सकता है
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही ) 

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